महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल ला सकता है राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे का साथ आना, बीजेपी की बढ़ सकती है मुश्किलें

Edited by Rajneesh Anand
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राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे

Raj Thackeray : महाराष्ट्र की राजनीति में मराठी अस्मिता का मुद्दा एक बार फिर गरमाता नजर आ रहा है, क्योंकि मराठी भाषा, महाराष्ट्र और मराठी मानुष के लिए 5 जुलाई को उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक मंच पर साथ आ गए हैं. वे दोनों साथ आकर यह संदेश देना चाहते हैं कि तमाम विवाद एक तरह हैं लेकिन मराठी मानुष की अस्मिता के लिए वे सबकुछ भुलाकर साथ आ सकते हैं. राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे की एकजुटता महाराष्ट्र की राजनीति में भूकंप ला सकती है.

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Raj Thackeray : 5 जुलाई 2025 का दिन महाराष्ट्र के इतिहास में बहुत ही खास होने वाला है, क्योंकि 20 साल के अंतराल के बाद राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे दोनों साथ एक मंच पर आए हैं. राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे मराठी अस्मिता के लिए एक साथ आएं हैं. महाराष्ट्र में मराठी अस्मिता की लड़ाई नई नहीं है, शिवसेना प्रमुख बाला साहब ठाकरे ने इसी मुद्दे पर आजीवन अपनी राजनीति की. 2025 में मराठी अस्मिता का मुद्दा तब गरमाया जब आरएसएस के वरिष्ठ नेता भैयाजी जोशी ने मार्च महीने में यह बयान दे दिया था कि मुंबई की कोई खास भाषा नहीं है, यहां कई भाषाएं बोलीं जाती हैं, इसलिए यह जरूरी नहीं है कि यहां रहने वाले को मराठी सीखना जरूरी है. भैयाजी जोशी के बयान पर काफी हंगामा मचा था और मराठी भाषा और मराठी मानुष का मुद्दा गरमाया था.

हिंदी विरोध का मामला महाराष्ट्र में नया नहीं है

भारत में 1950-60 के दशक में भाषा के आधार पर राज्यों का निर्माण किया गया. भाषाई आधार पर राज्यों का निर्माण होने से लोगों के अंदर अपनी पहचान को लेकर जंग शुरू हुआ है. एक मई 1960 को भाषा के आधार पर गुजरात से महाराष्ट्र को अलग कर दिया और मराठी यहां की भाषा बनी. उसी वक्त से मराठी भाषा और मराठी अस्मिता की गूंज पूरे राज्य में उठी और महाराष्ट्र में हिंदी विरोध की शुरुआत हुई. इसकी वजह यह थी कि महाराष्ट्र के लोग अपनी भाषा को हिंदी और गुजराती से बचाना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें यह लगता था कि हिंदी और गुजराती का वर्चस्व कायम हुआ तो उनके मराठी अस्तित्व को नुकसान पहुंचेगा. 1980 के दशक में शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने आक्रामक राजनीति की और यह साबित करने की कोशिश की कि गैर मराठी लोग मराठियों के अधिकारों को छीन रहे हैं. उनका यह कहना था कि उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग महाराष्ट्र आकर नौकरी कर रहे हैं, जिससे उनकी भाषा और अस्मिता को खतरा उत्पन्न हो गया और ये हिंदी भाषी लोग मराठियों के अधिकारों का हनन कर रहे हैं. बाल ठाकरे इस बात से काफी नाराज दिखते थे और उनका यह कहना था कि मुंबई में सबसे ज्यादा मराठी अस्मिता को खतरा है. बाला साहेब ठाकरे के बाद उनके भतीजे राज ठाकरे ने मराठी भाषा और मराठा मानुष की बातों को जोर-शोर से उठाया और हिंदी भाषियों का विरोध किया. वे बाला साहेब ठाकरे की तरह की बहुत आक्रामक रुख रखते हैं.

हिंदी विरोध को लेकर अभी क्यों गरमाया है मामला?

महाराष्ट्र में हिंदी विरोध का ताजा मामला तब सामने आया जब महाराष्ट्र की बीजेपी सरकार ने कक्षा 1-5 तक के बच्चों के लिए तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को पढ़ना अनिवार्य करने का आदेश जारी किया. इस आदेश के बाद महाराष्ट्र में शिवसेना और मनसे का विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया और उन्होंने यह आरोप लगाया कि सरकार मराठियों पर हिंदी थोप रही है. यह विरोध इतना तीव्र हुआ कि सरकार को अपना आदेश वापस लेना पड़ा. इससे पहले भैयाजी जोशी के उस बयान पर भी मराठी भड़क गए थे, जिसमें उन्होंने यह कह दिया था कि मुंबई में रहने के लिए मराठी भाषा सीखना जरूरी नहीं है, क्योंकि यहां सिर्फ मराठी ही नहीं बोली जाती है.

राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के साथ आने पर महाराष्ट्र की राजनीति पर क्या होगा असर?

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राज और उद्धव ठाकरे के साथ आने से उत्साहित समर्थक

राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे अगर मराठी अस्मिता के नाम पर तमाम मतभेद भुलाकर साथ आ जाते हैं, तो महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा परिवर्तन दिख सकता है, क्योंकि अभी मराठी वोटर्स बंटे हुए हैं. राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के एक छत्र के नीचे आने से मराठी वोटर्स एक साथ हो जाएंगे और यह बीजेपी के लिए बड़ा नुकसान होगा. अभी शिवसेना शिंदे गुट उनके साथ है, लेकिन मराठी अस्मिता के लिए वे भी घर वापसी कर सकते हैं. उस स्थिति में बीजेपी के लिए वहां सरकार चला पाना कठिन हो सकता है. राज ठाकरे का क्रेज युवाओं में बहुत अधिक है, क्योंकि वे काफी आक्रामक बयानबाजी करते हैं और उग्र हिंदुत्व उनका मुद्दा भी है. मंच से उद्धव ठाकरे ने बीजेपी पर हमला किया है और उन्हें लोगों को बांटने वाला बताया है. उन्होंने कहा है कि मैं और राज साथ है यह महत्वपूर्ण है.

राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के बीच क्यों हुआ था विवाद

राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे चचेरे भाई हैं. इन दोनों के विवाद राजनीतिक उत्तराधिकार को लेकर बढ़ा. दरअसल राज ठाकरे ने बाला साहेब के अंदाज में राजनीति शुरू की. उनके भाषण और अंदाज उतने ही आक्रामक हुआ करते थे, जितने बाला साहेब के थे. इस वजह से राज ठाकरे को यह उम्मीद थी कि उन्हें बाला साहेब का उत्तराधिकारी घोषित किया जाएगा. राज ठाकरे बाला साहेब के छोटे भाई श्रीकांत ठाकरे के बेटे हैं. राज ठाकरे नाराज तब हुए जब बाला साहेब ने उनकी जगह उद्धव ठाकरे को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. इसके बाद राज ठाकरे अलग हो गए और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का गठन किया, जो मराठी अस्मिता की राजनीति करती है. अब दोनों भाइयों के बीच सुलह हो गई और दोनों राजनीतिक हित के लिए साथ खड़े दिख रहे हैं.

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लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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