गांधी की हत्या के आठ दशक बाद भी आज उनकी राजनीति और विचारों को लेकर लोगों में मतभेद हैं. कोई उनके फैसलों पर सवाल उठाता है, कोई उनकी राजनीतिक रणनीति की आलोचना करता है, तो कोई उनके आर्थिक और सामाजिक विचारों से असहमत है. लेकिन इन तमाम मतभेदों के बावजूद एक बात दिलचस्प है कि राजनीति हो, समाज हो या विचार गांधी आज भी प्रासंगिक हैं.भूख हड़ताल हो, धरना हो या विरोध प्रदर्शन, आज के दौर में गांधी का आंदोलन मॉडल सिर्फ प्रासंगिक ही नहीं, बल्कि प्रभावी भी दिखाई देता है. जिस गांधी की राजनीति और विचारों से आज का एक बड़ा तबका असहमत है, उसी गांधी के सत्याग्रह, धरने और भूख हड़ताल जैसे तरीकों को आज के आंदोलनकारी अपना रहे हैं.क्या गांधी का आंदोलन मॉडल सिर्फ इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि आज भी सत्ता के सामने अपनी बात रखने का एक प्रभावी लोकतांत्रिक तरीका है? और अगर ऐसा है, तो इसकी वजह क्या है?इन सवालों को समझने के लिए हमने सीनियर जर्नलिस्ट और लेखक पुष्यमित्र से बात की.गांधी का विचार अहिंसा, आंदोलन का तरीका सत्याग्रहआज के दौर में गांधी की प्रासंगिकता को समझने के लिए सबसे पहले उनके विचार और आंदोलन के तरीकों के बीच अंतर समझना जरूरी है.गांधी का मूल विचार अहिंसा था, जबकि अपनी मांगों और विरोध को सामने रखने के लिए उन्होंने सत्याग्रह को एक तरीके के तौर पर इस्तेमाल किया.पुष्यमित्र कहते हैं कि गांधी के लिए अहिंसा एक सिद्धांत थी और सत्याग्रह उस सिद्धांत पर संघर्ष करने का तरीका.गांधी अपनी मांगों को लेकर अनशन करते थे, प्रदर्शन करते थे और सरकार पर नैतिक दबाव बनाने की कोशिश करते थे. लेकिन उनके आंदोलन में हिंसा की जगह नहीं थी.उनका मानना था कि अपनी मांगों के लिए संघर्ष जरूर किया जाए, लेकिन विरोध का तरीका ऐसा हो जिसमें दूसरे को नुकसान पहुंचाने के बजाय अपने सत्य और अधिकार के लिए शांतिपूर्ण तरीके से खड़ा हुआ जाए.यानी गांधी के लिए आंदोलन सिर्फ सरकार को झुकाने का जरिया नहीं था. वह आंदोलन के जरिए नैतिक दबाव बनाने में भी विश्वास करते थे.ये भी पढ़ें : रेप के बाद कैसा होना चाहिए विक्टिम का व्यवहार? जानें तेजपाल केस में क्यों अहम है हाई कोर्ट की टिप्पणीचौरी-चौरा से समझिए, गांधी के लिए अहिंसा कितनी जरूरी थीगांधी के आंदोलन के तरीके को समझने के लिए 1922 की चौरी-चौरा की घटना एक बड़ा उदाहरण है.असहयोग आंदोलन के दौरान उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसा हुई. प्रदर्शनकारियों ने पुलिस थाने में आग लगा दी, जिसमें कई पुलिसकर्मियों की मौत हो गई.गांधी ने जब देखा कि जिस आंदोलन की बुनियाद अहिंसा पर रखी गई थी, वह हिंसा की तरफ बढ़ रहा है, तो उन्होंने असहयोग आंदोलन वापस लेने का फैसला किया.इस फैसले से साफ होता है कि गांधी के लिए आंदोलन का लक्ष्य जितना महत्वपूर्ण था, उतना ही महत्वपूर्ण उसका तरीका भी था.यानी मांग सही हो सकती है, लेकिन अगर उसे हासिल करने के लिए हिंसा का रास्ता अपनाया जाए, तो गांधी उस तरीके को स्वीकार नहीं करते थे.और यही बात गांधी के आंदोलन मॉडल को आज के आंदोलनों से जोड़ने वाली सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है.आज के प्रदर्शनों में दिखता है गांधी का आंदोलन मॉडलअगर मौजूदा दौर के आंदोलनों की तुलना गांधी के आंदोलन के तरीकों से करें तो कई समानताएं नजर आती हैं.