भैयाजी जोशी के बयान पर क्यों हो रही है राजनीति, क्या है मराठा अस्मिता?

Edited by Rajneesh Anand
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शिवाजी

Bhaiyyaji Joshi : मराठा अस्मिता का इतिहास 12वीं शताब्दी से जुड़ा है, जब संत ज्ञानेश्वर और तुकाराम ने मराठी में साहित्य लिखा और मराठी भाषा को बढ़ावा दिया. बाद में छत्रपति शिवाजी ने मराठा अस्मिता को खूब बढ़ावा दिया, जिसे स्वराज की मांग करते हुए आजादी की लड़ाई में बाल गंगाधर तिलक ने फिर से स्थापित किया. उन्होंने गणपति महोत्सव को सार्वजनिक तौर पर मनाने की शुरुआत करके मराठा अस्मिता को मजबूती दी.

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Bhaiyyaji Joshi : राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के पूर्व सरकार्यवाह और वरिष्ठ सदस्य भैयाजी जोशी के मराठी भाषा को लेकर दिए गए बयान से बड़ा बवाल मच गया है. दरअसल उन्होंने मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान यह कहा कि मुंबई की एक भाषा नहीं है और यह जरूरी नहीं है कि मुंबई में रहने वाले को मराठी सीखना ही पड़े. भैयाजी जोशी के इस बयान के बाद विपक्ष बीजेपी पर हमलावर हो गया है और इसे मराठी भाषा और मराठी अस्मिता का अपमान बता रहा है. विधानसभा में भी इस मसले को लेकर विपक्ष, सत्तापक्ष पर हमलावर रहा. 

विवाद बढ़ने के बाद भैयाजी जोशी ने सफाई दी और कहा कि मेरे बयान को गलत तरीके से पेश किया गया है. मेरी मातृभाषा मराठी है, लेकिन मैं सभी भाषाओं का सम्मान करता हूं. उन्होंने कहा कि भारत में इतनी भाषाएं बोली जाती हैं और मुंबई उसका एक उदाहरण है, इसके अलावा मैं कुछ कहना नहीं चाहता. विधानसभा में मुख्यमंत्री फड़नवीस ने भी कहा कि महाराष्ट्र की भाषा मराठी है और यहां रहने वाले लोगों को मराठी सीखनी चाहिए.

Bhiyaji Joshi
भैयाजी जोशी

मराठी और मराठा अस्मिता का इतिहास 

मराठी भाषा और मराठा अस्मिता का इतिहास काफी पुराना है. मराठा अस्मिता महाराष्ट्र की भाषा, संस्कृति और वहां के सामाजिक पहचान से जुड़ा है. मराठा अस्मिता की अलग पहचान के लिए 12वीं शताब्दी में संत ज्ञानेश्वर और तुकाराम जैसे संतों ने मराठी भाषा में लेखन करके मराठा अस्मिता को एक अलग पहचान दी और इसे सशक्त भी किया. लेकिन छत्रपति शिवाजी ने सबसे अधिक मराठा अस्मिता की पहचान को बुलंद किया और पूरे जोर-शोर से इसके लिए आवाज उठाई.

छत्रपति शिवाजी ने मराठा अस्मिता को स्थापित किया

छत्रपति शिवाजी ने मराठा अस्मिता का मुद्दा अपने समाज के लोगों को संगठित करने के लिए किया. उन्होंने मराठा अस्मिता को एक मजबूत राजनीतिक, सैन्य और सांस्कृतिक पहचान दी. इसके लिए उन्होंने एक स्वतंत्र मराठा राज्य की स्थापना की और मराठी भाषा और संस्कृति को बढ़ावा दिया. उन्होंने मराठा अस्मिता को लोगों के स्वाभिमान से जोड़ दिया, जिसकी वजह से मराठा अस्मिता का खूब प्रचार हुआ और लोगों ने खुद को इससे जुड़ा हुआ महसूस किया. यह एक तरह से आंदोलन बन गया और महाराष्ट्र की पहचान बन गया. वही मराठा अस्मिता आज भी महाराष्ट्र में कायम है. शिवाजी ने रायगढ़ में 1674 में छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक किया और मराठा स्वराज्य की स्थापना की, यह मराठा अस्मिता का प्रतीक बना. मराठी भाषा को प्रचारित करने के लिए उन्होंने इसे राजकाज की भाषा बना दिया था.

बाल गंगाधर तिलक ने गणपति महोत्सव की शुरुआत की

आजादी की लड़ाई में बाल गंगाधर तिलक ने मराठा अस्मिता को स्वराज का हथियार बनाया. उन्होंने घरों में मनाए जाने वाले गणपति महोत्सव को सार्वजनिक महोत्सव में बदला और शिवाजी के मराठा अस्मिता को पुर्नजागृत किया. शिवाजी दिवस मनाए जाने की शुरुआत भी उन्होंने की और उनकी छवि को स्वराज और स्वतंत्रता के नायक के रूप में स्थापित किया.

सामाजिक आंदोलन भी बना मराठा अस्मिता

19वी और 20वीं शताब्दी में ज्योतिबा फुले और डॉ बाबा साहेब अंबेडकर ने मराठी अस्मिता को सामाजिक आंदोलन का रूप दिया और समाज सुधार पर काम हुआ. आजादी के बाद मराठा अस्मिता का मुद्दा और बढ़ा. 1960 में जब महाराष्ट्र अलग राज्य का गठन हुआ तो इसने मराठा अस्मिता को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया. 1966 में बाल ठाकरे ने मराठा मानुष के हक की बात करके शिवसेना का गठन किया और उसके बाद से मराठा अस्मिता पर खूब राजनीति भी हुई. 

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लेखक के बारे में

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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