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गाद से बेहाल गंगा और सहायक नदियां

Updated at : 08 Feb 2023 8:13 AM (IST)
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गाद से बेहाल गंगा और सहायक नदियां

बड़ी गिरावट बहुत से लोगों, विशेषकर छोटे निवेशकों, में बेचैनी पैदा कर सकती है और इसकी प्रतिक्रिया कुछ भी हो सकती है तथा पूरा बाजार इससे प्रभावित हो सकता है.

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गंगा नदी में वाराणसी से डिब्रूगढ़ तक सैलानियों को घुमाने निकला दुनिया का सबसे लंबा क्रूज ‘गंगा विलास’ बिहार के सारण में डोरीगंज के पास गाद में अटकने के कारण किनारे तक नहीं पहुंच सका. जिस तरह बिहार में गंगा एवं उसकी सहायक नदियों में गाद बढ़ रहा है, उससे नदियों के उथले होने का संकट गहराता जा रहा है. गाद नदी का स्वाभाविक उत्पाद है, लेकिन उसका समुचित प्रबंधन अनिवार्य है.

गाद जमने से उसका प्रवाह बदल जाता है. इससे नदी कई धाराओं में बंट जाती है, किनारें कटते हैं. यदि गाद किनारे से बाहर नहीं फैले, तो नदी के मैदान का उपजाऊपन और ऊंचाई घटने लगती है. ऊंचाई घटने से किनारों पर बाढ़ का दुष्प्रभाव अधिक होता है. पिछले साल जुलाई में सी-गंगा यानी सेंटर फॉर गंगा रिवर बेसिन मैनेजमेंट एंड स्टडीज द्वारा जल शक्ति मंत्रालय को सौंपी गयी रिपोर्ट बताती है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, झारखंड की 65 नदियां बढ़ते गाद से हांफ रही हैं.

हालांकि गाद नदियों के प्रवाह का नैसर्गिक उत्पाद है और देश के कई बड़े तीर्थ इसी गाद पर विकसित हुए हैं, लेकिन जब गाद को किनारों पर माकूल जगह नहीं मिलती, तो वह धारा के लिए बाधा बन जाता है. अकेले उत्तर प्रदेश में ऐसी 36 नदियां हैं, जिनकी कोख में बहुत अधिक गाद है. इससे न केवल उनकी गति मंथर हो गयी, बल्कि कुछ ने अपना मार्ग बदला और उनका पाट संकरा हो गया.

बची-खुची कसर अंधाधुंध बालू उत्खनन ने पूरी कर दी. कानपुर से बिठूर तक और उन्नाव से बक्सर-शुक्लागंज तक गंगा की धार बारिश के बाद घाटों से दूर हो जाती है. वाराणसी, मिर्जापुर और बलिया में गंगा नदी के बीच टापू बन जाते हैं तथा नदी का प्रवाह छोटी-छोटी धाराओं में विभक्त हो जाता है. प्रयागराज के पास टापू बनते हैं. संगम के आसपास गंगा नदी में चार मिलीमीटर की दर से हर साल गाद जमा हो रहा है.

आगामी दिनों में गंगा नदी की धारा और तेजी से परिवर्तित होगी. ऐसे में बाढ़ का खतरा स्वाभाविक है. यह सरकारी रिकॉर्ड में है कि आज जहां पर संगम है, वहां यमुना की गहराई करीब 80 फीट है. पर गंगा की गहराई इतनी कम है कि संगम के किनारे नदी में खड़ा होकर कोई भी स्नान कर सकता है, जबकि सहायक नदी यमुना की गहराई कम होनी चाहिए. इसी कारण संगम पूरब की तरफ बढ़ रहा है.

आजादी के बाद तक गढ़ मुक्तेश्वर से कोलकाता तक जहाज चला करते थे. बिजनौर के गंगा बैराज पर गाद की आठ मीटर मोटी परत है. आगरा व मथुरा में यमुना गाद से भर गयी है. आजमगढ़ में घाघरा और तमसा के बीच गाद के कारण कई मीटर ऊंचे टापू बन गये हैं. घाघरा, कर्मनाशा, बेसो, मंगई, चंद्रप्रभा, गरई, तमसा, वरुणा और असि नदियां भी गाद से बेहाल हैं.

उत्तरांचल की तीन नदियां गाद से बेहाल हैं. हिमालय जैसे युवा पहाड़ से निकलने वाली गंगा के साथ गाद आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. लेकिन जिस तरह उत्तराखंड में बांध, पनबिजली परियोजनाएं और सड़कें बनीं, उससे गाद की मात्रा बढ़ने के साथ नदी का प्रवाह-मार्ग भी अवरुद्ध हुआ. गाद के चलते ही इस राज्य के कई सौ झरने और सरिताएं बंद हो गयीं, जिससे कई नदियों का उद्गम ही खतरे में पड़ गया है.

साल 2016 में केंद्र सरकार द्वारा गठित चितले कमेटी ने साफ कहा था कि नदी में बढ़ते गाद का एकमात्र निराकरण यही है कि नदी के पानी को फैलने का पर्याप्त स्थान मिले. गाद को बहने का रास्ता मिलना चाहिए. कमिटी ने रेखांकित किया था कि नदियों में गाद जमा होना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है. फिर भी भारी वर्षा, वन काटने, जलाशयों में संरचनागत हस्तक्षेप और बाड़ बनाने से नदियों में गाद बढ़ता है.

जब नदी को चौड़ा या गहरा किये बिना उसकी प्राकृतिक क्षमता को बरकरार रखने के लिए महीन गाद और तलछट को निकाला जाता है, तो उस प्रक्रिया को डीसिल्टेशन कहा जाता है. फिर भी अंधाधुंध गाद निकालने से नदी की इकोलॉजी और प्रवाह पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.

तटबंध और नदी के बहाव क्षेत्र में अतिक्रमण न हो और अत्यधिक गाद वाली नदियों के संगम क्षेत्र से नियमित गाद निकालने का काम हो. जाहिर है कि ये सिफारिशें किसी ठंडे बस्ते में बंद हो गयीं. अब नदियों पर रिवर फ्रंट बनाये जा रहे हैं, जो न केवल नदी की चौड़ाई कम करते हैं, बल्कि जल विस्तार को कंक्रीट से रोकते भी हैं.

यह दुर्भाग्य है कि विकास के नाम पर नदियों के कछार को सर्वाधिक हड़पा गया. कछार नदी का विस्तार होता है. आमतौर पर कछार में केवल मानसून में जल होता है, बाकी समय वहां की नम भूमि पर नदी के साथ बह कर आये जीवाणु का डेरा होता है. पहले इस जमीन पर मौसमी फसल-सब्जी लगाये जाते थे. भूमि के लालच में कछार और उसकी गाद लुप्त हो गये. गाद को मजबूरी में नदी के उदर में ही डेरा जमाना पड़ता है. नदियों के गाद को हटाने के लिए पर्याप्त उपाय किये जाने की जरूरत है.

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पंकज चतुर्वेदी

लेखक के बारे में

By पंकज चतुर्वेदी

पंकज चतुर्वेदी is a contributor at Prabhat Khabar.

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