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Ho Tribe: कन्या भ्रूण हत्या से कोसों दूर हो जनजाति के लोग, बेटियों के जन्म पर मनाते हैं जश्न

Updated at : 08 Mar 2025 4:04 PM (IST)
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feature photo ho tribe of jharkhand

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Ho Tribe: झारखंड का पश्चिमी सिंहभूम, ऊंची-ऊंची पहाड़ियों और जंगलों से भरा खूबसूरत जिला. यहां की हो जनजाति इसकी खूबसूरती को और बढ़ाती हैं. इस जिले की खासियत है, यहां भ्रूण हत्या के मामले सबसे कम हैं. यही कारण है, यहां महिलाओं की संख्या अधिक है.

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Ho Tribe: भारत में कन्या भ्रूण हत्या एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आई है. सामाजिक कुरीतियों, भ्रान्तियों और बेटों की चाह में बेटियों को कोख में ही मार दिया जाता है. हर साल इससे जुड़े कई मामले सामने आते रहते हैं. देश के कई राज्य ऐसे हैं, जहां महिलाओं की संख्या लगातार कम हो रही हैं. लेकिन झारखंड का एक ऐसा जिला है, जहां महिलाओं की संख्या, पुरुषों की तुलना में अधिक है. झारखंड का पश्चिमी सिंहभूम, जिसका लिंगानुपात 2011 की जनसंख्या के अनुसार प्रति 1000 पुरुषों में महिलाओं की संख्या 1005 है. ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि यहां भ्रूण हत्या के मामले कम ही नहीं, बल्कि न के बराबर हैं. लिंगानुपात को बढ़ाने में यहां की हो जनजाति का खास योगदान है. पश्चिमी सिंहभूम में लिंगानुपात और महिलाओं की सामाजिक स्थिति को समझने के लिए मैं चाईबासा पहुंच गया. वहां के कई गांवों का दौरा भी किया. हो जनजाति की महिलाओं और पुरुषों से बात भी की. मैंने वहां देखा कि लगभग सभी गांव में बेटियों-महिलाओं की संख्या, पुरुषों की तुलना में अधिक है.

झारखंड के टॉप 10 लिंगानुपात वाले जिले 2011 की जनगणना
झारखंड के टॉप 10 लिंगानुपात वाले जिले 2011 की जनगणना

पितृ प्रधान है हो जनजाति 

हो जनजाति पितृ प्रधान है. इतिहासकार डॉ बालमुकुंद वीरोत्तम के अनुसार हो समाज आरंभ में मातृसत्तात्मक थी, बाद में वंश परंपरा पितृसत्तात्मक हो गई. 

हो जनजाति में महिलाओं को प्राप्त है सर्वोच्च स्थान: डॉ दमयंती सिंकु 

जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संकाय ‘हो विभाग’ की सहायक प्राध्यापक और हो जनजाति की डॉ दमयंती सिंकु ने बताया, “हो जनजाति में महिलाओं को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है. कोल्हान की महिलाएं काफी जागरूक हैं. लड़का और लड़कियों के बीच भेद-भाव हो जनजाति में नहीं है. जो खुशी लड़के के जन्म लेने पर मनाई जाती है, वही खुशी एक लड़की के जन्म लेने पर मनाई जाती है. परिवार में दोनों का दर्जा बराबर है, दोनों समान दृष्टि से देखे जाते हैं. महिलाओं के बिना परिवार या समाज में कोई भी नेक कार्य संपन्न नहीं किया जा सकता है. चाहे गरीब से गरीब परिवार हो, मध्यमवर्गीय परिवार हो या फिर अमीर, भ्रूण हत्या या फिर गर्भपात जैसे अपराध से कोसों दूर हैं.”

dr-damyanti-sinku
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हो जनजाति में लड़की के परिवार को दिया जाता है कन्या मूल्य  