आज आंदोलनकारी शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखने की बात करते हैं. धरने और प्रदर्शन होते हैं और कई बार भूख हड़ताल को आंदोलन का हिस्सा बनाया जाता है. मंचों पर गांधी की तस्वीर लगती है और अहिंसा के रास्ते पर चलने की बात कही जाती है.अन्ना आंदोलन से लेकर जंतर-मंतर के आंदोलनों और झारखंड के छात्र आंदोलनों तक, अलग-अलग समय और अलग-अलग मुद्दों के बावजूद विरोध के तरीकों में कई समानताएं दिखाई देती हैं.लेकिन यहां एक सवाल यह भी है कि क्या सिर्फ भूख हड़ताल, धरना या गांधी की तस्वीर लगाने से कोई आंदोलन गांधीवादी हो जाता है?पुष्यमित्र के मुताबिक, किसी आंदोलन को गांधीवादी कहने के लिए उसके तरीके, उद्देश्य और विरोध की पूरी प्रक्रिया को देखना जरूरी है. आज के आंदोलनों को पूरी तरह गांधीवादी कहना सही नहीं होगा, लेकिन उनमें गांधी के आंदोलन के तरीकों की छाप जरूर दिखाई देती है.यानी आज के आंदोलन गांधी की हूबहू नकल नहीं कर रहे हैं, लेकिन विरोध के कई तरीकों में गांधी का प्रभाव अब भी दिखाई देता है.गांधी को अलग-अलग विचारधाराएं क्यों अपनाती हैं?यहां से गांधी की प्रासंगिकता का एक दूसरा पहलू सामने आता है.गांधी को किसी एक राजनीतिक विचारधारा में पूरी तरह बांधना आसान नहीं है. आजादी के बाद से गांधी को लेकर भारतीय राजनीति में लगातार बहस होती रही है. अलग-अलग राजनीतिक धाराओं ने कभी उनके फैसलों पर सवाल उठाए, तो कभी उनकी राजनीतिक रणनीति और विचारों की आलोचना की.इसके बावजूद गांधी लगातार सार्वजनिक जीवन और आंदोलनों में दिखाई देते रहे हैं.पुष्यमित्र कहते हैं कि गांधी किसी एक राजनीतिक विचारधारा से पूरी तरह जुड़े हुए नहीं हैं, बल्कि गांधीवादी विचार अपने आप में एक अलग विचारधारा है.यही वजह है कि अलग-अलग विचारों और उद्देश्यों वाले आंदोलन अपनी जरूरत के हिसाब से गांधी से कुछ न कुछ लेते हैं.कोई अहिंसा को अपनाया है, कोई सत्याग्रह के तरीके को, कोई भूख हड़ताल को और कोई गांधी की तस्वीर और प्रतीकों को अपने आंदोलन का हिस्सा बनाता है.इसलिए किसी आंदोलन को सिर्फ गांधी की तस्वीर या भूख हड़ताल के आधार पर गांधीवादी कहना सही नहीं होगा. लेकिन यह जरूर दिखाता है कि गांधी के आंदोलन के तरीके आज भी लोगों की राजनीतिक सोच का हिस्सा हैं.लेकिन क्या शांतिपूर्ण आंदोलन सच में ज्यादा प्रभावी है?यहां सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि आज के आंदोलनों में गांधी की छाप दिखाई देती है. बड़ा सवाल यह है कि क्या गांधी का यह तरीका आज भी सत्ता पर प्रभाव डालता है?कई बार यह आरोप लगता है कि सरकार लोगों की बात नहीं सुनती. लेकिन पुष्यमित्र के मुताबिक, यह कहना पूरी तस्वीर नहीं है.उनका मानना है कि सरकार तक अपनी बात पहुंचाने के लिए आंदोलन का तरीका भी महत्वपूर्ण होता है.पुष्यमित्र जंतर-मंतर के आंदोलनों का उदाहरण देते हैं. उनके मुताबिक, कई बार पुलिस की तरफ से बल प्रयोग या लाठीचार्ज हुआ, लेकिन आंदोलनकारियों ने हिंसा का जवाब हिंसा से नहीं दिया.किसान आंदोलन और अन्ना आंदोलन का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि लंबे समय तक शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग सरकार के सामने रखने से आंदोलन का नैतिक और लोकतांत्रिक प्रभाव बढ़ता है.उनके मुताबिक, अगर सरकार की तरफ से लाठीचार्ज या कोई कठोर कार्रवाई होती है तो वह सरकार का फैसला है. लेकिन आंदोलनकारी उसका जवाब कैसे देते हैं, यह उनके अपने नियंत्रण में होता है.यही गांधी की राजनीति के मूल सिद्धांत से भी जुड़ता है, दूसरा पक्ष क्या करता है, यह आपके नियंत्रण में नहीं है, लेकिन आप उसके जवाब में क्या करते हैं, यह आपके नियंत्रण में है.