देश में आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त हुईं महिलाएं, लेकिन 22.3% अभी भी पतियों से पिट रहीं
Published by : Rajneesh Anand Updated At : 02 Jun 2026 6:21 PM
NFHS 6 में महिलाओं की स्थिति
NFHS-6 : किसी भी समाज का असली चेहरा वहां की महिलाओं की स्थिति से पता चलता है. इसी वजह से NFHS-6 के आंकड़ों में सबसे पहले मेरी नजर महिलाओं के सशक्तिकरण और उनके साथ होने वाली हिंसा पर गई. बेशक महिलाएं आर्थिक और सामाजिक रूप से समृद्ध हुई हैं, लेकिन अभी भी वे अपने पतियों से पिट रही हैं.
NFHS-6 : राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6, 2023-24) का आंकड़ा सरकार ने 29 मई को जारी कर दिया है. इन आंकड़ों को देखें तो हम पाते हैं कि देशभर में महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में काफी बदलाव आया है. अब वे काफी मजबूती से अपनी बातों को रख रही हैं, बावजूद इसके एक आंकड़ा चौंकाने वाला है, जो यह बताता है कि देश की 22.3% प्रतिशत महिलाएं अपने पतियों से पिट रही हैं.
क्या कहता है NFHS-6 का आंकड़ा
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों पर नजर डालें तो वह कहता है कि वैसी विवाहित महिलाएं, जो अपने घरेलू फैसलों में निर्णय लेने की भूमिका में हैं, उनकी संख्या शहरी इलाकों में 91.4% है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 88% का है. शहरी और ग्रामीण दोनों महिलाओं को मिला दें तो यह आंकड़ा 89% हो जाता है. NFHS-5 पर अगर नजर डालें तो यह आंकड़ा महज .3% प्रतिशत वृद्धि की बात करता है, जहां यह आंकड़ा 88.7% का है.बिहार में यह आंकड़ा 85.1 प्रतिशत है, झारखंड में यह 92.9 प्रतिशत तक पहुंच चुका है. वहीं अगर बात 12 महीने काम करने के बाद उन्हें कैश वेतनमान देने की बात आती है, तो आंकड़े सुखद है और NFHS-5 से 5% वृद्धि की बात कहते हैं. NFHS-5 में जहां 25.4 प्रतिशत महिलाओं को कैश पेमेंट मिल रहा था, वह अब 30.8 प्रतिशत हो गया है. यहां गौर करने वाली बात यह है कि ग्रामीण महिलाएं इस मामले में शहरी महिलाओं से आगे हैं, उन्हें 31.2 प्रतिशत कैश भुगतान हो रहा है, जबकि शहरी महिलाओं को 29.8 प्रतिशत.
बैंक एकाउंट और मोबाइल रखने के मामले में भी महिलाएं आगे
बैंक एकाउंट की अगर बात करें तो महिलाएं इसमें भी सशक्त होती नजर आ रही हैं. NFHS-6 के आंकड़ों के अनुसार 89 प्रतिशत महिलाएं ऐसी हैं, जो अपने बैंक एकाउंट का इस्तेमाल खुद कर रही हैं, इनमें 88.3 प्रतिशत शहरी और 89.3 प्रतिशत शहरी हैं. NFHS-5 की तुलना में बड़ा बदलाव हमें देखने को मिल रहा है. मोबाइल फोन रखने के मामले में भी 10 प्रतिशत की वृद्धि दिख रही है. NFHS-5 में जहां 53.9 प्रतिशत महिलाओं के पास फोन था वह अब बढ़कर 63.6 प्रतिशत हो गया है. यहां शहरी महिलाओं की भागीदारी 77.6 प्रतिशत की है, जबकि ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी 57.4 प्रतिशत की है.बिहार में बचत खाते वाली महिलाओं की हिस्सेदारी 76.7 प्रतिशत से बढ़कर 90.9 प्रतिशत हो गई है. इसी तरह मोबाइल फोन का स्वयं उपयोग करने वाली महिलाओं का प्रतिशत 51.4 से बढ़कर 62.8 हो गया. झारखंड में यह सुधार और भी अधिक दिखाई देता है. वहां बैंक खाते वाली महिलाओं की हिस्सेदारी 78.2 प्रतिशत से बढ़कर 91.2 प्रतिशत पहुंच गई है, जबकि मोबाइल फोन का स्वयं उपयोग करने वाली महिलाओं का प्रतिशत 76.4 से बढ़कर 90.3 हो गया है.
पतियों से पिटने का मामला अभी भी चौंका रहा
देश भर में 22.3 प्रतिशत महिलाएं ऐसी हैं, जो अपने पतियों से पिटती है. इन महिलाओं में 24.4 प्रतिशत ग्रामीण और 17.5 प्रतिशत शहरी महिलाएं हैं. बेशक पिछले सर्वे के अनुपात में पतियों से पिटने वाली महिलाओं की संख्या कम हुई है और इसमें लगभग 7 प्रतिशत की गिरावट दिख रही है. लेकिन राज्यों में अभी भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है.बिहार में पति द्वारा हिंसा का अनुभव करने वाली विवाहित महिलाओं का प्रतिशत 40.1 से घटकर 36.1 प्रतिशत हुआ है. इनमें ग्रामीण इलाकों की महिलाएं 37 प्रतिशत और शहरी 31.2 प्रतिशत हैं.यह आंकड़ों में सुधार को बताता है, लेकिन यह भी बताता है कि समाज में अभी भी वैवाहिक हिंसा जारी है. झारखंड में कुल 27 प्रतिशत महिलाएं अपने पतियों से पिट रही हैं, जिनमें 29.2 प्रतिशत ग्रामीण और 18.2 प्रतिशत शहरी महिलाएं हैं. NFHS-5 में यह आंकड़ा 31.4 प्रतिशत का था, यानी 4.4 प्रतिशत की कमी पिटने की घटनाओं में आई है.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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