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Bihar Election 2020: पिछड़ों ने सियासत में बनायी जगह, ब्राह्मण, कायस्थ व राजपूतों की भागीदारी हुई कम, देखें आंकड़ें

Updated at : 26 Oct 2020 9:06 AM (IST)
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Bihar Election 2020: पिछड़ों ने सियासत में बनायी जगह, ब्राह्मण, कायस्थ व राजपूतों की भागीदारी हुई कम, देखें आंकड़ें

Bihar Assembly Election 2020, Participation Of Cast in Chunav, Backward, Brahmins, Kayasthas, Rajputs Casts: पटना (राजदेव पांडेय) : बिहार की लोकतांत्रिक संस्थाओं में जाति व वर्ग वार राजनीतिक हिस्सेदारी तेजी से बदली है. पिछले साढ़े छह दशकों में पिछड़ी जातियों की राजनीतिक भागीदारी में क्रांतिकारी इजाफा हुआ है. इनकी भागीदारी 9.3 फीसदी से बढ़कर 46 फीसदी हो चुकी है. यूं कहें कि पिछड़ी जातियों ने राजनीति में अगड़ों की जगह हथिया ली है.

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Bihar Assembly Election 2020, Participation Of Cast in Chunav, Backward, Brahmins, Kayasthas, Rajputs Casts: पटना (राजदेव पांडेय) : बिहार की लोकतांत्रिक संस्थाओं में जाति व वर्ग वार राजनीतिक हिस्सेदारी तेजी से बदली है. पिछले साढ़े छह दशकों में पिछड़ी जातियों की राजनीतिक भागीदारी में क्रांतिकारी इजाफा हुआ है. इनकी भागीदारी 9.3 फीसदी से बढ़कर 46 फीसदी हो चुकी है. यूं कहें कि पिछड़ी जातियों ने राजनीति में अगड़ों की जगह हथिया ली है.

राजनीति में अगड़ों की हिस्सेदारी 46 से घटकर 20 फीसदी पर आ गयी है. एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस की लाइब्रेरी में रखी पुस्तक रेज ऑफ प्लेबिएंस पुस्तक के आंकड़ों से यह बात सामने आयी है. इस पुस्तक के लेखक क्रिस्टोफर जैफ्रियेट और संजय कुमार हैं. सियासी जानकारों के मुताबिक प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में आये इस बदलाव का चरम 2020 के विधानसभा में देखा जा सकता है.

यह देखते हुए कि इस चुनाव में सभी दलों ने पिछड़ों की ताकत पर ही ज्यादा भरोसा किया है. दूसरी तरफ से इसी समयावधि के दौरान अनुसूचित जाति की हिस्सेदारी 14 से 17 फीसदी के बीच स्थिर हो चुकी है. हालांकि, अतिपिछड़ा में अपेक्षा के अनुरूप भागीदारी नहीं मिल पा रही है. इधर, उच्च वर्ग की भागीदारी पिछले 65 वर्षों में घटकर आधे से भी कम रह गयी है. जानकारों के मुताबिक प्रदेश की राजनीति में मंडल कमीशन प्रभावी होने के बाद बिहार की राजनीति में असाधारण बदलाव आया.

अनुसूचित जाति की हिस्सेदारी में आया ठहराव सबसे बड़ा बदलाव

बिहार से बंगाली समुदाय की राजनीतिक हैसियत बिल्कुल खत्म हो चुकी है. 1952 के चुनाव में इनकी हिस्सेदारी 1.5 फीसदी थी. इसके बाद बढ़कर 2.5 फीसदी तक पहुंची. 1995 में शून्य हो गयी. यह स्थित यथावत है.

अपर कास्ट की घटी भागीदारी

1952 तक बिहार में अगड़ी जातियों की भागीदारी 46% से अधिक रही थी. 2015 में घटकर 20 फीसदी के आसपास सिमट गयी है. 1977 तक ऊंची जातियों की राजनीति में भागीदारी 40 फीसदी से ऊपर ही रही. इसके बाद समाजवादी राजनीति के दौर में इनकी भागीदारी 1990 तक 35 फीसदी और 1995 में इनकी हिस्सेदारी 21.8 फीसदी तक आ गयी. अब इसकी हिस्सेदारी 20 फीसदी तक सिमट गयी है. उच्च वर्ग में ब्राह्मणों,राजपूतों और कायस्थों की भागीदारी सबसे ज्यादा घटी है.

जातिवार भागीदारी प्रतिशत में.
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स्रोत: इस खबर में प्रयुक्त 1952 से 2018 के आंकड़े बिहार की ओबीसी राजनीति में आ रहे बदलाव को लेकर लिखी गयी रेज ऑफ प्लेबिएंस पुस्तक से लिये गये हैं. 2015 के आंकड़े निर्वाचन आयोग के आंकड़ों पर आधारित हैं.

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