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आर्थिक विषमता चिंताजनक

Updated at : 01 Feb 2021 1:42 AM (IST)
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आर्थिक विषमता चिंताजनक

जरूरत है कि सरकार गरीबों एवं अमीरों के बीच बढ़ती हुई खाई को पाटने के लिए कारगर उपाय करे, अन्यथा आनेवाले दिनों में यह और भी चौड़ी होगी, जो आम आदमी और भारत जैसे लोक-कल्याणकारी देश के लिए सही नहीं होगा.

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सतीश सिंह

मुख्य प्रबंधक

भारतीय स्टेट बैंक, आर्थिक अनुसंधान विभाग, मुंबई

यूएनडीपी और डेनवर विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के मुताबिक कोरोना महामारी के गंभीर दीर्घकालिक परिणामों के चलते वर्ष 2030 तक 20 करोड़, 70 लाख लोग गरीबी की चपेट में आ सकते हैं. इससे दुनियाभर में बेहद गरीब लोगों की संख्या एक अरब पार कर जायेगी. इसके विपरीत दुनिया के 10 शीर्ष अमीरों ने कोरोना काल में इतनी ज्यादा दौलत कमाई है, जिससे दुनिया की गरीबी खत्म हो सकती है.

ऑक्सफेम की एक रिपोर्ट के अनुसार, 18 मार्च से 31 दिसंबर, 2020 के दौरान दुनिया के 10 शीर्ष अरबपतियों की संपत्ति में 540 बिलियन डॉलर का इजाफा हुआ है, वहीं 20 करोड़ से 50 करोड़ लोग गरीब हो गये. शिक्षा, स्वास्थ्य और बेहतर जीवन जीने के आमजन के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है. ऑक्सफेम की इस रिपोर्ट को विश्व आर्थिक मंच के ‘दावोस संवाद’ के पहले दिन जारी किया गया. ऑक्सफेम के सर्वेक्षण को विश्व आर्थिक मंच की वार्षिक बैठक में विशेष तवज्जो दिया जाता है.

रिपोर्ट के अनुसार, एक मजदूर की तीन साल की कमाई के बराबर मुकेश अंबानी एक सेकेंड में कमाई कर रहे हैं. कोरोना महामारी के दौरान मुकेश अंबानी को एक घंटे में जितनी कमाई हुई, उतना कमाने में एक अकुशल मजदूर को 10 साल लग जायेंगे. भारत के 100 अरबपतियों की दौलत में 12,97,822 करोड़ रुपये की वृद्धि कोरोना काल में हुई है. इस राशि से देश के 13.8 करोड़ गरीबों में से प्रत्येक को 94,045 रुपये दिये जा सकते हैं. ऑक्सफेम के मुताबिक कोरोना महामारी के कारण 1930 की महामंदी के बाद सबसे बड़ा आर्थिक संकट पैदा हुआ है.

ऑक्सफेम की रिपोर्ट के अनुसार, दुनियाभर में गरीबी के संजाल से निकलना आसान नहीं होगा. इस रिपोर्ट में अमीरों की मानसिकता पर भी सवाल उठाये गये हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि तार्किक रूप से एवं इंसानियत के नाते गरीबों का शोषण समीचीन नहीं हो सकता है, क्योंकि गरीबों की एक बड़ी आबादी भुखमरी के कगार पर आ गयी है. हालत ऐसे हैं कि एक दिन भी काम नहीं मिलने पर उन्हें भूखे पेट रात गुजारनी होगी.

ऑक्सफेम का कहना है कि सरकार कॉरपोरेट्स से बहुत ही कम कर वसूल रही है, जिससे राजस्व संग्रह कम हो रहा है. अमीर वर्ग अपनी संपत्ति पर केवल 0.5 प्रतिशत की दर से अगले 10 सालों के लिए अतिरिक्त कर का भुगतान करे, तो यह बुजुर्गों व बच्चों की बेहतरी, शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र में 11.7 करोड़ रोजगार के मौके देने के बराबर निवेश होगा.

