Jana Nayagan: अभिनेता से राजनेता बने विजय की अंतिम फिल्म ‘जन नायकन’, जिसमें वह खुद मुख्य भूमिका में हैं, गंभीर कानूनी विवाद में फंस गयी है. ऐसा तब हुआ है, जब तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के महज तीन महीने रह गये हैं. मद्रास हाईकोर्ट ने इस पर सुनवाई की तारीख 21 जनवरी तय की है. उससे पहले फिल्म रिलीज नहीं हो सकती. इससे फिल्म के निर्माताओं को भारी झटका लगा है. बताया जाता है कि उन्होंने इसमें लगभग 500 करोड़ रुपये का निवेश कर रखा है, और एडवांस कलेक्शन के रूप में 50 करोड़ रुपये भी ले रखे हैं. जबकि ‘पराशक्ति’ के प्रदर्शन के लिए छह करोड़ रुपये खर्च किये गये हैं. ‘जन नायकन’ के नौ जनवरी को रिलीज होने की बात थी, ऐसे में, अदालत के फैसले से रिलीज किये जाने से जुड़ी तमाम तैयारी गड़बड़ा गयी है. एक अभिनेता के तौर पर, और राजनीतिक तौर पर भी विजय के लिए यह एक झटका है. टीवीके अध्यक्ष विजय का चुनावी राजनीति में उतरने का यह पहला गंभीर प्रयास है, जिसके तहत मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा है. जिस विवाद की शुरुआत राजनीतिक तौर पर हुई थी, उसका अंत कानूनी परिणति के रूप में हुआ है.
दरअसल, ‘पराशक्ति’ को सेंसर सर्टिफिकेट मिलने के बाद से ही द्रमुक ने ‘जन नायकन’ को रोकने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया था. मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने भाजपा और केंद्र सरकार पर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को राजनीतिक औजार बनने का आरोप लगाया. उनका आरोप था कि सीबीआइ, इडी और आयकर विभाग की तरह अब सेंसर बोर्ड भी विपक्ष को डराने के लिए केंद्र का ‘नया हथियार’ बन गया है. स्टालिन की यह प्रतिक्रिया विजय की फिल्म ‘जन नायकन’ तथा एक और तमिल फिल्म ‘पराशक्ति’ पर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) द्वारा चली कैंची की पृष्ठभूमि में आयी है. उधर टीवीके के समर्थकों का यह आरोप था कि ‘पराशक्ति’ के प्रति भाजपा का रवैया नरम, जबकि ‘जन नायकन’ के प्रति कठोर है. केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने जहां कई कटौती के बाद ‘पराशक्ति’ को पारित कर दिया है, वहीं ‘जन नायकन’ को सर्टिफिकेट देना अभी शेष है. दरअसल, अपनी पार्टी टीवीके की लॉन्चिंग के बाद विजय ने राज्य में सत्तारूढ़ द्रमुक और केंद्र की भाजपा सरकार, दोनों पर हमला बोला था. राजनीति में उनका प्रवेश तेजी से और नाटकीय तरीके से हुआ. उनकी रैलियों में लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही थी, पर ‘करूर’ में हुई भगदड़ से तस्वीर बदल गयी.
‘जन नायकन’ से जुड़े विवाद को कुछ विश्लेषक तमिल फिल्म उद्योग की आंतरिक राजनीति से जोड़कर भी देख रहे हैं. इस विवाद को द्रमुक से जुड़ी फिल्म वितरण कंपनी ‘रेड जायंट मूवीज’ से जुड़ा बताया जा रहा है. विजय ने दरअसल ‘जन नायकन’ को रिलीज करने के अभियान में ‘रेड जायंट मूवीज’ की अनदेखी की, जिसने सत्तारूढ़ पार्टी के प्रथम परिवार को नाराज कर दिया. ‘जन नायकन’ में विजय की भूमिका गरीबों के त्राता की है. वह भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ते हुए मछुआरों की मदद कर रहा है और लोग उसे भविष्य के मुख्यमंत्री के रूप में देख रहे हैं. दूसरी तरफ ‘पराशक्ति’ 1960 के दशक की तमिल राजनीतिक भावनाओं को उभारती है, जब हिंदी विरोधी आंदोलन अपने चरम पर था. दोनों ही फिल्मों के संवाद, गीत और पटकथा में क्षेत्रीय पहचान, राजनीतिक अंतर्पाठ और द्विअर्थी संवादों की भरमार है.
‘जन नायकन’ के ट्रेलर की शुरुआत एक आदमी द्वारा दूसरे व्यक्ति से ‘थलपति वेट्री कोंडन’ के बारे में पूछताछ करने से होती है. इस फिल्म के अनेक संवाद ऐसे हैं, जिससे इसके निहितार्थ बिल्कुल स्पष्ट हो जाते हैं. विजय की अंतिम फिल्म के तौर पर ‘जन नायकन’ उनके तीस साल के फिल्म करियर और सिनेमा से उनकी विदाई का प्रतीक है. शुरुआत में मद्रास हाईकोर्ट की जस्टिस पीटी आशा ने फिल्म के रिलीज को हरी झंडी दे दी थी. पर सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म पर रोक लगाते हुए कहा कि इसके कुछ दृश्य राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाले हैं. इस पर मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में मद्रास हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने इसे हरी झंडी देने के अदालत के पिछले आदेश को रद्द कर दिया और 21 जनवरी को इस पर दोबारा सुनवाई का फैसला लिया. कांग्रेस नेता प्रवीण चक्रवर्ती की विजय से मुलाकात और ‘जन नायकन’ के खुले समर्थन से भी मामले का राजनीतिकरण हो गया. इससे तमिलनाडु का राजनीतिक परिदृश्य ही बदल गया और द्रमुक ने कांग्रेस का विरोध किया. सोशल मीडिया पर भी दोनों के आरोप-प्रत्यारोप सामने आये.
तमिलनाडु के इस विवाद से कई निष्कर्ष निकलते हैं. एक यह कि विजय ने इस मामले में संयम का परिचय दिया और सरकार या सेंसर बोर्ड को निशाना बनाने से परहेज किया. अलबत्ता, इस मुद्दे पर उन्होंने राज्य में द्रमुक और केंद्र में भाजपा को चुनौती देकर अपनी क्षमता का परिचय दिया. ऐसे ही, द्रमुक ने इस विवाद का ठीकरा भाजपा पर फोड़ सुनिश्चित करने की कोशिश की कि अल्पसंख्यक वोट टीवीके की बजाय द्रमुक के पास सुरक्षित रहें. आगामी अप्रैल में जब तमिलनाडु के चुनाव होंगे, तब तक मतदाता शायद इस विवाद को भूल जायें, लेकिन ‘जन नायकन’ के गीत तब भी उनके कान में गूंजेंगे. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

