मुश्किलों के बीच मितव्ययिता की अपील

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PM Modi Appeal

पीएम मोदी ने की अभी सोना ना खरीदने की अपील

Prudence Amid Difficulties : भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्व रखती है, क्योंकि देश कच्चे तेल की अपनी आवश्यकता का लगभग 87 प्रतिशत विदेशों से आयात के माध्यम से पूरी करता है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में आने वाला हर झटका महंगाई, पेट्रोल-डीजल की कीमतों और घरेलू बजट पर सीधा-सीधा असर डालता है.

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Prudence Amid Difficulties : आज दुनिया जिस दौर से गुजर रही है, वह केवल भू-राजनीतिक तनाव का दौर नहीं, बल्कि आर्थिक अस्थिरता का भी दौर है. पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव कच्चे तेल की आपूर्ति और समुद्री व्यापार मार्गों को प्रभावित कर रहा है. रूस-यूक्रेन युद्ध के प्रभाव अब भी यूरोप की अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे रहे हैं, जबकि अमेरिका-चीन तनाव वैश्विक सप्लाई चेन और कमोडिटी बाजारों को नये सिरे से आकार दे रहा है. कच्चे तेल की कीमतें अस्थिर हैं, उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव बना हुआ है और वैश्विक राजनीति अब सीधे-सीधे आर्थिक परिणामों को प्रभावित कर रही है.

भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्व रखती है, क्योंकि देश कच्चे तेल की अपनी आवश्यकता का लगभग 87 प्रतिशत विदेशों से आयात के माध्यम से पूरी करता है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में आने वाला हर झटका महंगाई, पेट्रोल-डीजल की कीमतों और घरेलू बजट पर सीधा-सीधा असर डालता है.
हालांकि, हाल के दौर में भारत ने ऊर्जा आयात के स्रोतों को 40 से अधिक देशों तक विस्तारित कर, पश्चिम एशिया में अपनी कूटनीतिक सक्रियता बढ़ाकर और नये व्यापारिक गलियारों के निर्माण के माध्यम से स्थिति को संभालने की कोशिश की है. लेकिन ऐसी संरचनात्मक रणनीतियों का असर समय के साथ ही दिखाई देता है.

वास्तविकता यह है कि कच्चे तेल का बाजार रातोंरात स्थिर नहीं होता और सप्लाई चेन की स्थिति भी कुछ महीनों में नहीं सुधरती. ऐसे कठिन समय में आर्थिक मजबूती केवल सरकारों और संस्थानों की जिम्मेदारी नहीं रहती, बल्कि करोड़ों नागरिकों के रोजमर्रा के छोटे-छोटे फैसले भी उतने ही महत्वपूर्ण हो जाते हैं. इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अनावश्यक ईंधन खपत कम करने, गैर-जरूरी सोने की खरीद टालने, देश के भीतर पर्यटन को बढ़ावा देने और जहां संभव हो वहां वर्क फ्रॉम होम अपनाने की अपील को समझना चाहिए. पहली नजर में प्रधानमंत्री के ये सुझाव प्रतीकात्मक नजर आ सकते हैं, लेकिन इनके पीछे मजबूत आर्थिक तर्क मौजूद हैं. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत में सोने का आयात लगभग 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो कच्चे तेल के बाद दूसरी सबसे बड़ी आयातित वस्तु है.

दूसरी ओर, देश के चालू खाते का घाटा बढ़ने की आशंका है, खासकर तब, जब कच्चे तेल की ऊंची कीमतें लंबे समय तक बनी रहें. चालू खाते का घाटा जब बढ़ता है, तब उसका असर केवल आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका रुपये पर दबाव बढ़ता है, पेट्रोल महंगा होता है, विदेश में पढ़ाई का खर्च बढ़ता है और होम लोन की इएमआइ तक इससे प्रभावित हो सकती है. इस तरह वैश्विक अर्थव्यवस्था का दबाव अंतत: आम परिवार की रसोई तक पहुंच जाता है. चुनौती भरे इस वैश्विक परिदृश्य में भारत को कठोर मितव्ययिता की आवश्यकता नहीं है. जरूरत केवल समझदारी भरे विकल्पों की है-यानी ऐसे छोटे-छोटे बदलावों पर अमल करना, जो विदेशी मुद्रा पर दबाव कम करें, लेकिन जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित न करें.


