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कांग्रेस में गहरी होती खींचतान

Updated at : 04 Mar 2021 8:16 AM (IST)
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कांग्रेस में गहरी होती खींचतान

अब दोनों खेमों में मध्यस्थता की गुंजाइश बहुत कम है तथा दोनों ही दो मई का इंतजार कर रहे हैं. सोनिया गांधी भी देख रही हैं कि असंतुष्ट नेता अनुशासन की लक्ष्मण रेखा का कितना अनुपालन करते हैं.

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राशिद किदवई

राजनीतिक विश्लेषक

rasheedkidwai@gmail.com

कांग्रेस पार्टी में एक अंदरूनी लड़ाई चल रही है. शह और मात का यह खेल लंबे वक्त से जारी है. यह सब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को लेकर है कि कमान संभालने की जिम्मेदारी किसे मिलेगी? पिछले साल 15 अगस्त को 23 कांग्रेस नेताओं ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने पार्टी में व्यापक बदलाव और आंतरिक चुनाव को लेकर बहुत सारी बातें कही थीं. उन नेताओं ने कांग्रेस की कार्यशैली के प्रति असंतोष भी जाहिर किया था.

दिसंबर में वरिष्ठ नेता कमलनाथ की पहल पर सोनिया गांधी और असंतुष्ट नेताओं की एक बैठक हुई थी. वह बैठक सौहार्दपूर्ण वातावरण में हुई थी और उसमें सोनिया गांधी ने उनसे वादा किया कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र होगा और चुनाव होंगे. उसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलायी गयी, लेकिन उसमें बजाय इसके कि चुनाव की घोषणा हो, यह कहा गया कि आंतरिक चुनाव जून में होंगे. मुझे लगता है कि इस बात से असंतुष्ट नेताओं को काफी निराशा हुई. असल में, राहुल गांधी के व्यक्तित्व और कामकाज के तरीके को लेकर कांग्रेस में ऊहापोह का माहौल है, क्योंकि बार-बार यह कहा जाता है कि पार्टी में एक राहुल गांधी टीम है.

हमें यह समझना होगा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू हों, इंदिरा गांधी हों, राजीव गांधी हों या फिर सोनिया गांधी हों, वे जब भी पार्टी के अध्यक्ष रहे, तब वे पूरी पार्टी के अध्यक्ष होते थे. उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा या कोई संकेत नहीं दिया कि कोई धड़ा उनका नहीं है और बाकी खेमे उनके समर्थक हैं. हां, इंदिरा गांधी, संजय गांधी और राजीव गांधी के बारे में यह कहा जा सकता है कि वे एक धड़े को दूसरे धड़े से लड़ाते थे. इसके कई उदाहरण दिये जा सकते हैं, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष सर्वोपरि होता था और कांग्रेसजन दिल से उसका सम्मान करते थे.

अभी स्थिति बहुत बदल गयी है. साल 2014 और 2019 की हार के बाद कांग्रेस समर्थकों का मनोबल टूट-सा गया है और उनमें आत्मविश्वास नहीं है. चुनाव इंदिरा गांधी भी हारी थीं 1977 में, पर पार्टी का मनोबल बना हुआ था. इसी कारण कांग्रेस 1980 में जीत हासिल कर सकी थी. अगर आज आप किसी कांग्रेसी से पूछेंगे, तो उसके मन की पीड़ा यही है कि वह आश्वस्त नहीं है कि 2024 या 2029 में कांग्रेस वापस सत्ता में आ जायेगी.

इस संदर्भ में यदि आप देखेंगे, तो आपको लगेगा कि अब जो आनंद शर्मा ने बयान दिया है बंगाल के चुनाव में फुरफुरा शरीफ के प्रमुख के साथ चुनावी गठबंधन को लेकर, वह एक मामले को लेकर नहीं है. यह कहीं पर तीर, कहीं पर निशाना का मामला है. वे असल में कांग्रेस नेतृत्व को चुनौती दे रहे हैं. इससे पांच राज्यों के आगामी चुनावों में फायदे की जगह नुकसान होने का अंदाजा लगाया जा सकता है.

