योगी की वापसी सबके विश्वास की जीत

Published by : राम बहादुर Updated At : 11 Mar 2022 8:06 AM

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चार राज्यों में भाजपा की जीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर मुहर है और उनकी लोकप्रियता का सूचक भी. वर्ष 2024 में होनेवाले लोकसभा चुनाव में जीत का रास्ता भाजपा के लिए फिलहाल आसान दिख रहा है. राष्ट्रपति चुनाव में भी भाजपा का पलड़ा भारी रहेगा.

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चुनाव परिणाम एक्जिट पोल के अनुरूप ही रहे हैं. एक्जिट पोल से स्पष्ट हो गया था कि उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बना रही है. पिछली बार भाजपा गठबंधन को 325 सीटें मिली थीं. इस बार भी भाजपा गठबंधन ने पूर्ण बहुमत के साथ वापसी की है. उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों को दो-तीन दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है. प्रदेश में बहुत पहले कांग्रेस लगातार कई टर्म तक जीतती रही. लेकिन, 1989 के बाद कांग्रेस कभी उत्तर प्रदेश में वापसी नहीं कर पायी.

इस अवधि में कभी भाजपा, तो कभी जनता दल, कभी सपा या बसपा सत्ता में आते रहे हैं. लेकिन, यह पहला मौका है जब एक ही पार्टी के नेतृत्व पर उत्तर प्रदेश के लोगों ने विश्वास प्रकट किया है. वर्ष 1977 के विधानसभा चुनाव में जनता पार्टी भारी बहुमत से जीती थी, फिर 1979 में जनता पार्टी की सरकार गिर गयी और 1980 के चुनाव में कांग्रेस सरकार में पुन: वापस आ गयी. वर्ष 1985 में भी कांग्रेस सत्ता में वापसी करने में सफल रही.

इस तरह कांग्रेस लगातार दो टर्म जीतने में सफल रही. वर्ष 1990 के बाद से इन तीन दशकों में पहली बार कोई पार्टी सत्ता बरकरार रखने में सफल हुई है. यह राजनीतिक आश्चर्य है, क्योंकि इससे कई तरह के सवाल उभरते हैं- क्या उत्तर प्रदेश का स्वभाव बदल गया है? या योगी के नेतृत्व में भाजपा ने उन लोगों के बीच में स्थायी जगह बना ली है, जो पार्टियों के भाग्य का निर्णय करते रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में भाजपा सवर्णों, सेठों की पार्टी मानी जाती थी, लेकिन 2017 के चुनाव में भाजपा प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में पिछड़ों, दलितों और सवर्ण समाज सबका विश्वास जीतने में सफल रही है. वह विश्वास अभी भी कायम है. विश्वास कायम रहना भाजपा के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है.

यह उपलब्धि राज्य के नेतृत्व की कम है और प्रधानमंत्री की ज्यादा है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि जब चुनाव की घोषणा हुई तो राजनीतिक गलियारे में चर्चा थी कि दिल्ली नहीं चाहती कि योगी जीतें. कहा जा रहा था कि शीर्ष नेतृत्व की पसंद में योगी नहीं हैं. राष्ट्रीय नेतृत्व में मुख्य रूप से नरेंद्र मोदी, अमित शाह और जेपी नड्डा हैं.

प्रधानमंत्री मोदी हर घटनाक्रम पर बारीक नजर रखते हैं. राजनीतिक गलियारे की चर्चा भी उन तक पहुंची होगी. चर्चा जोर पकड़े, उससे पहले ही यानी चुनाव की घोषणा से थोड़ा पहले प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश का धुंआधार दौरा किया. योगी के कंधे पर हाथ रखकर उन्होंने एक राजनीतिक संदेश दे दिया कि प्रधानमंत्री का मुख्यमंत्री योगी में विश्वास है और योगी को उनका आशीर्वाद प्राप्त है. उसके बाद ये चर्चा बंद हो गयी. जहां-जहां कमजोर क्षेत्र थे, वहां प्रधानमंत्री ने स्वयं मोर्चा संभाला. उन्होंने वाराणसी का तीन दिनों का दौरा किया. पार्टी के दूसरे नेताओं ने भी सभाएं कीं.