उदाहरण के तौर पर, भारतीय शादियों को देखा जा सकता है. मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए शादी अक्सर सबसे बड़ा खर्च होता है और इसका बड़ा हिस्सा आयात आधारित होता है, जैसे-सोने के गहने, विदेशी डेस्टिनेशन वेडिंग, विदेश यात्राएं और आयातित सजावट. इसमें संयम का परिचय दिया जा सकता है. संयम का अर्थ उत्सव को त्यागना नहीं है. यदि कुछ हिस्सा सोने की खरीद के बजाय वित्तीय निवेश में लगाया जाये और बाली या दुबई की जगह उदयपुर, जयपुर या केरल जैसे भारतीय पर्यटन स्थलों को चुना जाये, तो आर्थिक लाभ देश के भीतर ही बना रहेगा. विवेकपूर्ण खर्च का उद्देश्य खुशियों को कम करना कतई नहीं है, बल्कि खर्च को अधिक विवेकपूर्ण बनाना है.

यही बात रोजमर्रा की खपत पर भी लागू होती है. ईंधन का अत्यधिक उपयोग, आयातित खाद्य तेल, विदेशी ब्रांडों की खरीद, विदेशी छुट्टियां और अनावश्यक आयात आधारित उपभोग धीरे-धीरे देश की बाहरी आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ाते हैं. यदि शहरी मध्यमवर्ग का एक हिस्सा भी अपनी विदेशी मुद्रा आधारित वैकल्पिक खपत में 15-20 प्रतिशत की कमी लाये, तो इससे हर वर्ष अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा बचायी जा सकती है. यातायात के तौर-तरीकों पर भी पुनर्विचार करना आवश्यक है. ऊर्जा के महंगे होने के दौर में मेट्रो रेल, सार्वजनिक परिवहन, कार-पूलिंग और हाइब्रिड वर्क मॉडल आर्थिक रूप से व्यावहारिक विकल्प हैं. देश के बड़े कॉरपोरेट संस्थान यदि सप्ताह में दो-तीन दिन वर्क फ्रॉम होम व्यवस्था अपनायें, तो हर महीने सैकड़ों करोड़ रुपये के ईंधन की बचत संभव है.

इससे ट्रैफिक और प्रदूषण भी कम होगा. इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ना भी इस दिशा में एक स्थायी कदम है. हर इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर पेट्रोल पर निर्भरता को स्थायी रूप से कम करता है. वास्तविकता यह है कि भारत का इवी इकोसिस्टम अब पहले की तुलना में कहीं अधिक परिपक्व हो चुका है और इसकी परिचालन लागत भी तुलनात्मक रूप से कम है.


इस दौर में उद्योग जगत के लिए भी अवसर मौजूद हैं. ज्वेलरी उद्योग हल्के और कम सोने वाले डिजाइनों पर ध्यान दे सकता है. ऐसे ही, पर्यटन उद्योग विश्वस्तरीय भारतीय अनुभव तैयार कर सकता है, ताकि भारतीय पर्यटक विदेश जाने के बजाय देश के भीतर खर्च करें. हालांकि, इस मामले में सरकार को भी संरचनात्मक प्रोत्साहन देने होंगे-जैसे बड़ी शहरी परियोजनाओं में रूफटॉप सोलर को बढ़ावा देना और कम दूरी की सरकारी यात्राओं में रेल एवं इवी आधारित परिवहन को प्राथमिकता देना. देश केवल बड़े भाषणों से आर्थिक चुनौतियों से बाहर नहीं निकलते. वे करोड़ों लोगों द्वारा समय के साथ किये गये छोटे, लेकिन लगातार व्यावहारिक बदलावों से मजबूत बनते हैं.

भारत ने डिजिटल भुगतान, स्वच्छता अभियान और टीकाकरण जैसे सफल अभियानों के जरिये सामूहिक बदलाव की अपनी क्षमता पहले भी साबित की है. वैश्विक अस्थिरता का यह दौर भी एक समय के बाद समाप्त हो जायेगा. लेकिन सबसे मजबूत वही देश बनकर उभरेंगे, जिन्होंने इस चुनौतीपूर्ण समय का उपयोग समझदारी से किया. आने वाले वर्षों में भारत की आर्थिक मजबूती केवल सरकारी नीतियों पर नहीं, इस बात पर भी निर्भर करेगी कि परिवार, व्यवसाय और नागरिक रोजमर्रा के अपने छोटे-छोटे फैसले कितनी बुद्धिमानी से लेते हैं. आखिरकार, रसोई की मेज पर बचाया गया रुपया ही वह रुपया है, जिसे विदेशी मुद्रा बाजार में बचाने की आवश्यकता नहीं पड़ती. कठिन समय में यही आर्थिक देशभक्ति का वास्तविक अर्थ है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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प्रो गौरव वल्लभ

लेखक के बारे में

By प्रो गौरव वल्लभ

प्रो गौरव वल्लभ is a contributor at Prabhat Khabar.

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