प्रधानमंत्री मोदी की रूस यात्रा

Updated at : 01 Jun 2017 6:21 AM (IST)
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प्रधानमंत्री मोदी की रूस यात्रा

तरुण विजय पूर्व सांसद, राज्यसभा दो जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी चार देशों की यात्रा के सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव रूस पहुंचेंगे. वहां सेंट पीटर्सबर्ग में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ वे रूस से शीर्षस्थ उद्योगपतियों, वित्त-सम्राटों और व्यापारिक संस्थानों के अध्यक्षों को संबोधित करेंगे. दावोस में होनेवाले वर्ल्ड इकोनॉमिक फाेरम की तरह […]

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तरुण विजय
पूर्व सांसद, राज्यसभा
दो जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी चार देशों की यात्रा के सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव रूस पहुंचेंगे. वहां सेंट पीटर्सबर्ग में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ वे रूस से शीर्षस्थ उद्योगपतियों, वित्त-सम्राटों और व्यापारिक संस्थानों के अध्यक्षों को संबोधित करेंगे. दावोस में होनेवाले वर्ल्ड इकोनॉमिक फाेरम की तरह यह रूस का सबसे प्रतिष्ठित ‘सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम (स्पीफ)’ है. लेकिन, आइये देखते हैं कि इसके अलावा इस यात्रा के मुख्य बिंदु क्या हैं?
रूस असंदिग्ध रूप से भारत का सबसे विश्वसनीय तथा हर संकट में मददगार मित्र रहा है. अभी भी सत्तर प्रतिशत से अधिक रक्षा सामग्री के लिए भारत रूस पर निर्भर है. यह वर्ष रूस के साथ राजनयिक संबंध स्थापित होने की सत्तरवीं वर्षगांठ का भी है- यानी भारत के स्वतंत्र होने से पूर्व ही 13 अप्रैल, 1947 को रूस के साथ हमारे राजनयिक संबंध स्थापित हो गये थे.
प्रधानमंत्री मोदी उच्चतर शिक्षा में अत्यंत महात्वाकांक्षी ज्ञान प्रकल्प की सफलता के लिए भी सर्वाधिक योगदान रूस का ही है. विदेश मंत्रालय रूस के साथ हमारे संबंधों को भारतीय विदेश नीति का मूल-स्तंभ मानता है.
कुछ समय से रूस द्वारा पाकिस्तान को चार छोटे सैन्य हेलीकॉप्टर देने की खबरों के बाद राजनीतिक पंडितों ने चर्चा शुरू कर दी कि रूस भारत से कुछ दूर जा रहा है. यह मात्र ख्याली पुलाव ही है, क्योंकि वर्तमान भू-राजनीतिक एवं भू-आर्थिक गठबंधनों के समय में रूस के लिए भारत जैसा मित्र और हमारे लिए रूस का साथ भविष्य की सामरिक नीतियों का मुख्य आधार है. नरेंद्र मोदी सरकार रूस से रक्षा के अलावा कृषि, ऊर्जा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में संबंधों का विस्तार चाहती है.
फिलहाल रूस-चीन के मध्य 70 अरब डॉलर, भारत-चीन के मध्य 60 अरब डॉलर वार्षिक व्यापार है. लेकिन भारत-रूस के बीच केवल 7 अरब डॉलर का व्यापार होता है. क्या इसे अगले दो वर्षों में दोगुना किया जा सकता है? परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में रूस सर्वाधिक विश्वसनीय देश है.
कुदनकुलम प्रथम और द्वितीय बना दिये, तृतीय और चतुर्थ 2024 तक बन जायेंगे और उसके बाद पांचवें तथा छठवें पर काम होगा. हाल ही में कामोवेके-ए-226 हेलीकॉप्टरों के हिंदुस्तान एयरोनाटिक्स के साथ निर्माण पर भी समझौता हुआ है, जो टेक्नोलॉजी के स्थानांतरण पर आधारित है.
