Bihar News : दलित वोट पर कब्जे की जंग शुरू, जोर आजमाइश में जुटी पशुपति पारस की पार्टी
Pashupati Paras
Pashupati Paras : बिहार विधानसभा चुनाव में दलित वोटर किसके साथ, इसकी परीक्षा शुरू हो गई है. रामविलास पासवान के भाई पशुपति पारस एनडीए का साथ छोड़कर दलित वोट पर अपनी पकड़ का पता लगाने की तैयारी शुरू कर चुके हैं. पार्टी छोड़ने के ऐलान के साथ ही वे बिहार में अपनी पार्टी की जोर आजमाइश करेंगे. बिहार के 243 विधानसभा क्षेत्र में अपने वोट बैंक की पहचान करने के बाद वे लगभग छह माह बाद होने वाले विधानसभा में अपनी पार्टी के लिए सीट सुरक्षित करेंगे और इसके लिए दावा ठोकेंगे. लोकसभा चुनाव के दौरान एनडीए के साथ रहने के बावजूद पशुपति पारस की पार्टी को एक भी टिकट नहीं दिया गया था. वहीं से इस कथा की शुरुआत होती है
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Pashupati Paras : बिहार विधानसभा चुनाव से पहले एक राजनीतिक हलचल चुनावी मैदान में हुई है, जिसके रचियता राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के नेता पशुपति पारस हैं. पशुपति पारस ने सोमवार को यह ऐलान किया कि वे एनडीए से अलग हो रहे हैं. पशुपति पारस ने एनडीए गठबंधन से अलग होने का निर्णय क्यों किया और इसका बिहार चुनाव पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
2024 के लोकसभा चुनाव के वक्त ही तैयार हो गई थी भूमिका
2024 के लोकसभा चुनाव के वक्त ही यह तय हो गया था कि पशुपति पारस ज्यादा दिनों तक बीजेपी या एनडीए के साथ नहीं रहेंगे. इसकी वजह यह थी कि बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में पशुपति पारस की पार्टी को एक भी टिकट नहीं दिया, जबकि चिराग पासवान की पार्टी को पांच टिकट दिए थे. इस वजह से पार्टी में नाराजगी थी और उन्हें ऐसा लग रहा था कि एनडीए ने उनको सम्मान नहीं मिला है. अब जबकि बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं और पार्टी को लेकर बीजेपी और एनडीए गठबंधन का रवैया बदला नहीं है. इन हालात में पार्टी ने एनडीए से टूट चुके संबंध को तोड़े जाने की घोषणा कर दी है.
एनडीए ने पशुपति पारस और उनकी पार्टी का अपमान किया : श्रवण अग्रवाल
राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्रवण अग्रवाल का कहना है कि एनडीए से अलग होने का जो फैसला पशुपति पारस ने अभी लिया है उसे लोकसभा चुनाव के वक्त ही ले लिया जाना चाहिए था. एनडीए गठबंधन में लगातार पशुपति पारस और उनकी पार्टी का अपमान हुआ, जबकि पशुपति पारस और उनकी पार्टी ने पूरी निष्ठा से एनडीए का साथ दिया. लेकिन हम कितने दिनों तक अपमान सह सकते हैं, एक राजनीतिक दल साधु की तरह व्यवहार को नहीं कर सकती है. यही वजह है कि पशुपति पारस ने एनडीए से नाता तोड़ा है. लोकसभा चुनाव के दौरान चिराग पासवान को तरजीह दी गई, जबकि उन्होंने विधानसभा चुनाव के दौरान एनडीए के विरुद्ध प्रचार किया था, हम एनडीए के साथ खड़े थे, लेकिन हमें दरकिनार किया गया और अपमान किया गया. अगले छह महीनों में विधानसभा चुनाव होना है, कितना अपमान सहेंगे. चुनाव पांच साल में एक बार होता है, यह महापर्व है इसलिए हमने एनडीए से अलग होने का फैसला किया है. पार्टी का कहना है कि जब लोकजनशक्ति का बंटवारा हुआ और हमारे पास पांच सांसद थे, तो बीजेपी ने हमें तवज्जो दिया और पशुपति पारस को मंत्री पद भी मिला, लेकिन अब बीजेपी हमारे साथ यूज एंड थ्रो का व्यवहार कर रही है.
