1986 की बात है, एक एयर होस्टेस थीं नीरजा भनोट; जो 360 लोगों की जान बचाते हुए कुर्बान हुईं

Published by : Rajneesh Anand Updated At : 15 Jun 2025 1:37 PM

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नीरजा भनोट

Neerja Bhanot Story Of Bravery : एविशन की दुनिया में नीरजा भनोट एक ऐसा नाम है, जिसकी चर्चा हमेशा होती रहती है. नीरजा भनोट एक ऐसी फ्लाइट पर्सर यानी सीनियर एयर होस्टेस थीं, जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए किए 1986 में हुए एक विमान अपहरण की घटना में 360 लोगों की जान बचाई थी. कराची के जिन्ना हवाई अड्डे पर मुंबई से उड़ान भरने वाले विमान का हाइजैक फिलिस्तीनी आतंकवादियों ने कर लिया था. नीरजा भनोट ने बेमिसाल काम किया था और शहीद हुई थीं.

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Neerja Bhanot Story Of Bravery : नीरजा भनोट एक भारतीय एयर होस्टेस थीं, जिन्होंने 5 सितंबर 1986 को Pan Am Flight 73 के अपहरण के दौरान अपनी जान की परवाह न करते हुए 360 यात्रियों की जान बचाई थी. नीरजा भनोट अगर चाहती तो सबसे पहले अपनी जान बचातीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और यात्रियों को पहले बाहर निकाला. उनके इस प्रयास से यात्रियों की जान तो बच गई, लेकिन नीरजा भनोट नहीं बचीं, उनकी मौत उनके जन्म दिन के महज दो दिन पहले हो गई थी. जिस वक्त उनकी मौत हुई वो महज 22 वर्ष की थीं.

नीरजा भनोट जिस विमान की एयर होस्टेस थीं उसके साथ क्या हुआ था?

Pan Am Flight 73
Pan am flight 73

नीरजा भनोट एक फ्लाइट पर्सर थी यानी वह क्रू मेंबर्स में सबसे सीनियर थी और वह सभी एयर होस्टेस के कार्यों पर निगरानी रखती थी और उनकी हेड थी. 5 सितंबर 1986 को Pan Am Flight 73 में नीरजा अपनी सेवा देने के लिए सवार हुई थीं. Pan Am Flight 73 एक अमेरिकी फ्लाइट थी और यह मुंबई से न्यूयार्क के लिए जा रही थी. इस प्लाइट को मुंबई के बाद कराची, पाकिस्तान रूकना था और फिर फ्रैंकफर्ट और फिर न्यूयार्क जाना था. मुंबई से यह फ्लाइट अच्छे से निकल गई थी. कराची में जब फ्लाइट ने ब्रेक लिया और वहां से यात्रियों को लेने के बाद उड़ान भरने वाली थी, तभी चार फिलिस्तीनी आतंकवादी फ्लाइट में घुस गए और प्लेन को हाइजैक कर लिया था. ये आतंकवादी अबू निदाल संगठन (Abu Nidal Organization – ANO) से जुड़े थे. इनका उद्देश्य अमेरिकी नागरिकों और उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाकर अमेरिकी जेलों में बंद फिलीस्तीनी कैदियों को रिहा करना था. यह संगठन उस समय फिलीस्तीनी उग्रवादी गतिविधियों में शामिल था और काफी कुख्यात भी था. कैदियों की रिहाई के अलावा ये आतंकवादी फिलिस्तीनी मुद्दे के प्रति विश्व का ध्यान भी खिंचना चाहते थे. आतंकवादी यह चाहते थे कि विमान को हाईजैक करके उसे साइप्रस या इजराइल की ओर ले जाया जाए और वहां बड़ी डील की जा सके.

नीरजा की समझदारी से आतंकवादियों की योजना हुई विफल

Pan Am Flight 73 जब कराची में ब्रेक जर्नी पर था, तो 4 आतंकवादी फ्लाइट में घुस आए थे. जैसे ही आतंकी फ्लाइट में घुसे फ्लाइट पर्सर नीरजा भनोट ने इसकी सूचना अपने कैप्टन को दे दी. फ्लाइट के कैप्टन को जैसे ही यह सूचना मिली वे कॉकपिट के छत में बनी एक आपातकालीन खिड़की ( overhead hatch) से निकल भागे, जिसकी वजह से आतंकवादी फ्लाइट को अपनी इच्छानुसार साइप्रस की ओर नहीं ले जा पाए. इससे नाराज होकर आतंकवादियों ने यात्रियों को बंधक बना लिया और पूरे विमान में दहशत का माहौल बना दिया. उस वक्त विमान में बूढ़े, जवान और बच्चे भी शामिल थे. चूंकि विमान के कैप्टन वहां से बचकर निकलकर भागे थे, इसलिए नीरजा भनोट उनमें सबसे सीनियर थी, इसलिए उसने मोर्चा संभाला और आतंकवादियों से रिक्वेस्ट करने लगी कि वे यात्रियों को छोड़ दे. फ्लाइट से बचकर भागे कैप्टन ने पाकिस्तानी एविशन विभाग को घटना की पूरी जानकारी दी और मदद मांगा.

