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कठिन होगा इस बार का बजट

Updated at : 29 Jan 2021 6:54 AM (IST)
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कठिन होगा इस बार का बजट

आत्मनिर्भरता और ‘वोकल फॉर लोकल’ का संकल्प अर्थव्यवस्था को नयी दिशा और ऊर्जा देगा तथा यह बजट उस दिशा में मील का पत्थर साबित होगा.

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पूरे देश की निगाहें एक फरवरी को पेश होनेवाले बजट पर लगी हैं. उत्सुकता है कि वित्तमंत्री के पिटारे में विभिन्न वर्गों के लिए क्या योजनाएं हैं? क्या सरकार आयकर में कोई छूट देगी? कॉरपोरेट टैक्स के बारे में क्या नजरिया रहेगा? देसी और विदेशी निवेशकों पर क्या कर प्रावधान होंगे? बजट का शेयर बाजारों पर क्या असर पड़ेगा? शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, बैकिंग आदि के बारे में क्या नजरिया होगा? कौन-कौन-सी नयी जनकल्याणकारी योजनाएं होंगी? हमें समझना होगा कि इस बार का बजट महामारी के बाद का बजट है.

हालांकि, भारत में हालात (केरल और महाराष्ट्र को छोड़ कर) सुधरे हुए दिखाई देते हैं, लेकिन इस महामारी से हुए नुकसानों की भरपाई जल्द होनेवाली नहीं है. महामारी के कारण आवाजाही बाधित हुई, जिससे न केवल मांग बाधित हुई, बल्कि काम-धंधों पर भी ब्रेक लग गया. कुछ व्यवसायों में घर से काम थोड़ी-बहुत मात्र में चला, लेकिन अधिकांश मामलों में आर्थिक गतिविधियां बाधित ही रहीं. मजदूरों का बड़े शहरों से पलायन, कामगारों का काम से निष्कासन या उनके वेतन में भारी कटौती, महामारी कालखंड में सामान्य बात बन गयी. ऐसे में जीडीपी के प्रभावित होने के साथ-साथ, सरकार का राजस्व भी प्रभावित हुआ.

महामारी से पूर्व भी अर्थव्यवस्था कई कारणों से मंदी की मार झेल रही थी. ऋणों की वापसी नहीं होने के कारण एनपीए से बैंकों का मनोबल ही नहीं गिरा था, बल्कि लोगों का बैंकों पर विश्वास भी घटने लगा था. आइएलएफएस सरीखे गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थानों में घोटालों के कारण वित्तीय क्षेत्र के संकट बढ़ गये थे. भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा बैंकों पर नकेल कसने से बैंकों द्वारा कार्य निष्पादन भी प्रभावित हो रहा था. बैंकों द्वारा ऋण भी कम मात्रा में दिये जा रहे थे. नये निवेश भी घटे और चालू आर्थिक गतिविधियां भी. पिछले साल जब वित्तमंत्री ने बजट पेश किया था, वर्ष 2019-20 में राजस्व उम्मीद से कम दिखाई दिया था, लेकिन यह अपेक्षा थी कि इसकी भरपाई 2020-21 में हो सकेगी.

वर्ष 2020-21 में भी महामारी ने राजस्व में सुधार की अपेक्षाओं पर पानी फेर दिया है. वित्त वर्ष 2020-21 के पहले नौ महीनों में जीएसटी से कुल राजस्व 7,79,884 करोड़ रुपये ही प्राप्त हुए हैं, जबकि अपेक्षा न्यूनतम 10 लाख करोड़ रुपये की थी. इस कमी का असर केंद्र और राज्य, दोनों के राजस्व पर पड़ा है. राज्यों के हिस्से की भरपाई (14 प्रतिशत वृद्धि के साथ) देर-सबेर केंद्र सरकार को नियमानुसार करनी ही पड़ेगी. केंद्र को इसका नुकसान राज्यों से कहीं ज्यादा होगा. इस वर्ष वैयक्तिक आयकर और निगम (कॉरपोरेट) कर भी उम्मीद से कम रहनेवाला है. विनिवेश का लक्ष्य भी पूरा होने की दूर-दूर तक कोई संभावना दिखायी नहीं देती.

एक तरफ जहां सरकारी राजस्व में भारी नुकसान हो रहा था, वहीं रोजगार संकट से गुजर रहे मजदूरों और अन्य वर्गों के जीवनयापन की कठिनाईयों के कारण उन्हें खाद्य सामग्री उपलब्ध कराने का दबाव भी सरकार पर था. 80 करोड़ लोगों को नौ महीने तक मुफ्त भोजन उपलब्ध कराया गया. महामारी से निबटने हेतु सरकार का स्वास्थ्य पर खर्च भी बढ़ चुका था.

