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गाजा में अस्थायी युद्धविराम सराहनीय

इस समझौते की बड़ी जरूरत थी. यह सराहनीय है कि दोनों पक्ष इस बात को समझ चुके हैं. इस समझौते को कराने में कतर और मिस्र की केंद्रीय भूमिका रही है. अमेरिका ने भी कहा है कि समझौते की हर शर्त को लागू किया जाना चाहिए. लेकिन इस अस्थायी प्रक्रिया को शांति के लिए वार्ता नहीं समझा जाना चाहिए.

सात अक्तूबर से इस्राइल और हमास के बीच जो लड़ाई चल रही है, उसमें अब तक 14,500 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं. मृतकों में छह हजार बच्चे भी हैं. सात अक्तूबर के हमास के हमले में इस्राइल के 12 सौ लोगों की मौत हुई थी और 240 लोगों को बंधक बनाया गया था. गाजा में बड़े इलाके में इस्राइली हमले में इमारतें ध्वस्त हुई हैं. लाखों लोग बेघर और विस्थापित हुए हैं. लगभग चार सौ इस्राइली सैनिक भी मारे गये हैं. रिपोर्टों के अनुसार, 40 से अधिक बंधक भी मारे गये हैं. हमलों के कारण और इस्राइल के राजी न होने के चलते गाजा में मानवीय मदद भी समुचित मात्रा में नहीं पहुंच रही है.

ऐसी स्थिति में दुनियाभर से यह मांग उठ रही थी कि या तो युद्धविराम हो या अस्थायी तौर पर लड़ाई रोकी जाए, ताकि बंधकों को छुड़ाया जा सके और गाजा में राहत एवं बचाव के उपाय हो सकें. इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर अमेरिकी और पश्चिमी देशों का दबाव बढ़ता जा रहा है कि वे सैनिक अभियान को स्थगित करें. ये देश इस्राइल के सबसे प्रमुख समर्थक हैं. इन देशों पर अरब और पश्चिम एशियाई देशों का भी दबाव है. बंधकों के परिजन भी सरकार से मांग कर रहे थे कि उनके लोगों को वापस लाने को प्राथमिकता दी जाए.

शुक्रवार से लागू होने वाला समझौता भले अस्थायी है, लेकिन इसकी बड़ी जरूरत थी. यह सराहनीय है कि दोनों पक्ष इस बात को समझ चुके हैं. इस समझौते को कराने में कतर और मिस्र की केंद्रीय भूमिका रही है. अमेरिका ने भी कहा है कि समझौते की हर शर्त को लागू किया जाना चाहिए. इसके तहत तय हुआ है कि हमास 50 महिलाओं और बच्चों को रिहा करेगा तथा इसके बदले में इस्राइली जेलों में बंद 150 महिलाओं और बच्चों को छोड़ा जायेगा. साथ ही, गाजा में पर्याप्त मानवीय सहायता भेजने की प्रक्रिया भी प्रारंभ होगी.

यह अच्छी बात है कि इस्राइल ने कहा है कि अधिक बंधकों की रिहाई के साथ-साथ इस समझौते की अवधि बढ़ायी जा सकती है, जो अभी चार दिनों के लिए है. यह भी उम्मीद है कि इस अस्थायी शांति से स्थायी शांति के लिए रास्ता खुल सकता है. इस्राइल के रवैये में जो बदलाव के संकेत हैं, उसकी वजह यह है कि गाजा में उसकी बेतहाशा बमबारी, जिससे कई अस्पताल, स्कूल आदि बर्बाद हुए हैं, संयुक्त राष्ट्र के कार्यालयों को नुकसान पहुंचा है और उसके कर्मचारी मारे गये हैं, से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी आलोचना बढ़ रही थी. विभिन्न पश्चिमी देशों में वहां के नागरिक भी अपनी सरकारों पर दबाव बना रहे थे.

पिछले कुछ वर्षों से पश्चिम एशियाई देशों से इस्राइल के संबंधों में सुधार हो रहा था. इसके लिए अमेरिका ने भी लगातार कोशिश की थी. अब यह स्थिति बदल गयी है क्योंकि उन देशों की सरकारों पर वहां के लोगों का दबाव बढ़ता गया है. ऐसे में अगर शांति की कोशिशें नहीं होंगी, तो पूरे क्षेत्र के अस्थिर हो जाने का अंदेशा है, जो किसी के लिए भी हितकारी नहीं होगा. कतर ने हमास के ऊपर दबाव बनाया है और सऊदी अरब ने इस्राइल की आलोचना करने के साथ-साथ हमास की भी निंदा की है. इन कारकों ने भी समझौते के लिए आधार बनाया है. लेकिन यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि इस अस्थायी प्रक्रिया को शांति के लिए वार्ता नहीं समझा जाना चाहिए.

