संयुक्त राष्ट्र में क्यों उठाया गया था कश्मीर का मसला, पंडित नेहरू और सरदार पटेल के बीच था ये विवाद?

Edited by Rajneesh Anand
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पंडित नेहरू और सरदार पटेल

Patel Nehru Kashmir Dispute : भारत की आजादी के बाद से ही कश्मीर का मसला एक बड़ी समस्या की तरह देश के सामने है. कश्मीर को लेकर तीन युद्ध भारत और पाकिस्तान के बीच हो चुके हैं और 90 के दशक से पाकिस्तान ने कश्मीर को आतंकवाद के जरिए अशांत किया है. हमेशा यह बात कही जाती है कि पंडित नेहरू कश्मीर समस्या के लिए जिम्मेदार हैं, उन्होंने अगर कश्मीर के भारत में विलय के वक्त दिल से नहीं दिमाग से सोचा होता, तो आज स्थिति कुछ और होती. पीएम मोदी ने हाल ही में इस बात को और पुख्ता किया है और यह कहा कि आजादी के बाद पंडित नेहरू ने सरदार पटेल की नहीं सुनी, अगर सुनते तो कश्मीर का यह हाल ना होता.

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Patel Nehru Kashmir Dispute : जम्मू-कश्मीर को भारत का मस्तक कहा जाता है. भारत का यह राज्य धरती पर का स्वर्ग है और इसी स्वर्ग को हथियाने के लिए पाकिस्तान हमेशा अपनी आसुरी शक्तियों का प्रयोग करता रहता है. भारत के बंटवारे के बाद से ही पाकिस्तान ने कश्मीर को हथियाने के लिए गलत प्रयास किए हैं. आजादी के तुरंत बाद ही उसने कबायलियों के जरिए जम्मू-कश्मीर पर हमला किया था. इस हमले की वजह से जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों पर पाकिस्तान का कब्जा है. उसी पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान आतंकवादियों को शरण देता है, उनके लिए ट्रेनिंग की व्यवस्था करता है और भारत को आतंकवाद की आग में जलाता रहता है. 1948 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हो रहा था तो पंडित नेहरू और सरदार वल्लभाई पटेल के बीच कश्मीर के मसले को लेकर कुछ मतभेद थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि अगर उस वक्त सरदार पटेल के सुझावों को मान लिया जाता, तो हमें पहलगाम अटैक ना झेलना पड़ता. प्रधानमंत्री के इस बयान का अर्थ यह है कि कश्मीर को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू से कुछ गलतियां हुईं, जिनका खामियाजा आज हम भुगत रहे हैं. वे यह भी कहना चाहते हैं कि सरदार पटेल उस वक्त सही थे, अगर उनकी बात मान ली जाती, तो आज परिस्थितियां अलग होतीं.

कश्मीर पर क्या सोचते थे पंडित नेहरू और सरदार पटेल

पंडित नेहरू और सरदार पटेल दोनों ही इस बात पर सहमत थे कि कश्मीर को भारत का अंग होना चाहिए. जब आजादी के वक्त कश्मीर ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए और स्वतंत्र रहने की इच्छा जताई तो नेहरू और पटेल दोनों को यह बात पसंद नहीं आई थी. भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी सी दासगुप्ता ने अपनी किताब- War and Diplomacy in Kashmir, 1947–48 में यह स्पष्ट लिखा है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल दोनों ही कश्मीर के स्वतंत्र या तटस्थ रहने के पक्ष में नहीं थे. दोनों का ही यह मानना था कि कश्मीर का स्वतंत्र रहना भारत की सुरक्षा और संप्रभुता के लिए खतरा होगा. हां, यह भी एक सच्चाई है कि कश्मीर के मसले को सरदार पटेल सैन्य कार्रवाई से हल करना चाहते थे, जबकि पंडित नेहरू कूटनीतिक तरीके से.

कबायली हमले के वक्त कश्मीर में क्या हुआ

कश्मीर को ललचाई नजरों से देखने वाला पाकिस्तान किसी भी हालत में कश्मीर को हड़पना चाहता था. इसी सोच की वजह से जब भारत का बंटवारा हुआ और देश के तीन टुकड़े हुए तो पाकिस्तान कश्मीर को हथियाना चाह रहा था, क्योंकि आजादी के वक्त कश्मीर ने स्वतंत्र रहने का विकल्प चुना था. वह ना तो भारत के साथ था और ना ही पाकिस्तान के साथ. इसी बात का फायदा उठाते हुए पाकिस्तान ने कबायलियों की मदद से वहां के राजा हरि सिंह पर हमला कर दिया. हमले के बाद राजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी. नेहरू और पटेल दोनों ही उस वक्त कश्मीर को सैन्य मदद देने के पक्षधर थे, लेकिन अंग्रेजों ने उन्हें रोका. उनका यह मानना था कि अगर भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र की मदद करेगा, तो भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ जाएगा. उन्होंने बिना विलय पत्र के कश्मीर को मदद देने से रोका था. कश्मीर ने जब विलयपत्र पर हस्ताक्षर किया, तब जाकर भारत कश्मीर में सैन्य कार्रवाई कर सका. War and Diplomacy in Kashmir, 1947–48 में लिखा गया है कि सरदार पटेल कश्मीर मुद्दे पर निर्णायक सैन्य कार्रवाई के पक्षधर थे, जबकि नेहरू अधिक कूटनीतिक दृष्टिकोण अपनाना चाहते थे. कश्मीर का मसला ब्रिटिश अधिकारियों की भूमिका और नेहरू-पटेल के बीच मतभेदों के कारण काफी जटिल हो गया था.

