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कोरोना काल में भारत आशा का स्रोत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लासगो जलवायु सम्मेलन में सतत विकास की अवधारणा को अपनाने पर जोर दिया था. उस संदेश को उन्होंने दावोस फोरम के मंच से भी दोहराया है.

By डॉ धनंजय त्रिपाठी
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कोरोना काल में भारत आशा का स्रोत
कोरोना काल में भारत आशा का स्रोत
prabhat khabar

दावोस के वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन कई अर्थों में वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है. दुनिया अब भी कोरोना महामारी के कारण पैदा हुई चुनौतियों का सामना कर रही है. इस महामारी से स्वास्थ्य और जान की व्यापक हानि तो हुई ही है, इसका आर्थिक दुष्प्रभाव भी बहुत गंभीर है. इस स्थिति में एक अहम विकासशील देश तथा बड़ी अर्थव्यवस्था होने के नाते भारत की भूमिका काफी अहम हो जाती है.

भारत ने महामारी का सामना सफलतापूर्वक किया है और प्रधानमंत्री मोदी ने देश के अनुभवों को दुनिया के सामने पेश किया है. चाहे वह विश्व का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान हो, दवा और टीकों के बड़े निर्माता और आपूर्तिकर्ता के रूप में भारत का योगदान हो या कल्याणकारी योजनाओं एवं राहत के उपायों के माध्यम से जनता व उद्योगों को सहारा देने की पहलें हों, ऐसे अनुभवों की जानकारी उन्होंने दी है.

साथ ही, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने तथा आरोग्य सेतु जैसे एप बनाने की कोशिशें भी बड़ा उदाहरण साबित हुई हैं. इन सभी प्रयासों से भारत में बड़े पैमाने पर आर्थिक अवसर पैदा हुए हैं, जिनका फायदा वैश्विक समुदाय उठा सकता है. इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी ने भारत में निवेश करने का आह्वान किया है.

महामारी ने अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को तो प्रभावित किया ही है, आज सुधार के बावजूद वैश्विक स्तर पर आपूर्ति व अन्य तरह के भू-राजनीति से जुड़े गंभीर संकट भी मौजूद हैं. इसके साथ ही हमें चीन की आक्रामकता का भी संज्ञान लेना चाहिए. इस संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी ने लोकतांत्रिक व्यवस्था और मूल्यों को लेकर जो बात कही है, उसका बड़ा महत्व है.

महामारी ने अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को तो प्रभावित किया ही है, आज सुधार के बावजूद वैश्विक स्तर पर आपूर्ति व अन्य तरह के भू-राजनीति से जुड़े गंभीर संकट भी मौजूद हैं. इसके साथ ही हमें चीन की आक्रामकता का भी संज्ञान लेना चाहिए. इस संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी ने लोकतांत्रिक व्यवस्था और मूल्यों को लेकर जो बात कही है, उसका बड़ा महत्व है.

एक प्रकार से यह विश्व को दिया गया एक संदेश है कि सभी को लोकतंत्र का मान रखते हुए व्यापक साझेदारी के साथ चुनौतियों का समाधान निकालने की कोशिश करनी चाहिए. यह संदेश विश्व समुदाय में भारत की सम्माजनक उपस्थिति को इंगित करता है. लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत मुक्त व्यापार को बढ़ावा देने का प्रधानमंत्री मोदी का आह्वान भी उल्लेखनीय है. हिंद-प्रशांत क्षेत्र समेत ऐसे अनेक इलाके हैं, जहां निर्बाध आवागमन और कारोबार को प्रभावित करने की कोशिशें हो रही हैं.

विकास की आकांक्षा के साथ पर्यावरण तथा जलवायु परिवर्तन से संबंधित मसलों का हल निकालना है. कुछ समय पहले इस संबंध में ग्लासगो जलवायु सम्मेलन में विस्तार से चर्चा हुई थी. उसमें भी प्रधानमंत्री मोदी ने सतत विकास की अवधारणा को अपनाने पर जोर दिया था. उस संदेश को उन्होंने दावोस फोरम के मंच से भी दोहराया है. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में दुनिया को आगाह किया है कि उपभोक्तावाद के मॉडल से हम जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को हल नहीं कर सकते हैं और हमें इससे आगे बढ़ना होगा.

