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जंगल बचाने के लिए ग्रामीणों ने की थी 100 किलोमीटर की पदयात्रा

Updated at : 01 Apr 2020 12:05 PM (IST)
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जंगल बचाने के लिए ग्रामीणों ने की थी 100 किलोमीटर की पदयात्रा

100 किलोमीटर की इस पदयात्रा में 42 लोग शामिल थे. यह पदयात्रा 20 गांवों में पहुंची थीं. इस दौरान ग्रामीणों को वन बचाने के लिए जागरूक किया गया, वहीं वन रक्षा समिति बनायी गयी. हर साल वन रक्षाबंधन त्योहार मनाने का फैसला लिया गया.

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पवन कुमार

जंगलों को बचाने के लिए समय-समय पर देश में आंदोलन होते रहे हैं. झारखंड के रांची जिले में भी जंगलों को बचाने व वृक्षारोपण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए महादेव महतो की अगुवाई में वर्ष 2014 में पदयात्रा निकाली गयी थी. 100 किलोमीटर की इस पदयात्रा में 42 लोग शामिल थे. यह पदयात्रा 20 गांवों में पहुंची थीं. इस दौरान ग्रामीणों को वन बचाने के लिए जागरूक किया गया, वहीं वन रक्षा समिति बनायी गयी. हर साल वन रक्षाबंधन त्योहार मनाने का फैसला लिया गया. ओरमांझी प्रखंड के बनलोटवा गांव से इस पदयात्रा की शुरुआत हुई थी, जो मूटा, भुसूर, गणेशपुर, जयडीहा, डोहाकातू, चुटूपालू, ईचादाग, पिपराबंडा, बाघिनबंडा, बरबंडा होते हुए आरा–केरम गांव पहुंची थीं. आरा-केरम गांव में वनों की रक्षा को लेकर बेहतर कार्य हुआ है. आरा-केरम के बाद यह यात्रा सदमा गांव पहुंची. सदमा के बाद यह यात्रा कांके प्रखंड के गुड़गुड़चुआं गांव और वहां से हेसलपीरी, गेसवे होते हुए बुड़मू प्रखंड के उमेडंडा गांव तक पहुंची. ये पदयात्रा जिन-जिन गांवों में पहुंची, उनमें से कई गांवों में जंगल बचाने के लिए ग्रामीण जागरूक हुए और एकजुट भी हुए, लेकिन कुछ ऐसे भी गांव थे जहां के ग्रामीणों पर इसका विशेष असर नहीं हुआ और आज भी पेड़ों को काटने का कार्य बेरोक-टोक जारी है.

पदयात्रा -01

जंगल बचाने 1984 में ग्रामीण हुए थे एकजुट

बनलोटवा, ओरमांझी

वन क्षेत्र : 362 एकड़ 42 डिसमिल

गांव में जंगल बचाने के लिए वर्ष 1984 में ग्रामीण एकजुट हुए थे. ग्रामीणों के मुताबिक वर्ष 1954 में यहां भीषण अकाल पड़ा था. खाने के लिए अनाज नहीं मिल रहा था. उस वक्त ग्रामीण सखुआ के फल को उबाल कर गुड़ के साथ खाते थे. लकड़ी की भूसी की रोटी बनाकर खाने के लिए ग्रामीण मजबूर थे. साथ ही सखुआ के पत्तों को रांची में आकर बेचते थे. जंगल ही उनके जीने का एकमात्र जरिया था. इस घटना से ग्रामीणों की मानसिकता में बदलाव आया और ग्रामीण यह समझ गये कि जंगल उनके लिए कितना उपयोगी है. इसके बाद ग्रामीणों ने गांव के वन को संरक्षित करने का निर्णय लिया. वनों को बचाने के लिए ग्रामीणों को काफी संघर्ष करना पड़ा. कई बार मारपीट की नौबत तक आयी. जंगल को बचाने के लिए ग्रामीणों ने बैठक की और वर्ष 1999 में ग्रामीण वन रक्षा समिति, बनलवोटवा का गठन किया गया.