हिंसक आंदोलन में पीछे छूट जाता है मूल मुद्दापुष्यमित्र के मुताबिक, जिन आंदोलनों ने अहिंसा का रास्ता अपनाया, वे अपनी मांगों को ज्यादा प्रभावी तरीके से सरकार तक पहुंचाने में सफल रहे. लेकिन जब आंदोलन हिंसक हुआ तो उसका असर भी अलग रहा.क्योंकि जब कोई आंदोलन हिंसक हो जाता है तो सरकार के सामने मूल मांग से ज्यादा कानून-व्यवस्था का सवाल खड़ा हो जाता है.पुष्यमित्र अग्निवीर योजना के खिलाफ हुए प्रदर्शनों का उदाहरण देते हैं. बिहार के कई शहरों में प्रदर्शन के दौरान हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आई थीं. ऐसे मामलों में आंदोलन का मूल मुद्दा पीछे चला जाता है और चर्चा हिंसा, तोड़फोड़ और कानून-व्यवस्था पर केंद्रित हो जाती है.यानी आंदोलन की रणनीति सिर्फ इस बात को तय नहीं करती कि सरकार पर कितना दबाव बनेगा, बल्कि यह भी तय करती है कि सार्वजनिक बहस किस मुद्दे पर होगी.यही अंतर शांतिपूर्ण और हिंसक आंदोलनों के प्रभाव को अलग करता है.आंदोलन की सफलता सिर्फ मांग पूरी होने से तय नहीं होतीकिसी आंदोलन की सफलता का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि सरकार ने तुरंत मांग मान ली या नहीं.यह भी महत्वपूर्ण है कि आंदोलनकारी अपनी मांग को किस तरीके से सामने रखते हैं, कितने लंबे समय तक शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन जारी रखते हैं और सरकार पर किस तरह का लोकतांत्रिक और नैतिक दबाव बनाते हैं.लोकतंत्र में सरकार से असहमति जताना और उसके खिलाफ प्रदर्शन करना नागरिकों का अधिकार है. लेकिन उस असहमति को अनुशासित और अहिंसक तरीके से व्यक्त करना आंदोलन को ज्यादा प्रभावी बना सकता है.यानी किसी आंदोलन का असर सिर्फ उसके नतीजे से नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया से भी तय होता है जिसके जरिए वह अपनी बात जनता और सरकार के सामने रखता है.ये भी पढ़ें :एजुकेशन रिफॉर्म से कितनी बदलेगी बिहार की शिक्षा व्यवस्था? जानें कितना तैयार है मौजूदा सिस्टमगांधी की सबसे बड़ी प्रासंगिकता क्या है?आज के आंदोलनों को पूरी तरह गांधीवादी कहना सही नहीं होगा. आज के आंदोलन अपने मुद्दों, संगठन और राजनीतिक परिस्थितियों के हिसाब से अलग हैं.लेकिन जब कोई आंदोलनकारी शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखने की बात करता है, जब कोई भूख हड़ताल पर बैठता है, जब धरना और प्रदर्शन को विरोध का हथियार बनाया जाता है और जब गांधी की तस्वीर के साथ अहिंसा की बात होती है, तो वहां गांधी की विरासत साफ दिखाई देती है.यही गांधी की सबसे बड़ी प्रासंगिकता है.आजादी के इतने साल बाद भी भारतीय लोकतंत्र में लोगों के पास सत्ता के सामने अपनी बात रखने का एक ऐसा रास्ता मौजूद है, जिसमें हिंसा को जरूरी नहीं माना जाता.गांधी ने भारतीय समाज को सिर्फ आजादी की लड़ाई का इतिहास नहीं दिया. उन्होंने असहमति जताने, सत्ता से सवाल पूछने और अपनी मांगों के लिए संघर्ष करने का एक तरीका भी दिया.यही वजह है कि गांधी को लेकर राजनीतिक और वैचारिक बहस आज भी जारी है. कोई उनके विचारों की आलोचना करता है, कोई उनकी रणनीति पर सवाल उठाता है, लेकिन जब भी सड़क पर कोई बड़ा आंदोलन खड़ा होता है, गांधी किसी न किसी रूप में फिर दिखाई देने लगते हैं.यानी गांधी को लेकर बहस भले खत्म न हुई हो, लेकिन आंदोलनों की भाषा में उनका सत्याग्रह मॉडल आज भी जिंदा है.पढ़िए देश दुनिया और बिहार झारखंड की ओरिजिनल खबर