स्त्री सुरक्षा के लिए केवल कानून बनाना काफी नहीं

Published by : Rajneesh Anand Updated At : 19 May 2026 11:09 AM

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महिला सुरक्षा का मसला

Women Safety : झारखंड राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष के रूप में काम करते हुए मुझे हजारों महिलाओं और युवतियों की पीड़ा को नजदीक से देखने का अवसर मिला था. वहां आने वाली महिलाएं केवल कानूनी मदद नहीं चाहती थीं, वे सुने जाने की आकांक्षा भी लेकर आती थीं.

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Women Safety : देश में जब भी किसी महिला, युवती या बच्ची के साथ हिंसा की कोई वीभत्स घटना सामने आती है, समाज अचानक विचलित दिखाई देने लगता है. समाचार चैनलों पर तीखी बहस शुरू हो जाती है, सोशल मीडिया पर आक्रोश उमड़ पड़ता है, राजनीतिक दल बयान देते हैं, सड़कों पर मोमबत्तियां जलती हैं और कुछ दिनों तक ऐसा लगता है, जैसे पूरा देश स्त्री सुरक्षा को लेकर गंभीर हो उठा है, पर समय बीतते ही वही समाज फिर सामान्य हो जाता है. प्रश्न यह है कि आखिर ऐसा क्यों है कि हर बड़ी घटना के बाद हमारा आक्रोश क्षणिक साबित होता है, जबकि समस्या लगातार बनी रहती है? दरअसल, स्त्री के खिलाफ हिंसा को हमने लंबे समय तक केवल कानून और अपराध के दायरे में सीमित करके देखने की कोशिश की है, जबकि यह समस्या कहीं अधिक गहरी और जटिल है.


झारखंड राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष के रूप में काम करते हुए मुझे हजारों महिलाओं और युवतियों की पीड़ा को नजदीक से देखने का अवसर मिला था. वहां आने वाली महिलाएं केवल कानूनी मदद नहीं चाहती थीं, वे सुने जाने की आकांक्षा भी लेकर आती थीं. हिंसा से भी अधिक उन्हें समाज की प्रतिक्रिया तोड़ देती है. विशेष रूप से वे महिलाएं, जिन्होंने अपने ऊपर हो रहे अत्याचार के खिलाफ पुलिस, अदालत या कानून का सहारा लेने का साहस किया, उन्हें अक्सर अपने ही परिवार और सामाजिक दायरे में अकेला छोड़ दिया गया. काउंसिलिंग के दौरान अनेक महिलाओं ने बताया कि जैसे ही पुलिस उनके घर पहुंची या उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया, परिवार का व्यवहार बदलने लगा. कई बार मायका और ससुराल दोनों ने दूरी बना ली.

कई महिलाएं छोटे बच्चों को लेकर आर्थिक असुरक्षा के बीच संघर्ष करती रहीं. उनके सामने केवल न्याय की लड़ाई नहीं थी, अस्तित्व बचाने की लड़ाई भी थी. कई ऐसे मामले भी सामने आये, जहां बहू द्वारा ससुराल वालों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने या पुलिस बुलाने के बाद ससुराल पक्ष ने महिला और उसके बच्चों को घर से बाहर निकाल दिया. सबसे दुखद स्थिति तब दिखाई दी, जब कानून की लड़ाई लड़ने की सलाह देकर शुरुआती दौर में बढ़-चढ़कर साथ और हिम्मत देनेवाली कई संस्थाएं, मित्र या रिश्तेदार भी उसे अकेला छोड़कर पीछे हट गये. ऐसे में वह महिला आखिर जाये कहां?