यह भी संभव है कि इस बार मोदी-पुतिन शिखर वार्ता में दोनों पक्ष नार्थ-साउथ ट्रांस्पोर्ट कॉरीडोर (उत्तर-दक्षिण मालवाही गलियारा) को और मजबूत बनाने पर ठोस निर्णय लें. 7,200 किमी लंबा यह जल-थल मार्ग चीन के वन-बेल्ट-वन-रोड या चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे से कुछ राजनयिक तुलना कर सकते हैं, पर वह ठीक नहीं होगा. नार्थ-साउथ गलियारा भारत-रूस के संबंधों का एक रणनीतिक सुफल है.
यह भारत के पश्चिमी तट क्षेत्र से ईरान होते हुए अजरबैजान होते हुए अस्त्राखान, सेंट पीटर्सबर्ग तक पहुंचता है. रास्ते में बंदर अंजाली, तेहरान, बंदर अब्बास, बाकू, माॅस्को जैसे शहर आते हैं. मुंबई को सीधे बाकू (अजरबैजान) से जोड़ने वाला यह मार्ग परंपरागत मार्ग से चालीस प्रतिशत छाेटा और समय बचाने वाला है. इसके संस्थापक सदस्यों में भारत, रूस और ईरान हैं तथा अन्य सदस्यों में अजरबैजान, आर्मेनिया, कजाकस्तान तथा बेलारूस हैं. तुर्कमेनिस्तान की यात्रा के समय प्रधानमंत्री मोदी ने उसे भी इस महा-गलियारे का सदस्य बनने का आमंत्रण दिया था. इस यात्रा से पूर्व इसी वर्ष मार्च में सरकार ने इस मार्ग को ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए टी आइ आर कन्वेंशन अर्थात कस्टम के अंतरराष्ट्रीय व्यवहार को भी स्वीकृति दे दी.
राजनयिक धर्म केवल अपने राष्ट्रहित पर टिका होता है. कोई भी देश किसी दूसरे देश के साथी किसी धर्मादा भाव से मित्रता नहीं करता. यदि मेरे सुरक्षात्मक और आर्थिक हित किसी मित्रता से पूरे होते हैं, तभी मैं मित्रता के कदम बढ़ाऊंगा. रूस आज अकेला पश्चिमी शक्तियों के सामने प्रतिरोधी शक्ति है. वह चीन का सर्वाधिक रक्षा सामान खरीदने वाला देश है.
वह भारत के साथ सामरिक हितों को साधते हुए एक ऐसा सामरिक प्रभाव स्थापित करना चाहता है, जहां उसकी शक्ति को चुनौती न मिले. पुतीन वहां के लौह पुरुष हैं. लगातार 17 वर्षों से उनका अखंड शासन चला आ रहा है. वहां 2018 में अगले चुनाव हैं जो पुतिन आराम से जीतेंगे और 2024 तक (वहां संसद छह साल की अवधि वाली है) नेतृत्व देंगे. भारत के मोदी एक शक्तिशाली, निर्णायक लौह पुरुष के नाते विश्व प्रसिद्ध हुए हैं.
मोदी एक सशक्त एवं विश्व में सर्वाधिक तीव्र गति से बढ़ रही अर्थव्यवस्था के नेता के नाते पुतिन से मिलेंगे. मोदी भी 2019 का चुनाव जीतेंगे, यह सबको विश्वास है. इसलिए मोदी-पुतिन दोनों 2024 तक विश्व के दो ताकतवर नेताओं के नाते साथ-साथ चलेंगे. यह सह-यात्रा समस्त दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया ही नहीं, बल्कि विश्व के तेजी से बदलते राजनीतिक समीकरणों में भारत के लिए तो शुभ ही है.
भारत-रूस संबंध किसी तीसरे देश के साथ द्विपक्षीय संबंधों से कभी प्रभावित नहीं हुए. यदि अमेरिका के साथ भारत के संबंध बढ़े, तो क्या उसका असर भारत-रूस संबंध पर पड़ सकता है?
इसका उत्तर केवल भारत की राजनयिक दक्षता एवं संतुलन ही दे सकता है. जो लोग रूस द्वारा पाकिस्तान के साथ संबंध बनाने पर सशंकित होते हैं, वे भूल जाते हैं कि अफगानिस्तान की स्थिति के परिप्रेक्ष्य में रूस के लिए पाकिस्तान का साथ कुछ अर्थों में जरूरी है. केवल उसको रूस की भारत से बढ़ती दूरी मानना अपरिपक्वता होगी. एकमात्र भारत एवं रूस ऐसे दो देश हैं, जिनके मध्य प्रति वर्ष अखंड शिखर वार्ताएं होती आयी हैं. इस बार मोदी-पुतिन शिखर वार्ता इस अनवरत शृंखला में अठारहवीं होगी.
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