हो जनजाति में कन्या मूल्य देने की परंपरा है. डॉ दमयंती सिंकु बताती हैं, “बहुत से समाज में विवाह के लिए लड़के खोजे जाते हैं, लेकिन हो समाज में लड़का वाले, लड़कियों के घर, विवाह का प्रस्ताव लेकर आते हैं. विवाह तय होने के बाद दुल्हन को लेने वर पक्ष से ‘ओर एरा ‘ आते हैं. दुल्हन के साथ परिवारजन, सगे संबंधियों को ससम्मान लेने आते हैं और वर के घर विवाह संपन्न होता है. हालांकि समय के साथ इसके स्वरूप में बदलाव देखा जा रहा है.” उन्होंने आगे बताया, “विवाह के बदले कन्या मूल्य के रूप में ‘गोनोंग’ दिया जाता है. लड़का वाले, लड़की के परिवार को गोनोंग यानी कन्या मूल्य देते हैं. वो भी बहुत मामूली. 101 रुपये और एक जोड़ी बैल देने का रिवाज है. आज भी इसी परंपरा के साथ हो जनजाति में विवाह होती है.”

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Jagnanath

महिलाओं पर ही निर्भर हैं हो जनजाति : जगन्नाथ

हो भाषा के जानकार और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कराने वाले जगन्नाथ का कहना है, “हो जनजाति, महिलाओं पर ही निर्भर है. घर चलाना हो या संस्कृति को आगे बढ़ाने की बात हो, तो इसमें महिलाएं ही आगे हैं. आतिथ्य सत्कार हो, विवाह संस्कार हो या फिर जो भी हमारे समाज की संस्कृति है, उसे महिलाएं ही सुरक्षित रखती हैं. यही कारण है कि जब बेटी का जन्म होता है, तो हमारे समाज में खुशी मनाई जाती है.”

Jawaharlal Bankira
Jawaharlal bankira

महिलाओं की संख्या अधिक होने की वजह हो जनजाति की सभ्यता और संस्कृति: जवाहर लाल बांकिरा 

हो और हिंदी भाषा के साहित्यकार जवाहर लाल बांकिरा का कहना है, “महिलाओं की संख्या अधिक होने के पीछे, हो जनजाति की सभ्यता और संस्कृति है. यहां पर लिंग को लेकर भेदभाव नहीं है. बचपन से मैंने इसे नहीं देखा है. मेरे घर की ही बात करें, तो मेरी बड़ी बहन एमएससी तक पढ़ाई की और सरकारी नौकरी की. हमारे घर में बेटियां ही अधिक पढ़ी-लिखी हैं. कॉजेल में पढ़ाने वालों में भी महिलाएं ही अधिक हैं. परिवार में महिलाओं को उतनी ही स्वतंत्रता पढ़ने-लिखने की है, जो एक बेटे को प्राप्त है. हो जनजाति कृषि पर निर्भर होते हैं, वैसे में कृषि कार्य करने में महिलाओं की अधिक आवश्यकता होती है, उनका सहयोग समाज में महत्वपूर्ण होता है.” 