यह एक बहुत छोटा युद्धविराम है और तमाम संभावनाओं के बावजूद इसके बिखर जाने के खतरे भी हैं. जो स्थितियां हैं, उनके स्थायी समाधान में समय लगेगा और उसके लिए वार्ताओं एवं समझौतों की लंबी शृंखला बनानी पड़ेगी. भारत समेत बहुत से देश कहते आ रहे हैं कि इस्राइल-फिलिस्तीन मसले का स्थायी हल केवल दो स्वतंत्र एवं संप्रभु देशों की स्थापना से ही निकल सकता है. लेकिन अभी के माहौल में हम उस दिशा में कोई प्रगति नहीं देख रहे हैं. बहरहाल, यह जो अस्थायी युद्धविराम हुआ है, उससे वर्तमान तबाही से कुछ राहत जरूर मिलेगी.

इससे पहली बात तो यह होगी कि तबाही थमेगी और राहत सामग्री गाजा में भेजी जा सकेगी. अस्पतालों में दवाएं नहीं हैं, राहत शिविरों में खाना और पानी का अभाव है, उत्तरी गाजा से बड़ी संख्या में लोगों ने दक्षिण की ओर पलायन किया और यह विस्थापन अभी जारी है, उनके रहने-खाने का इंतजाम करना है तथा बुरी तरह से घायल लोगों को मिस्र या दूसरे देशों में उपचार के लिए भेजना है. हालांकि जितनी बड़ी त्रासदी है, उसे देखते हुए चार दिनों की अवधि कोई अधिक नहीं है, पर निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है. अगर इसे बढ़ाया जाता है, तो बहुत अच्छा होगा. इस युद्ध को लेकर बेंजामिन नेतन्याहू इस्राइल के भीतर जो माहौल बनाना चाहते हैं, उसमें कुछ समस्या आ सकती है.

हमास के हमले से पहले उनके विरुद्ध प्रदर्शन हो रहे थे और लोग उनकी नीतियों से नाराज थे. हालांकि उन्होंने युद्ध को देखते हुए कुछ विपक्षी नेताओं को अपनी कैबिनेट में शामिल किया है, पर अधिक समय तक उनके साथ खड़ा नहीं हो सकते. इस्राइल के भीतर बहुत से लोग यह भी मानते हैं कि नेतन्याहू की नीतियों से देश की सुरक्षा के सामने चुनौतियां बढ़ी हैं. इस युद्ध ने इस्राइल की अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव डाला है. चार दिनों का यह अल्प युद्धविराम नेतन्याहू, इस्राइली सेना और सरकार को भी अपने कार्यक्रमों की समीक्षा का समय होगा.

निष्कर्ष के तौर पर कहें, तो इस अल्पावधि के युद्धविराम का स्वागत किया जाना चाहिए और यह आशा करनी चाहिए कि दोनों पक्ष धैर्य और समझदारी दिखाते हुए इसे आगे बढ़ायेंगे. यह लड़ाई पश्चिम एशिया के दूसरे हिस्सों में न बढ़े, इसके लिए भी कोशिश होती रहनी चाहिए. इराक, यमन, लेबनान और सीरिया में अनेक घटनाएं हुई हैं, जो चिंताजनक है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय की सक्रियता से ही इस अस्थायी शांति पर सहमति बनी है. इस बारे में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी एक प्रस्ताव पारित हुआ है.

अरब और इस्लामिक देशों के विदेश मंत्रियों का एक प्रतिनिधिमंडल विभिन्न देशों की राजधानियों के दौरे पर है. अमेरिका और पश्चिमी देश पूर्ण युद्धविराम पर जोर देने लगे हैं. भारत ने भी ब्रिक्स और जी-20 की बैठकों में शांति स्थापित करने और द्वि-राष्ट्र सिद्धांत पर अमल करने का आह्वान किया है. ये सब उत्साहजनक हैं, पर चूंकि स्थायी युद्धविराम पर अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है तथा यह समझौता कुछ ही दिनों के लिए है, इसलिए इस अंदेशे को भी हम नकार नहीं सकते कि यह लड़ाई जारी रह सकती है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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