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धरती बचाने का संघर्ष

Updated at : 14 Dec 2020 9:33 AM (IST)
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धरती बचाने का संघर्ष

धरती बचाने का संघर्ष

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जलवायु परिवर्तन और पृथ्वी के बढ़ते तापमान की चुनौती मानव समेत तमाम जीव-जंतुओं के अस्तित्व के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न है. पांच साल पहले फ्रांस की राजधानी पेरिस में दुनियाभर के देशों ने इस समस्या के समाधान का संकल्प लिया था. भारत धरती बचाने के संघर्ष में अग्रिम मोर्चे पर खड़ा है.

पेरिस जलवायु समझौते के पांच साल पूरे होने के अवसर पर हुई ऑनलाइन बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया कि 2005 की तुलना में भारत ने अपने उत्सर्जन में 21 प्रतिशत की उल्लेखनीय कमी की है. उन्होंने घोषणा की कि भारत अपने निर्धारित लक्ष्यों की सीमा को बढ़ाने के लिए प्रयासरत है.

प्रधानमंत्री मोदी ने आह्वान किया है कि सभी देशों को न केवल अपने लक्ष्यों का विस्तार करना चाहिए, बल्कि अब तक की उपलब्धियों की समुचित समीक्षा भी होनी चाहिए, ताकि हम भावी पीढ़ी के लिए भरोसेमंद हो सकें. इस आह्वान का महत्व इसलिए बढ़ जाता है कि अधिकतर देशों ने समझौते के संकल्प के अनुरूप तत्परता नहीं दिखायी है, जबकि जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़, तूफान, आंधी, जंगली आग, चक्रवात और सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाओं की बारंबारता बढ़ती जा रही है,

ध्रुवीय बर्फ के पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ता जा रहा है तथा वायु व जल प्रदूषण एवं भूक्षरण की समस्या गंभीर हो रही है. स्वच्छ ऊर्जा पर जोर के बावजूद जीवाश्म स्रोतों के निर्बाध उपयोग के कारण कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ रहा है. वैश्विक स्तर पर पानी और वन संपदा का अंधाधुंध दोहन जारी है. यह संतोष की बात है कि 45 देशों ने 2030 के लिए अपने लक्ष्यों को घोषित किया है तथा भारत समेत अनेक देशों में इस संबंध में सराहनीय परिणाम सामने आ रहे हैं, लेकिन यह समस्या समूची धरती के अस्तित्व से संबद्ध है.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंतोनियो गुतेरेस ने रेखांकित किया है कि धनी देश महामारी रोकने के लिए निर्धारित राशि का आधे से अधिक हिस्सा स्वच्छ ऊर्जा के बजाय जीवाश्म ईंधनों पर खर्च कर रहे हैं. आशा है कि महामारी से उबरने के बाद पूरा विश्व धरती बचाने में जुटेगा.

posted by : sameer oraon

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