बिहार की वो क्रांति जिसकी वजह से लोगों ने छोड़ दिया था सरनेम लगाना
संपूर्ण क्रांति
Sampoorna Kranti Diwas : आजादी के बाद भारत के इतिहास में संपूर्ण क्रांति को सबसे बड़ा आंदोलन माना जा सकता है, जिसकी वजह से देश की राजनीति पर तो बड़ा प्रभाव पड़ा ही, समाज में भी कई बड़े बदलाव नजर आए. समाज में मौजूद गैरबराबरी और जातिवाद के खिलाफ इस आंदोलन ने बड़ी लड़ाई लड़ी और उसका प्रभाव भी दिखा. संपूर्ण क्रांति के प्रभाव में बिहार जैसे जाति आधारित समाज में लोगों ने अपने नाम से सरनेम को हटा दिया, ताकि उनकी जाति का पता ना चले. आइए समझते हैं क्या था यह आंदोलन.
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Sampoorna Kranti Diwas : 1974 में बिहार की धरती से शुरू हुए छात्र आंदोलन ने 5 जून 1974 को इतना व्यापक रूप ले लिया कि इसे संपूर्ण क्रांति का नाम दिया गया. संपूर्ण क्रांति का नेतृत्व जयप्रकाश नारायण ने किया था और यह आंदोलन सिर्फ राजनीतिक आंदोलन नहीं था, बल्कि इस आंदोलन का उद्देश्य था समाज के संपूर्ण स्वरूप में बदलाव लाने का. भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था में बदलाव को लेकर यह क्रांति हुई थी, जिसका प्रभाव क्षेत्र संपूर्ण भारत हो गया था.
संपूर्ण क्रांति की जरूरत क्यों महसूस हुई?
संपूर्ण क्रांति की घोषणा 5 जून 1974 को हुई थी, उससे पहले देश में अजीब सी निराशा थी. खासकर युवावर्ग में बेचैनी थी. वे निराश थे. गुजरात में छात्रों का एक आंदोलन हो चुका था. यह आंदोलन मेस फीस में बढ़ोतरी को लेकर था. बिहार की स्थिति भी बहुत खराब थी. युवा परिवर्तन चाहते थे और यह परिवर्तन राजनीतिक परिवर्तन से इतर था. उस दौर में राजनीतिक पार्टियों से युवाओं का मोहभंग हो गया था. कांग्रेसी और गैरकांग्रेसी सरकार दोनों को जनता ने परख लिया था और उनके अंदर निराशा घर कर गई थी. 1967 में जब महामाया प्रसाद सिन्हा ने नेतृत्व में पहली बार गैरकांग्रेसी सरकार बनी, तो वह महज 11 महीने चली. इस राजनीतिक माहौल से जनता में बेचैनी थी और तब छात्रों ने मार्च 1974 में एक बड़े बदलाव के लिए आंदोलन की शुरुआत की थी. आंदोलन की जिस वक्त शुरुआत हुई थी, उस वक्त यह अनुमान नहीं था कि आंदोलन का स्वरूप इतना वृहत हो जाएगा. अत: कुछ छात्र नेता जयप्रकाश नारायण से मिले और उनसे आंदोलन का नेतृत्व करने की गुजारिश की. जयप्रकाश नारायण जब आंदोलन में शामिल हुए तो आंदोलन का स्वरूप और विस्तृत हुआ और छात्र आंदोलन संपूर्ण क्रांति में तब्दील हो गया.
राजनीतिक पार्टियों से जनता के मोहभंग का परिणाम था संपूर्ण क्रांति : शिवानंद तिवारी
जिस वक्त देश में संपूर्ण क्रांति हुई, उस वक्त देश का माहौल ऐसा था कि नौजवानों में असंतोष की भावना घर कर गई थी. बेरोजगारी, महंगाई और शिक्षा व्यवस्था से युवा हताश थे, वे बदलाव चाहते थे. प्रभात खबर के साथ बातचीत में संपूर्ण क्रांति का हिस्सा रहे शिवानंद तिवारी ने बताया कि युवा बदलाव चाहते थे, लेकिन यह बदलाव राजनीतिक परिवर्तन के लिए नहीं था, क्योंकि जनता ने सभी पार्टियों को परख लिया था. वे एक ऐसा परिवर्तन चाहते थे, जिससे समाज में बदलाव दिखे. आजादी के बाद जिस भारत की कल्पना की गई थी, वह बन नहीं पाया था. समाज में गैरबराबरी बढ़ी थी, लेकिन आंदोलन राजनीतिक पार्टियों ने नहीं किया, जबकि यह काम उनका था. आंदोलन जनता ने किया और जयप्रकाश नारायण को नेतृत्व सौंपा. वे एक बड़े नेता थे, उनका नेतृत्व पाकर ही यह आंदोलन संपूर्ण क्रांति बना और सफल भी हुआ.
