क्या नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के सवाल पूछने पर गृहमंत्री अमित शाह तत्काल जवाब देने के लिए बाध्य हैं?
अमित शाह और राहुल गांधी
Amit Shah vs Rahul Gandhi : चुनाव आयोग को सरकार ने इतनी इम्युनिटी क्यों दी? क्या इसके पीछे सरकार की कोई खास मंशा थी? लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने गृहमंत्री से यह सवाल पूछा और उनपर यह दबाव डाला कि वे जवाब देने के क्रम में पहले उनकी बातों का जवाब दें. यह विषय बुधवार से वायरल है.
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Amit Shah vs Rahul Gandhi : SIR के मुद्दे पर बुधवार को लोकसभा में गृहमंत्री अमित शाह और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी आमने–सामने थे, जिसकी वजह से शीतकालीन सत्र में गरमाहट आ गई. चर्चा एसआईआर पर हो रही थी और गृहमंत्री अमित शाह बोल रहे थे. उसी वक्त नेता प्रतिपक्ष ने उनसे पूछा कि वे यह बताएं कि चुनाव आयोग को फुल इम्युनिटी देने के पीछे मंशा क्या थी और हरियाण चुनाव के बारे में भी वो बताएं.
इसपर गृहमंत्री ने उनसे कहा कि मैं आपके सवालों का जवाब जरूर दूंगा, लेकिन मेरे बोलने का क्रम आप निर्धारित नहीं कर सकते, वो मैं अपनी मर्जी से तय करूंगा. इससे सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तनातनी शुरू हो गई और माहौल काफी गरम हो गया. उसके बाद अमित शाह और राहुल गांधी का वीडियो सोशल मीडिया में वायरल है. पक्ष–विपक्ष में बातें हो रही हैं, आइए समझते हैं कि अमित शाह ने जिस तरह राहुल गांधी को जवाब दिया, वह कितना उचित था?
क्या गृहमंत्री, नेता प्रतिपक्ष के सवालों का जवाब देने के लिए बाध्य हैं?
संसदीय प्रणाली में सरकार संसद के प्रति उत्तरदायी होती है. इस वजह से अगर नेता प्रतिपक्ष या कोई भी सांसद जब गृहमंत्री या किसी भी मंत्री से सवाल पूछते हैं, तो उसका जवाब देने के लिए वे बाध्य हैं. इस संबंध में और अधिक जानकारी देते हुए विधायी मामलों के जानकार अयोध्यानाथ मिश्रा ने बताया कि यहां गौर करने वाली बात यह है कि संसद नियमों से चलता है. प्रश्न पूछने के कई नियम और फाॅर्मेट हैं, जिनके आधार पर प्रश्न पूछे जाते हैं. गृहमंत्री या कोई भी और मंत्री उनका जवाब भी तय प्रक्रियाओं के आधार पर ही देता है. मसलन अगर कोई मंत्री से यह पूछ ले कि देश में कितने विकलांग हैं और उनके लिए सरकार ने क्या किया है, तो कोई भी मंत्री इसका जवाब तुरंत नहीं दे पाएंगे. इसके लिए उन्हें अपने विभाग में बात करनी होगी, आंकड़ों को देखना होगा और तब जाकर वे इस सवाल का सही जवाब दे पाएंगे. वैसे भी संसदीय नियमों के अनुसार सदन में कौन बोलेगा और कब बोलेगा यह केवल लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति तय करते हैं.
क्या सवालों के जवाब देने का क्रम राहुल गांधी तय कर सकते हैं?
राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष हैं और संसदीय प्रणाली में उनका बहुत मान है. परंपरा अनुसार उनकी बातों को ध्यान से सुना जाना चाहिए और उसका मान भी होना चाहिए, लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि वे गृहमंत्री अमित शाह को या किसी भी मंत्री को इस बात के लिए बाध्य नहीं कर सकते हैं कि वो अपना जवाब किस क्रम में दें. अयोध्या नाथ मिश्रा कहते हैं कि जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि सवाल पूछने के कई तरीके हैं. उनके आधार पर सवाल पूछा जाता है, लेकिन जवाब देने का क्रम नेता प्रतिपक्ष या कोई भी और तय नहीं कर सकता है. यह मंत्री की इच्छा पर निर्भर है कि वह किसी सवाल का जवाब दें.
असंसदीय भाषा का प्रयोग हो, तो क्या हो सकती है सजा?
संसद की नियमावली में असंसदीय भाषा उस तरह के शब्द,वाक्य या संकेत को कहते हैं, जिससे किसी व्यक्ति या समूह की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचती है. नियमावली में इसे काफी विस्तार से बताया गया है. समय के साथ कुछ शब्दों को सूचीबद्ध भी कर दिया गया है, जिन्हें असंसदीय माना जाता है. लोकसभा के Rule Book में तीन नियम के तहत असंसदीय भाषा और उसपर होने वाली कार्रवाई के बारे में बताया गया है. इन्हें रूल बुक में 380, 381 और 382 के तहत दर्ज किया गया है. संसद की कार्यवाही कैसे चलेगी इसे लेकर नियम खुद संसद ही बनाती है. संसद को यह अधिकार है कि वह यह तय करे कि कौन सा शब्द संसदीय है और कौन सा नहीं.
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अयोध्या नाथ मिश्रा बताते हैं कि कार्यवाही के दौरान कई बार कुछ ऐसे शब्द या वाक्य बोल दिए जाते हैं, जिससे कोई आहत हो जाता है. परंपरा अनुसार स्पीकर उसे कार्यवाही से निकाल देते हैं. वक्ता को माफी मांगने के लिए कह सकते हैं. अमूमन वक्ता माफी मांग लेते हैं और उसके बाद कार्यवाही सुचारू रूप से चलती है. अगर मामला ज्यादा बड़ा हो और वक्ता माफी भी ना मांगे तो निलंबन हो सकता है और अगर विषय बहुत गंभीर हो जाए, जिससे संसद की प्रतिष्ठा धूमिल होती हो तो फिर प्रीविलेज कमेटी यह तय करेगी कि क्या किया जाना चाहिए. जहां तक बात अमित शाह द्वारा असंसदीय शब्द के प्रयोग की है, तो वे काफी अनुभवी हैं और वे ऐसा करते नहीं हैं. जिस शब्द के प्रयोग की बात हो रही है, वो असंसदीय है, लेकिन तब जब उसका प्रयोग किसी दूसरे व्यक्ति के लिए किया जाए. अगर वे उस शब्द का प्रयोग किसी दूसरे अर्थ में करते हैं, तो उसे असंसदीय नहीं माना जाएगा.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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