ऑक्सफेम ने कहा कि वैश्विक और भारतीय अर्थव्यवस्था अमीरों को और ज्यादा संपत्ति जुटाने में सक्षम बना रही है, जबकि करोड़ों लोग दो वक्त की रोटी का इंतजाम नहीं कर पा रहे हैं. वर्ष 2010 के बाद से अरबपतियों की संपत्ति में औसतन 13 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि हुई, जो सामान्य कामगारों के वेतन की तुलना में छह गुना ज्यादा है. विश्व के अधिकांश देशों में अमीरों के अनुकूल नीतियां बनायी जा रही हैं,

जबकि सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अर्थव्यवस्था में सभी का विकास हो और सरकार श्रम आधारित क्षेत्रों को प्रोत्साहित कर समावेशी वृद्धि को बढ़ावा देने, कृषि में निवेश करने और सामाजिक योजनाओं का प्रभावी तरीके से क्रियान्वयन करने के लिए प्रयास करे. ऑक्सफैम के मुताबिक 2015 से विश्व के एक प्रतिशत अमीरों के पास दुनिया के बाकी लोगों से अधिक संपत्ति है.

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज की मानें तो देश के कुछ राज्य मसलन बिहार, झारखंड, ओडिशा, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश आदि कुपोषण की समस्या से बुरी तरह से त्रस्त हैं. गरीबी की वजह से इन राज्यों में कुपोषण में इजाफा हो रहा है. वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 472 मिलियन में से 97 मिलियन बच्चे कुपोषण से ग्रसित थे. कुपोषण से बच्चों में बीमारियों से लड़ने की क्षमता या प्रतिरोधक क्षमता धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती है. बच्चा खसरा, निमोनिया, पीलिया, मलेरिया आदि बीमारियों की गिरफ्त में आकर दम तोड़ देता है.

ग्रामीण भारत में लगभग 83.3 करोड़ लोग निवास करते हैं और यहां रोजगार के रूप में कृषि को छोड़कर कोई दूसरा विकल्प नहीं है. कुटीर एवं मझौले उद्योग का अभाव है, इससे कृषि क्षेत्र में छद्म रोजगार की स्थिति बनी हुई है. एक आदमी के काम को कई लोग मिलकर कर रहे हैं. खेती-किसानी में दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना मुश्किल हो गया है. खेती-किसानी के दौरान रोजमर्रा के कार्यों को पूरा करने लिए किसानों को वित्तीय मदद की जरूरत होती है, जिसके लिए उन्हें अक्सर महाजन की शरण में जाना पड़ता है.

लगभग 130 करोड़ आबादी वाले इस देश में अधिकांश लोगों के घर का सपना पूरा नहीं हो पा रहा है. जीवन-काल में ऐसे लोगों का आशियाना सड़क, फुटपाथ, पार्क, गांव के निर्जन इलाके आदि होते हैं. वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था कोरोना महामारी से तहस-नहस हो गयी है. सभी प्रमुख क्षेत्रों के प्रदर्शन में गिरावट है. रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं.

सरकार के राजस्व में कमी आ रही है. अर्थव्यवस्था में मंदी को दूर करने के लिए अंतिम उपभोग व्यय को बढ़ाने की बात कही जा रही है, लेकिन हाथ में पैसे नहीं होने की वजह से लोगों के हाथ बंधे हुए हैं. ऐसे में जरूरत है कि ऑक्सफेम की ताजा रिपोर्ट पर संवेदनशीलता दिखाते हुए सरकार गरीबों एवं अमीरों के बीच बढ़ती हुई खाई को पाटने के लिए कारगर उपाय करे, अन्यथा आनेवाले दिनों में यह और भी चौड़ी होगी, जो आम आदमी और भारत जैसे लोक-कल्याणकारी देश के लिए सही नहीं होगा.

Posted By : Sameer Oraon

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सतीश सिंह

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By सतीश सिंह

सतीश सिंह is a contributor at Prabhat Khabar.

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