नीरजा ने बचाई 360 लोगों की जिंदगी और खुद हुई कुर्बान

Neerja-Bhanot-story
नीरजा बनीं सबके लिए प्रेरणा

एयर होस्टेस नीरजा भनोट ने अपनी समझदारी और सूझबूझ से विमान पर सवार 380 लोगों में से 360 की जान बचा ली थी, भले ही उन्हें खुद अपनी कुर्बानी देनी पड़ी. आतंकवादियों ने 17 घंटे तक विमान को हाईजैक रखा और जब रात को विमान की बिजली डिस्चार्ज होने लगी तो उन्होंने फायरिंग शुरू कर दी. इससे पहले आतंकवादियों ने एक भारतीय अमेरिकी नागरिक को ऊपर से फेंक कर गोली मार दी थी. उन्होंने नीरजा भनोट से यह कहा कि वह यात्रियों से उनका पासपोर्ट जमा करवाए, ताकि अमेरिकियों की पहचान कर उन्हें मारा जा सके. उस वक्त नीरजा भनोट ने उनका पासपोर्ट छुपा कर उन्हें बचाया था. रात को जब फ्लाइट की बिजली बंद होने लगी तो आतंकवादियों ने फायरिंग शुरू कर दी, नीरजा ने उन्हें समझाकर फायरिंग रोकने को कहा, लेकिन उन्होंने फायरिंग नहीं रोकी. तब नीरजा ने इमरजेंसी डोर खोलकर यात्रियों को वहां से निकालना शुरू किया. वह सभी यात्रियों को आतंकवादियों से बचाकर वहां से निकाल रही थी. उसने बच्चों और बूढ़ों को वहां से निकाला. जब वह तीन बच्चों को गार्ड करके वहां से निकाल रही थी, तो एक आतंकी दे उसे देख लिया और उसे बाल पकड़कर खिंचा और गोली मार दी. गोली लगने से पहले नीरजा ने फ्लाइट के अधिकतर यात्रियों को बाहर निकाल दिया तब तक पाकिस्तानी कमांडो विमान में घुस गए और आतंकियों को पकड़ लिया, लेकिन इस विमान पर सवार 380 लोगों में से 360 की मौत हो गई, जिनमें से नीरजा भनोट भी एक थीं.

नीरजा बनीं सबके लिए प्रेरणा

नीरजा भनोट को भारत सरकार ने 1987 में सिविलियन को दिया जाने वाला सर्वोच्च पुरस्कार अशोक चक्र प्रदान किया. वह सबसे कम उम्र में यह पुरस्कार पाने वाली पहली महिला हैं. उनके बाद भी यह पुरस्कार मात्र एक महिला कमलेश कुमार यादव को मिला है, जो संसद पर हुए हमले में शहीद हो गई थीं. कमलेश कुमार यादव सीआरपीएफ की जवान थीं. नीरजा भनोट को पाकिस्तान सरकार ने भी अपना चौथा सर्वोच्च पुरस्कार तमगा-ए-इंसानियत, 1987 में प्रदान किया. अमेरिकी सरकार ने नीरजा को फ्लाइट सेफ्टी फाउंडेशन हीरोइज्म अवार्ड 1987 प्रदान किया था. नीरजा एक पत्रकार की बेटी थीं, उनका जन्म चंडीगढ़ में हुआ था, लेकिन पूरी पढ़ाई मुंबई में हुई थी. नीरजा ने फ्लाइट में जिन बच्चों की जान बचाई, उनमें से एक 7 साल का बच्चा था, जो आगे चलकर एक प्रमुख विमान कंपनी का पायलट बना, उसने यह बयान दिया है कि उसकी जिंदगी का हर दिन नीरजा भनोट का शुक्रगुजार है. वह नीरजा को अपनी प्रेरणा मानता है और उसकी को ध्यान में रखकर उसने अपना करियर चुना. नीरजा के बारे में कहा जाता है कि वह राजेश खन्ना की बहुत बड़ी फैन थीं और हमेशा उनके डायलाॅग बोला करती थीं, अपनी मां को भेजे अपने लास्ट संदेश में भी उन्होंने कहा था-पुष्पा आई हेड टियर्स.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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