14 जनवरी को मनाया जाता है वन रक्षाबंधन

वर्ष 2014 में महादेव महतो बनलोटवा गांव पहुंचे. यहां ग्रामीणों को पेड़ व जंगल के प्रति जागरूक करने के लिए वन रक्षाबंधन की शुरुआत की. 150 एकड़ वनक्षेत्र में रक्षाबंधन किया जाता है. बाकी क्षेत्र से सूखी लकड़ियां व पत्ते ग्रामीण अपने इस्तेमाल के लिए लेकर आते हैं. जितनी जमीन पर वन रक्षाबंधन किया जाता है, वहां वन और वन्यजीवों का भी पूरा ख्याल रखा जाता है. सूखे पेड़ भी ग्रामीण नहीं काटते हैं. ग्रामीण बताते हैं कि वन में अभी लगभग 175 प्रजाति के पौधे हैं. जो जंगल पहले सिर्फ झाड़ियों से भरे थे, वहां अब बड़े-बड़े पेड़ लहलहा रहे हैं. मूटा गांव में 90 एकड़ वनक्षेत्र है. यहां हर साल 14 जनवरी को वन रक्षाबंधन मनाया जाता है. भुसूर गांव में 250 एकड़ वनक्षेत्र हैं. यहां 29 जनवरी को वन रक्षाबंधन मनाया जाता है. जयडीहा में 12 अप्रैल को वन रक्षाबंधन मनाया जाता है.

अब ग्रामीण हुए जागरूक : शंकर महतो

ग्राम वन सुरक्षा समिति के अध्यक्ष शंकर महतो बताते हैं कि उनकी दिनचर्या जंगल से शुरू होती है. अभी भी हर रोज सुबह वो जंगल जाकर वहां की निगरानी करते हैं. ग्रामीण खुद पेड़ों को बचाने के लिए जागरूक हैं और वन को बचाने में पूरा सहयोग करते हैं. सभी यह बात समझ चुके हैं कि वन है, तो जीवन है.

पदयात्रा -02

30 साल की मेहनत से जंगल हुआ हरा-भरा

गणेशपुर, ओरमांझी

वन क्षेत्र : 40 एकड़

ओरमांझी प्रखंड के गणेशपुर गांव में जंगल खत्म होने के कगार पर पहुंच गया था. वन क्षेत्र छोटा होने के कारण जंगल में सिर्फ छोटे-छोटे पेड़ ही बचे थे. जंगल के नाम पर सिर्फ ठूंठ और झाड़ियां ही दिखायी पड़ती थीं. जंगल नहीं होने से गणेशपुर गांव से ही मूटा गांव साफ दिखाई देता था. यह सोचकर गांव के ही बिशुन बेदिया ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर जंगल बचाने का फैसला किया. बिशुन बेदिया उस वक्त 12 साल के थे. पर, गांव के बच्चों का हौसला देख कर ग्रामीण भी मान गये और जंगल को बचाने की मुहिम शुरू हुई. ग्रामीणों ने जंगल से पेड़ काटना बंद किया और समूह बनाकर जंगल की देखरेख शुरू की. पेड़ जब बड़े हुए, तो दूसरे गांव के लोग पेड़ काटने के लिए आने लगे. इसके कारण कई बार संघर्ष भी हुआ, पर ग्रामीणों ने एकजुटता दिखायी और आज जंगल घने और हरे-भरे हैं.

11 अप्रैल को होता है वन रक्षाबंधन

वर्ष 2014 में जब पदयात्रा इस गांव में पहुंची थी, तो ग्रामीणों में जागरूकता आयी. इसके बाद से हर साल 11 अप्रैल को गांव में वन रक्षाबंधन मनाया जाता है. अब ग्रामीण जंगल से कच्ची लकड़ी तक नहीं लाते हैं. लकड़ी की जरूरत होने पर वन समिति को आवेदन देना पड़ता है. फिलहाल ग्रामीणों की 30 वर्ष की मेहनत से जंगल हरे-भरे हैं.

हम जंगल के महत्व को समझते हैं : बिशुन बेदिया

बिशुन बेदिया बताते हैं कि ग्रामीण पहले से ही वनों के महत्व को समझने लगे थे, लेकिन जब पदयात्रा गांव में पहुंची, तो लोग और जागरूक हुए. अब सभी मिलकर जंगल को बचाते हैं. वन रक्षाबंधन के दिन बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं……आगे पढ़ें अगले गांव की कहानी

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