यह प्रश्न केवल किसी एक परिवार का नहीं, पूरे सामाजिक ढांचे का है. यदि न्याय मांगने वाली महिला को अपना घर, सामाजिक आधार और भावनात्मक सहारा सब कुछ खो देना पड़े, तो केवल कानूनी प्रावधान उसके जीवन को सुरक्षित नहीं बना सकते. इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्यों हमारे समाज में आज भी न्याय मांगने वाली महिला को ही कठघरे में खड़ा किया जाता है? क्या कानून का सहारा लेना अब भी सामाजिक विद्रोह माना जाता है? यही कारण है कि अनेक महिलाएं अन्याय सहने के बावजूद शिकायत दर्ज कराने से डरती हैं. निर्भया कांड के बाद कानून में कई बदलाव हुए. कठोर दंड का प्रावधान बढ़ा, फास्ट ट्रैक अदालतों की व्यवस्था की गयी, महिला हेल्पलाइन और सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने की घोषणाएं हुईं. पर क्या केवल कानून बदल देने से समाज बदल जाता है? यदि ऐसा होता, तो आज भी माता-पिता के भीतर यह भय नहीं होता कि बाहर गयी उनकी बेटी सुरक्षित लौटेगी या नहीं.

इसके पीछे समस्या यह है कि हम स्त्री सुरक्षा को अब भी महिलाओं का मुद्दा मानते हैं, जबकि यह पूरी सभ्यता का प्रश्न है. जिस समाज में लड़की के कपड़ों, उसकी आवाजाही, उसके मित्रों, बोलने के तरीकों और यहां तक कि उसकी हंसी तक पर निगरानी रखी जाती हो, वहां हिंसा केवल एक आकस्मिक घटना नहीं रह जाती. वहां सामाजिक वातावरण भी कहीं न कहीं अपराध को वैधता देने लगता है. गांवों और कस्बों में यह स्थिति कई बार और अधिक जटिल दिखाई देती है. वहां स्त्री को परिवार की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाता है, पर उसकी इच्छाओं, स्वतंत्रता और अधिकारों को इतनी गंभीरता से स्वीकार नहीं किया जाता. शहरों में आधुनिकता का बाहरी विस्तार जरूर दिखाई देता है, पर मानसिकता के स्तर पर पितृसत्तात्मक सोच अभी भी गहरे मौजूद है.


डिजिटल माध्यमों ने इस संकट को एक नया आयाम दिया है. सोशल मीडिया पर महिलाओं के खिलाफ अभद्र टिप्पणियां, ट्रोलिंग, चरित्र हनन अब सामान्य होते जा रहे हैं. यह भी हिंसा का ही एक रूप है, परंतु दुर्भाग्यपूर्ण है कि समाज का एक हिस्सा इसे मनोरंजन की तरह लेने लगा है. यह हमारी सामूहिक संवेदना के क्षरण का संकेत है. स्त्री सुरक्षा का प्रश्न केवल पुलिस, अदालत और दंड तक सीमित नहीं हो सकता. यह शिक्षा, परिवार, सामाजिक व्यवहार और सांस्कृतिक चेतना से भी जुड़ा हुआ प्रश्न है. एक बच्चा अपने घर में महिलाओं के प्रति जैसा व्यवहार देखता है, वही उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बनता है. इसलिए स्त्री सम्मान की शुरुआत घर और विद्यालय से होनी चाहिए. यह भी जरूरी है कि कानून का सहारा लेने वाली महिला को समाज अकेला न छोड़ दे. यदि हम सचमुच एक आधुनिक और संवेदनशील राष्ट्र बनाना चाहते हैं, तो हमें अपनी बेटियों को केवल सुरक्षा का आश्वासन नहीं, निर्भय जीवन का भरोसा भी देना होगा.

(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

राजनीति,सामाजिक, इतिहास, खेल और महिला संबंधी विषयों पर गहन लेखन किया है. तथ्यपरक रिपोर्टिंग और विश्लेषणात्मक लेखन में रुचि. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक. IM4Change, झारखंड सरकार तथा सेव द चिल्ड्रन के फेलो के रूप में कार्य किया है. पत्रकारिता के प्रति जुनून है. प्रिंट एवं डिजिटल मीडिया में 20 वर्षों से अधिक का अनुभव.

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