हो जनजाति की महिलाएं होती हैं आत्म निर्भर

हो जनजाति में बेटियों का स्थान बेटों से कहीं ज्यादा होता है. बेटियां और महिलाएं घर की रीढ़ मानी जाती हैं. चाहे घर के काम हों या घर से बाहर, सभी में महिलाओं का अहम रोल रहता है. हो जनजाति में बेटियों को भार नहीं समझा जाता है, बल्कि उन्हें घर को आगे बढ़ाने वाला, मजबूती देने वाला माना जाता है. हो जनजाति की महिलाएं, पुरुषों की तुलना में अधिक पढ़ी-लिखी होती हैं. स्कूल-कॉलेजों में आज हो जनजाति की महिलाएं-बेटियां पढ़ते-पढ़ाते दिखती हैं. अगर नौकरी लगी तो ठीक, नहीं तो खुद के व्यवसाय से भी कई महिलाएं जुड़कर अपना घर चला रही हैं. चाईबासा शहर में ट्राइबल ड्रेस की दुकान चलाने वाली मंजूश्री बताती हैं कि उन्होंने शादी नहीं की है और खुद का व्यवसाय करती हैं. मंजू के पिता रेलवे में कार्यरत थे, लेकिन आत्म निर्भर बनने के लिए वो दुकान चलाती हैं. मंजू बताती हैं, उन्होंने शादी नहीं की है. कारण पूछने पर बताया, हो जनजाति में बेटियों को विवाह के लिए दबाव नहीं डाला जाता है. बीएससी आईटी कर चुकीं मंजू का कहना है, उनके समाज में बेटियां ही घर चलाती हैं, इसलिए मां-पिता उनपर किसी भी तरह का दबाव नहीं डालते हैं. पढ़ाई से लेकर काम करने तक सभी में छूट देते हैं. यही कारण है कि यहां की महिलाएं सबसे आगे हैं. 

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Ho-tribe

न केवल हो जनजाति में बल्कि पूरे विश्व में महिलाओं की संख्या अधिक होनी चाहिए: शांति सिदू

हो जनजाति की शांति सिदू, जो किसानों को जागरूक करने का काम करती हैं, उनका कहना है कि न केवल हो जनजाति, बल्कि पूरे विश्व में लड़कियों की संख्या अधिक होनी चाहिए. अभी हमारा समाज थोड़ा शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा है, जिसपर काम करने की जरूरत है. 

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Ho-tribe-girls

खेल में भी आगे हैं हो जनजाति की बेटियां

हो जनजाति की लड़कियां खेल में भी आगे हैं. यहां की लड़कियां आर्चरी में आगे हैं. जानो पूर्ति, जो की चाईबासा की रहने वाली हैं, उन्होंने 2013 में असम में जूनियर नेशनल आर्चरी चैंपियनशिप में हिस्सा लिया था. जानो फिलहाल अपने पति के साथ यूवा खिलाड़ियों को आर्चरी का प्रशिक्षण दे रही हैं. उनकी छोटी बहन अप्रेल भी आर्चरी की खिलाड़ी हैं. जूनियर टीम में राज्य का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं. जानो पूर्ति बताती हैं – “उनके समाज में लड़कों की तुलना में लड़कियां आगे हैं. बेटियों के जन्म लेने पर परिवार वाले ये सोचते हैं कि घर को आगे बढ़ाने वाली का जन्म हो गया. इसलिए बेटियों के जन्म लेने पर खुशी और जश्न मनाया जाता है.” चार बहन और दो भाई में सबसे बड़ी जानो का कहना है, “उनके समाज में बेटियों को स्वतंत्र छोड़ दिया जाता है, वो जो करना चाहती हैं खुलकर कर सकती हैं. अगर लड़कियां पढ़ना चाहती हैं तो परिवार का पूरा सपोर्ट मिलता है, उसी तरह अगर खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहती हैं, तो उन्हें पूरा मौका दिया जाता है. उनके माता-पिता के सपोर्ट से ही वो आर्चरी में राज्य का प्रतिनिधित्व कर पाई हैं.”

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ArbindKumar Mishra

लेखक के बारे में

By ArbindKumar Mishra

मुख्यधारा की पत्रकारिता में 14 वर्षों से ज्यादा का अनुभव. खेल जगत में मेरी रुचि है. वैसे, मैं राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खबरों पर काम करता हूं. झारखंड की संस्कृति में भी मेरी गहरी रुचि है. मैं पिछले 14 वर्षों से प्रभातखबर.कॉम के लिए काम कर रहा हूं. इस दौरान मुझे डिजिटल मीडिया में काम करने का काफी अनुभव प्राप्त हुआ है. फिलहाल मैं बतौर शिफ्ट इंचार्ज कार्यरत हूं.

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