पासवान वोट हमारे पास, विधानसभा चुनाव में सबको पता चल जाएगा
रामविलास पासवान की पार्टी लोकजनशक्ति पार्टी में टूट उनके निधन के बाद हो गई थी. जून 2021 में पार्टी का विभाजन हो गया और लोकजनशक्ति पार्टी (रामविलास) और राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी अस्तित्व में आई. लोकसभा चुनाव के वक्त एनडीए यानी बीजेपी ने चिराग पासवान गुट पर भरोसा किया और उन्हें अभी भी यही उम्मीद है कि दलित वोट चिराग पासवान के पास है इसलिए वे उन्हें तरजीह भी दे रहे हैं. राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के नेता श्रवण अग्रवाल कहते हैं कि बिहार बीजेपी के नेता, जिनमें अध्यक्ष और प्रभारी शामिल हैं, उन्होंने बीजेपी के शीर्ष नेताओं को यह गलत जानकारी दी है कि बिहार में दलितों के वोट पर चिराग पासवान का दबदबा है. बिहार का दलित यह मानता है कि चिराग पासवान उनके नेता नहीं हैं और आगामी विधानसभा चुनाव में यह स्पष्ट भी हो जाएगा. तारापुर और कुशेश्वर स्थान का जो उपचुनाव हुआ था उसमें यह पता भी चल गया था कि सच क्या है.
पशुपति पारस के फैसले में दम नहीं, बिहार विधान चुनाव पर नहीं होगा असर
एनडीए गठबंधन से अलग होने का जो फैसला पशुपति पारस ने लिया है उसका बिहार विधानसभा चुनाव पर कितना प्रभाव पड़ेगा और पशुपति पारस ने यह निर्णय क्यों किया है, इसपर बात करते हुए प्रभात खबर के राजनीतिक संपादक मिथिलेश कुमार ने कहा कि पशुपति पारस ने एनडीए को छोड़ने की घोषणा भले ही सोमवार को की हो, लेकिन सच्चाई यह है कि एनडीए और पशुपति पारस के बीच दूरी बढ़ गई थी. जहां तक बात बिहार विधानसभा चुनाव पर इस फैसले के प्रभाव की है, तो मुझे नहीं लगता है कि पशुपति पारस की पार्टी कोई बड़ा प्रभाव कायम कर पाएगी. हां, यह बात जरूर है कि अगर पशुपति पारस इंडिया गठबंधन के साथ गए, तो राजद को इसका फायदा मिलेगा क्योंकि यह विधानसभा चुनाव है और 250-500 वोट का भी बहुत महत्व है. इस लिहाज से देखें, तो पशुपति पारस का निर्णय चुनावी दंगल में भुनाने वाला प्रतीत होता है, क्योंकि पार्टी ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि वह कितने सीटों पर चुनाव लड़ेगी, वह अभी 243 सीटों पर चुनाव की तैयारी कर रही है, यानी पार्टी सभी विधानसभा क्षेत्र में जाएगी और अपनी ताकत को आजमाएगी और फिर चुनाव की घोषणा के बाद उस ताकत को भुनाएगी. पशुपति पारस ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि अब वे एनडीए के साथ नहीं आएंगे, बल्कि उन्होंने यह कहा है कि जहां सम्मान मिलेगा वे वहां जाएंगे. इस लिहाज से चुनाव में 10-15 सीट की डिमांड वे करेंगे, अभी की स्थिति में यह प्रतीत होता है.
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लेखक के बारे में
By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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