कोरोना योद्धाओं, शिक्षकों एवं अन्य वर्गों को वैक्सीन उपलब्ध कराने की भी आवश्यकता है. पूरी तरह से छिन्न-भिन्न हुई आर्थिक गतिविधियों को पुन: पटरी पर लाना, आम जनता को राहत देना, रोजगार खोनेवालों के लिए राहत और रोजगार की व्यवस्था करना, अर्थव्यवस्था को सही रास्ते पर लाना, यह सरकार का दायित्व भी है और प्राथमिकता भी.

दुनियाभर में सरकारों ने राहत पैकेजों की व्यवस्था की है. भारत सरकार ने भी राहत उपायों की घोषणा की. ये सभी राहत उपाय देश की जीडीपी के लगभग 10 प्रतिशत के बराबर बताये जा रहे हैं. इन राहत अथवा प्रोत्साहन पैकेजों में सरकार ने लघु, सूक्ष्म और मध्यम उद्यमों को प्रोत्साहन, प्रवासी मजदूरों एवं किसानों के लिए राहत पैकेज, कृषि विकास, स्वास्थ्य उपायों, व्यवसायों को अतिरिक्त ऋणों की व्यवस्था, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस समेत कई उपायों की घोषणा की गयी है. सरकार ने हाल ही में रियल एस्टेट क्षेत्र को राहत एवं प्रोत्साहन देने, इलेक्ट्रॉनिक्स, टेलीकॉम, मोबाइल फोन और एक्टिव फार्मास्युटिकल्स उत्पादों के उत्पादन को प्रोत्साहन देने हेतु ‘प्रोडक्शन लिंक्ड’ प्रोत्साहनों की भी घोषणा की है.

पिछले साल के बजट में 2020-21 के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी का 3.5 प्रतिशत रखा गया था, लेकिन बदले हालातों में घटे सरकारी राजस्व और बजट अनुमानों से कहीं ज्यादा खर्च के दबाव के चलते इस वर्ष का राजकोषीय घाटा अनुमान से ज्यादा हो सकता है. इस महामारी का बड़ा असर राजकोषीय घाटे पर पड़ सकता है. माना जा रहा है कि 2020-21 के लिए यह राजकोषीय घाटा जीडीपी के आठ प्रतिशत तक पहुंच सकता है.

राहत के प्रयासों की अभी शुरुआत भर हुई है. आगामी वर्ष में इन प्रयासों को और आगे बढ़ाने की जरूरत होगी. सरकार द्वारा आत्मनिर्भरता संकल्प और अर्थव्यवस्था में सुधार हेतु तमाम प्रयासों के चलते अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी इस वर्ष भारत की जीडीपी में 11.5 प्रतिशत संवृद्धि का अनुमान दिया है. इससे राजस्व में वृद्धि तो होगी, लेकिन जीडीपी की इस गति को बनाये रखने के लिए और अधिक प्रयास की जरूरत होगी. ऐसे में केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा अधिक रहेगा.

साथ ही केंद्र सरकार ने कोरोना से उपजी समस्याओं से निपटने हेतु राज्य सरकारों को भी अतिरिक्त ऋण लेने की अनुमति दी है. इस वर्ष राज्यों के बजट में भी राजकोषीय घाटा जीडीपी के चार से पांच प्रतिशत के बीच रह सकता है. ऐसे में देश में कुल राजकोषीय घाटा 10 से 11 प्रतिशत तक पहुंच सकता है. समय की मांग है कि अर्थव्यवस्था को गति देने हेतु सभी प्रकार के प्रयास किये जाएं. कुछ समय तक एफआरबीएम एक्ट को स्थगित रखते हुए अर्थव्यवस्था को गति देना जरूरी होगा.

आशा की जा सकती है कि जहां महामारी से प्रभावित वर्गों को सरकारी बजट का समर्थन मिलेगा, वहीं अर्थव्यवस्था को गति देने हेतु प्रयासों में कोई कंजूसी नहीं की जायेगी. वर्षों से चीन से सस्ते आयातों की मार झेल रही अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भरता और ‘वोकल फॉर लोकल’ का संकल्प एक नयी दिशा और ऊर्जा देगा और यह बजट उस दिशा में मील का पत्थर साबित होगा.

Posted By : Sameer Oraon

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डॉ अश्विनी

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By डॉ अश्विनी

डॉ अश्विनी is a contributor at Prabhat Khabar.

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