ऐसा ही अन्य असंतुष्ट नेताओं के विभिन्न बयानों के बारे में कहा जा सकता है. यह भी याद किया जाना चाहिए कि जब महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ सरकार बन रही थी, तब असंतुष्ट खेमा चुप था. ऐसा ही असम, केरल आदि कुछ राज्यों के चुनाव या यूपीए सरकार के मामले में रहा, जब कांग्रेस ने धार्मिक पहचान पर आधारित पार्टियों का समर्थन लिया. उन्हें यह भी देखना चाहिए कि धार्मिक आधार की पार्टियों और सांप्रदायिक राजनीति करनेवालों दलों में बड़ा अंतर होता है. उन अवसरों पर तो गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा और अनेक असंतुष्ट पार्टी की कार्यसमिति और चुनाव समितियों में सदस्य भी थे.

जब भी किसी राजनीतिक दल में नेतृत्व परिवर्तन होता है, तब कई नेता भी किनारे हो जाते हैं. उदाहरण के लिए, जो लोग संजय गांधी के साथ थे, राजीव गांधी के दौर में उनमें से अधिकतर हाशिये पर डाल दिये गये. इसी तरह राजीव गांधी के बाद जब पीवी नरसिम्हा राव के हाथ में कमान आयी, तब भी बदलाव हुआ. नारायण दत्त तिवारी और अर्जुन सिंह समेत कई नेता तो कुछ समय के लिए कांग्रेस छोड़ कर भी चले गये थे. सीताराम केसरी के समय राव के कई करीबी किनारे कर दिये गये. केसरी के नजदीकियों के साथ ऐसा ही सोनिया गांधी के कार्यकाल में हुआ.

तो, यह समझा जाना चाहिए कि कांग्रेस में अब एक युग परिवर्तन हो रहा है. सोनिया गांधी दो दशक से अधिक समय तक पार्टी अध्यक्ष रही हैं और इस दौरान उन्होंने कई अहम फैसले किये तथा बहुत से लोगों को महत्व दिया, किंतु अब वही महत्व उन नेताओं को भी मिलेगा, ऐसा निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है. ऐसा अन्य दलों में भी होता है. आप भाजपा को देखिए. जो लोग अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में महत्वपूर्ण थे, उनमें से अधिकतर अब नरेंद्र मोदी के दौर में दिखाई नहीं देते. कांग्रेस में जो युग परिवर्तन हो रहा है, उसे असंतुष्ट नेता पचा नहीं पा रहे. कांग्रेस नेतृत्व, अगर हम उसे गांधी परिवार कहें, के पास अभी देने के लिए कुछ नहीं है.

कार्यसमिति में कुछ ही जगहें हैं. वहां हर किसी को नहीं रखा जा सकता है. राज्य विधानसभाओं में कांग्रेस की स्थिति बेहद कमजोर है. ऐसे में वह राज्यसभा में भी बहुत लोगों को नहीं भेज सकती है. गुलाम नबी आजाद लगभग 28 साल राज्यसभा में रहे हैं, जो बहुत लंबा समय है. इतनी तो नौकरियों की पूरी अवधि होती है. ऐसे पहलुओं का भी आकलन करना चाहिए.

मेरी राय में अब दोनों खेमों में मध्यस्थता या बीच के रास्ते की गुंजाइश बहुत कम है. राहुल गांधी के नेतृत्व में जिस तरह से केरल में चुनाव लड़ा जा रहा है, वहां अगर कांग्रेस गठबंधन को जीत मिलती है, तो असंतुष्ट उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बनने से नहीं रोक पायेंगे, लेकिन वामपंथियों के हाथों अगर कांग्रेस केरल हार जाती है, असम में वह भाजपा को रोकने में असफल रहती है, तो स्थिति अलग हो सकती है. बंगाल में कांग्रेस मुख्य लड़ाई में नहीं है और तमिलनाडु में वह द्रमुक की छोटी सहयोगी पार्टी है.

पुडुचेरी में भी कांग्रेस की वापसी मुश्किल नजर आ रही है. ऐसे में दोनों खेमे इंतजार कर रहे हैं. सोनिया गांधी भी देख रही हैं कि असंतुष्ट नेता अनुशासन की लक्ष्मण रेखा का कितना अनुपालन करते हैं. दूसरी ओर, असंतुष्ट खेमे के पास दो मई तक का समय है. ये नेता तब तक कांग्रेस आलाकमान को राजनीतिक रूप से मुश्किल में डालने की कोशिश करते रहेंगे.

Posted By : Sameer Oraon

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रशीद किदवई

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By रशीद किदवई

रशीद किदवई is a contributor at Prabhat Khabar.

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