अंधाधुंध विकास की वैश्विक दौड़ के माहौल में प्रधानमंत्री मोदी का यह महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है. कुल मिलाकर, अगर हम उनके भाषण को देखें, तो उन्होंने सभी आवश्यक मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त किये हैं और हमें यह उम्मीद रखनी चाहिए कि विश्व समुदाय संबोधन के मुख्य बिंदुओं का संज्ञान लेगा. यह एक समावेशी संबोधन था और इसने सभी देशों को साथ लेकर चलने की भारत की इच्छा को प्रतिबिंबित किया है.

इसके बरक्स आप अगर दावोस में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भाषण को देखें, तो अंतर स्पष्ट दिख जायेगा. चीनी राष्ट्रपति ने परोक्ष रूप से पश्चिमी देशों की ओर संकेत करते हुए कहा है कि दुनिया को शीत युद्ध की मानसिकता का रुख नहीं करना चाहिए. उनके भाषण में संघर्ष व तनाव के तत्व की झलक दिखती है. वे अपनी बातों और हितों को बढ़ा-चढ़ाकर सामने रखने का प्रयास कर रहे थे. प्रधानमंत्री मोदी के समावेशी और भागीदारी के दृष्टिकोण से यह बिल्कुल अलग रवैया है.

इस अंतर को रेखांकित करना जरूरी है. इन दो वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी ने अन्य विश्व नेताओं के साथ विभिन्न द्विपक्षीय और बहुपक्षीय मंचों पर भारत का पक्ष रखा है तथा अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ कदम मिलाकर चलने पर बल दिया है. दावोस मंच के उनके संबोधन को इसी कड़ी में रखा जाना चाहिए. इस भाषण में उन्होंने जब भारत में कोरोना महामारी और उसके कारण पैदा हुई मुश्किलों का कामयाबी के साथ मुकाबला करने की बात कही, तो साथ में यह भी कहा कि भारत दूसरे देशों को दवा और टीके भेजकर मदद भी करता रहा है. यह प्रक्रिया आज भी जारी है और भारत के भीतर इसे लेकर किसी तरह की हिचक नहीं है.

यह कहकर उन्होंने दुनिया में एक उम्मीद पैदा करने की कोशिश की है कि भारत बेहतरी की ओर बढ़ रहा है तथा वह दुनियाभर में महामारी से चल रही लड़ाई में सहयोग देने के लिए तत्पर है, ताकि अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था फिर से पटरी पर लौट सके. इसी बात को आगे बढ़ाते हुए संयुक्त राष्ट्र के महासचिव अंतोनियो गुत्तेरेस ने भी कहा कि अगर आज दुनिया की आर्थिकी में सुधार दिख रहा है, तो सभी देशों को मिलकर महामारी की रोकथाम पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए.

प्रधानमंत्री मोदी ने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार का भी आग्रह दोहराया है. भारत समेत कई देश लंबे समय से सुरक्षा परिषद और अन्य संस्थाओं में बदलाव करने की मांग करते रहे हैं, ताकि इन्हें वैश्विक वास्तविकताओं के अनुकूल बनाया जा सके. क्रिप्टोकरेंसी पर वैश्विक स्तर पर समझ बनाने और नियमन करने का प्रधानमंत्री मोदी का आह्वान भी उल्लेखनीय हस्तक्षेप है.

डिजिटल इंडिया और स्टार्टअप क्रांति ने भारत को तकनीक के क्षेत्र में एक बड़ी शक्ति बना दी है. चाहे महामारी हो या अर्थव्यवस्था या फिर धरती का बढ़ता तापमान, यह सच है कि भारत के बिना वैश्विक स्तर पर बेहतरी की गुंजाइश नहीं है. इस वास्तविकता को प्रधानमंत्री मोदी ने बेहद सधे अंदाज में व्यक्त किया है. दावोस का सम्मेलन वैसे ही एक विशेष मंच है, लेकिन आज कोरोना महामारी और सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था के दौर में इसका महत्व और बढ़ जाता है, जहां कई राजनेता, विशेषज्ञ और संस्थाओं के प्रतिनिधि विचारों का आदान-प्रदान कर रहे हैं.

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