संयुक्त राष्ट्र में क्यों उठाया गया कश्मीर का मसला?

1947-48 में जब जम्मू-कश्मीर पर कबायलियों ने हमला किया और बाद में यह युद्ध भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध में बदल गया, तो पंडित नेहरू ने चाहा कि वे इस मसले को संयुक्त राष्ट्र में लेकर जाएं और पाकिस्तान को बेनकाब करें. उन्होंने एक बार यह कहा था -‘Kashmir’s accession is final. The only thing left is to ratify the will of the people.’ पंडित नेहरू के इन शब्दों से यह स्पष्ट है कि वे कश्मीर का भारत में विलय तो अंतिम रूप में चाहते ही थे, लेकिन उनका तरीका थोड़ा अलग था, वे सैन्य कार्रवाई की बजाय कूटनीतिक प्रयासों के समर्थक थे. कश्मीर का मसला संयुक्त राष्ट्र में उठाया जाए, सरदार पटेल इस बात के सख्त खिलाफ थे. वे यह कहते थे कि कश्मीर भारत का आंतरिक मसला है और इस मसले को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने की जरूरत नहीं है. वे किताब में इस बात का जिक्र भी है कि कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र में उठाने की जानकारी भी सरदार पटेल को देर से दी गई थी और वे इससे नाखुश भी थे. पंडित नेहरू का कश्मीर को लेकर साॅफ्ट कार्नर था. वे मूलत: कश्मीर के रहने वाले थे, इसलिए वे कश्मीर के मसले को दिल से देखते थे. सरदार पटेल ने लार्ड माउंटबेटन के सामने ही कश्मीर के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय विषय मानने से इनकार किया था और कहा था कि इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाना रणनीतिक भूल होगी. उन्होंने कहा था -If Hyderabad is our internal matter, so is Kashmir.’ यानी अगर हैदराबाद हमारा आंतरिक मसला है,तो कश्मीर भी है. लेकिन पंडित नेहरू ने सरदार पटेल की नहीं सुनी और 1 जनवरी 1948 को कश्मीर का मसला भारत की ओर से संयुक्त राष्ट्र में उठाया गया.

1948 में सीजफायर के बाद भी कश्मीर के कुछ हिस्सों से क्यों नहीं हटा पाकिस्तान

भारत ने जब कश्मीर का मसला संयुक्त राष्ट्र में उठाया, तो संयुक्त राष्ट्र संघ ने 13 अगस्त 1948 और 5 जनवरी 1949 को प्रस्ताव पास किए, जिनमें कहा गया कि पाकिस्तान सभी कबायली लड़ाकों और अपनी सेना को कश्मीर से पूरी तरह हटाए. भारत भी अपनी सेना की मौजूदगी कम करे और कश्मीर में जनमत संग्रह कराया जाए. लेकिन पाकिस्तान ने अपनी सेना नहीं हटाई, जिसकी वजह से भारत ने भी अपनी सेना नहीं हटाई और जनमत संग्रह कभी नहीं हो पाया. आजादी के वक्त भारत की सेना और पाकिस्तान की सेना का नेतृत्व ब्रिटिश जनरल कर रहे थे. भारतीय सेना के अधिकारी सर रॉय बुचर थे, जबकि पाकिस्तान में जनरल ग्रेस्सी थे. सर रॉय बुचर ने भारतीय सेना को पूरी तरह आगे बढ़ने और कश्मीर के उन इलाकों पर पुनः कब्जा लेने से रोका, जिसपर पाकिस्तानी सेना ने युद्ध के दौरान कब्जा कर लिया था. जनरल बुचर का कहना था कि इससे युद्ध और बड़ा हो सकता है. परिणाम यह हुआ कि कश्मीर के उन हिस्सों पर पाकिस्तान को कब्जा मिल गया और सीजफायर होने की वजह से भारतीय सेना ने कार्रवाई नहीं की. पंडित नेहरू संयुक्त राष्ट्र और ब्रिटिश अधिकारियों के दबाव में था और इस तरह कश्मीर का मसला पूरी तरह हल नहीं पाया.

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लेखक के बारे में

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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