आंदोलन का स्वरूप अहिंसक होगा, इस शर्त के साथ जेपी ने थामी थी संपूर्ण क्रांति की कमान : अनिल प्रकाश
बिहार में छात्रों के आंदोलन से पहले देश में गुजरात के छात्रों ने आंदोलन किया था. वहां भी मसला असंतोष का ही था. संपूर्ण क्रांति के वक्त समाज में बड़े बदलाव की ख्वाहिश लेकर यूनिवर्सिटी की पढ़ाई छोड़कर आंदोलन का हिस्सा बने अनिल प्रकाश बताते हैं कि उस वक्त माहौल ही कुछ ऐसा था कि हम पढ़ाई छोड़कर निस्वार्थ भाव से आंदोलन का हिस्सा बने. हमारे अंदर सामाजिक बदलाव की चाह थी. भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और शिक्षा नीति में परिवर्तन की आस में बिहार के युवा संगठित हुए थे और आंदोलन किया था. छात्रों का आंदोलन 18 मार्च 1974 को शुरू हो गया था. उस दिन पटना में उम्मीद से अधिक युवा एकत्रित हुए और आंदोलन कुछ हद तक हिंसक भी हो गया था. छात्र नेता आंदोलन को संभाल नहीं पा रहे थे क्योंकि भीड़ उनकी उम्मीद से ज्यादा थी. तब कुछ लोग छिपते हुए जयप्रकाश नारायण से मिले और उनसे कहा कि वे आंदोलन का नेतृत्व करें. शुरुआत में वो नहीं मान रहे थे, लेकिन बाद में उन्होंने कुछ शर्तों के साथ आंदोलन के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया. उन्होंने सबसे पहली शर्त यह रखी थी कि आंदोलन हिंसक नहीं होगा. सबकुछ शांतिपूर्ण तरीके से किया जाएगा. दूसरी शर्त यह थी कि आंदोलन पार्टी से परे होगा, यानी इसमें किसी पार्टी की भागीदारी नहीं होगी और तीसरी शर्त यह थी कि अंतिम निर्णय जेपी खुद लेंगे. जेपी के नेतृत्व में यह आंदोलन इतना बड़ा हुआ कि सामाजिक जागरण की शुरुआत हुई. भेदभाव कम हुआ, बिहार जैसे राज्य में इंटरकास्ट मैरिज हुए. जनता सरकार बनाई गई और आपसी मुद्दों का समाधान किया गया. विशेषकर यह कहा जाए कि एक असंतोष से भरे समाज को समता आधारित समाज की झलक मिली.
बिहार तक सीमित नहीं रही संपूर्ण क्रांति
बिहार में संपूर्ण क्रांति का प्रभाव इतना उत्साहवर्धक रहा कि यह आंदोलन बिहार से बाहर निकलकर यूपी, बंगाल और पूरे देश में फैल गया. इस आंदोलन की वजह से लोगों में एक आशा का संचार हुआ और उन्हें यह प्रतीत होने लगा था कि अब उनके जीवन में सबकुछ अच्छा होगा. समाज में कोई गैरबराबरी नहीं होगी और सबकुछ बेहतर होगा. संपूर्ण क्रांति का असर भारतीय राजनीति, समाज और लोकतांत्रिक चेतना पर बहुत गहरा और दूरगामी रहा और केंद्र की इंदिरा गांधी की सरकार को हिलाकर रख दिया था.
किन क्षेत्रों में बदलाव के लिए हुआ संपूर्ण क्रांति
5 जून 1974 को जब जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति की घोषणा की, तो उन्होंने कहा था-यह संपूर्ण क्रांति है दोस्तों. इस क्रांति को उन्होंने राष्टव्यापी बनाया और जनता की संपूर्ण भागीदारी के साथ संपूर्ण क्रांति बनाया. इस क्रांति ने जिन क्षेत्रों में बदलाव के लिए आवाज बुलंद की वे हैं-
- राजनीतिक क्रांति : भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के खिलाफ. इसका उद्देश्य चुनाव में सुधार, जन प्रतिनिधित्व में ईमानदारी और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना था.
- शैक्षिक क्रांति : शिक्षा व्यवस्था को व्यावहारिक बनाना ताकि यह सबके लिए सुलभ हो साथ ही शिक्षा को मूल्य-आधारित और रोजगारोन्मुखी बनाने की मांग.
- आर्थिक क्रांति : गरीबी, असमानता, बेरोजगारी और किसानों की दुर्दशा को दूर करना.
- सामाजिक क्रांति : जातिवाद, छुआछूत, भेदभाव और सामाजिक अन्याय को समाप्त कर समता आधारित समाज की स्थापना करना.
- सांस्कृतिक क्रांति : समाज में सांस्कृतिक मूल्यों, नैतिकता और आत्मचिंतन को पुनर्जीवित करना. इस क्रांति का उद्देश्य भारतीय संस्कृति की गरिमा को बनाए रखते हुए उसका आधुनिकता के साथ संतुलन बनाना था.
- प्रशासनिक क्रांति : नौकरशाही से भ्रष्टाचार को मिटाना और उन्हें उत्तरदायी बनाना.
- नैतिक क्रांति : समाज के हर व्यक्ति को नैतिकता के साथ जीना सिखाना और आत्मानुशासन को जगाना.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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