अखिलेश और जयंत की जोड़ी पिछड़ गयी है. पिछड़ी है अपने कारणों से. एक तो, दोनों की छवि वैसी नहीं है, जैसी उनके पूर्ववर्ती की रही है या जिनके उत्तराधिकार में वे हैं. उनके मुकाबले ये न तो उतने सक्रिय हैं और न प्रभावशाली हैं, न रणनीति में कुशल हैं.

यह चुनाव परिणाम भाजपा के समर्थन से अधिक अखिलेश और जयंत को नकारने का है. अखिलेश की छवि विकास-विरोधी की बन गयी हैं. ये सिर्फ यादव और मुस्लिमों के बल पर उत्तर प्रदेश में राज करना चाहते हैं. अखिलेश की जहां-जहां रैलियां हुई हैं, वहां खूब भीड़ उमड़ी, लेकिन वह वोट में तब्दील नहीं हो पायी. ऐसा इसलिए नहीं हो पाया, क्योंकि अखिलेश के शासन में दूसरे समुदाय के लोग पीड़ित थे.

राम मंदिर और काशी विश्वनाथ धाम का निर्माण अब मुद्दा नहीं है. लोगों ने स्वीकार कर लिया है कि यह होना ही चाहिए. लोगों ने इसका श्रेय भाजपा को दिया है. नवंबर 1993 में बाबरी ध्वंस के बाद चुनाव हुए थे, लेकिन भाजपा सरकार नहीं बना पायी. उससे साबित होता है कि राम मंदिर या काशी विश्वनाथ धाम के निर्माण को समाज की स्वीकृति है, लेकिन उतना ही काफी नहीं है, उसके कारण ही यह परिणाम नहीं आया है.

उत्तर प्रदेश ने यह महसूस कर लिया है कि अब उसको शिक्षा, आर्थिक विकास और सांस्कृतिक क्षेत्र में भारत का नेतृत्व करना है. यह तभी संभव है, जब प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व के अनुरूप वहां सरकार चले. इसलिए, डबल इंजन की सरकार का नारा दिया गया था, यह उसकी सफलता है. उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा में कोई दूसरा नेता सामने नहीं आता है. लेकिन, कांग्रेस या भाजपा जैसी जो लोकतांत्रिक पार्टियां हैं, उसमें कुछ दिनों बाद ही नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट शुरू हो जाती है.

योगी की बहुत आलोचना हुई, उनके खिलाफ लोग दिल्ली जाते रहे. लेकिन, प्रधानमंत्री ने योगी को संरक्षण दिया. पांच साल उनका नेतृत्व बना रहा. इससे स्पष्ट है कि जिनको नेतृत्व का जिम्मा दिया गया है, उनको गलती भी करने का अधिकार है. गलतियों से वे सीखेंगे. उत्तर प्रदेश में गरीब का विश्वास जो कभी कांग्रेस के साथ होता था, वह अब भाजपा के पक्ष में है. जाति, वर्ग और मजहब तीनों की दीवारें इस चुनाव में टूट गयी हैं. महिलाओं का वोट प्रतिशत पुरुषों के मुकाबले इस बार बेहतर रहा है.

महिलाओं का औसतन वोट प्रतिशत बढ़ना भाजपा की उपलब्धि है. इस बार जाति और मजहब से हटकर लोगों ने भाजपा को वोट दिया है. यह असाधारण बात है, यानी उत्तर प्रदेश का स्वभाव पहले से बदला है. नकारात्मकता की जगह अब सकारात्मक और रचनात्मक राजनीति, समाज को जोड़ने की राजनीति वहां शुरू हुई है. जो लोग भाजपा पर ध्रुवीकरण का आरोप लगा रहे थे, वे जब चुनाव परिणाम का विश्लेषण देखेंगे तो मालूम पड़ेगा कि भाजपा ने ध्रुवीकरण का सहारा नहीं लिया है. प्रधानमंत्री के नारे में सबका विश्वास का तत्व दोहराया गया है. यह परिणाम प्रधानमंत्री के नेतृत्व को पुन: स्वीकार करता है.

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