सरायकेला में MSP पर भारी 'बिचौलिये'! लगातार चौथे साल लक्ष्य से पिछड़ा जिला, 52% पर सिमटी धान खरीद

खरसावां लैंपस में लटक रहा ताला
Saraikela Paddy Procurement: सरायकेला-खरसावां जिले में खरीफ मौसम 2025-26 के लिए धान खरीद का लक्ष्य अधूरा रह गया है. 2.5 लाख क्विंटल के मुकाबले मात्र 1.32 लाख क्विंटल धान की खरीद हुई है. देखिए, क्यों किसान सरकारी केंद्रों के बजाय व्यापारियों को धान बेचने पर मजबूर हैं और क्या है पिछले 4 वर्षों का रिपोर्ट कार्ड.
Saraikela Paddy Procurement, सरायकेला (शचिंद्र कुमार दाश की रिपोर्ट) : सरायकेला-खरसावां जिले में खरीफ विपणन मौसम 2025-26 के दौरान धान की सरकारी खरीद अपने निर्धारित लक्ष्य से काफी पीछे रह गई है. जिला प्रशासन द्वारा तय किए गए 2.5 लाख क्विंटल के संशोधित लक्ष्य के मुकाबले, इस सीजन में केवल 1,32,163.98 क्विंटल धान की ही खरीद सुनिश्चित हो सकी है, जो कुल लक्ष्य का लगभग 52 प्रतिशत है. उल्लेखनीय है कि शुरुआत में जिले को तीन लाख क्विंटल का महत्वाकांक्षी लक्ष्य दिया गया था, जिसे परिस्थितियों को देखते हुए बाद में घटाया गया, लेकिन इसके बावजूद विभाग का निर्धारित आंकड़ा प्राप्त करने में विफल रहा.
पंजीकृत किसानों की बेरुखी और केंद्रों का सन्नाटा
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस सीजन में 15 दिसंबर से 31 मार्च 2026 तक जिले की 27 लैंपस समितियों के माध्यम से खरीद प्रक्रिया संचालित की गई थी. धान बेचने के लिए कुल 9,264 किसानों ने अपना पंजीकरण कराया था, जिनमें से 6,000 से अधिक किसानों को एसएमएस (SMS) के जरिए सूचना भी भेजी गई. इसके बावजूद, मात्र 2,193 किसानों ने ही लैंपस केंद्रों पर जाकर अपनी उपज बेची. लैंपसवार विश्लेषण करें तो तिरुलडीह केंद्र 16,805 क्विंटल की खरीद के साथ शीर्ष पर रहा, जबकि हेंसाकोचा लैंपस में महज 17 किसानों ने ही अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, जो व्यवस्था की सुस्त रफ्तार को दर्शाता है.
पिछले चार वर्षों का निराशाजनक प्रदर्शन
सरायकेला जिले का ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि धान खरीद के मामले में सरायकेला लगातार पिछड़ रहा है. वर्ष 2022-23 में जहां मात्र 13.13 प्रतिशत लक्ष्य प्राप्त हुआ था, वहीं 2023-24 में यह गिरकर 5.26 प्रतिशत रह गया था. हालांकि, पिछले वर्ष 43.14 प्रतिशत और इस वर्ष 52 प्रतिशत की उपलब्धि के साथ सुधार तो दिखा है, लेकिन पूर्ण लक्ष्य अब भी कोसों दूर है. वर्तमान में खरीद अवधि समाप्त होने के कारण केंद्रों पर ताले लटक गए हैं, जिससे वंचित किसान परेशान हैं. किसानों ने पूर्व की भांति इस बार भी खरीद की समय सीमा को 30 अप्रैल तक बढ़ाने की पुरजोर मांग की है, ताकि वे अपनी कड़ी मेहनत की उपज का उचित मूल्य पा सकें.
नकद भुगतान और तकनीकी खामियां बनीं बाधा
किसानों की सरकारी केंद्रों से दूरी की मुख्य वजह तकनीकी जटिलताएं और नमी के नाम पर होने वाली 5 से 7 प्रतिशत तक की कटौती है. किसानों का कहना है कि लैंपस में लंबी प्रक्रिया और भुगतान में होने वाली देरी के विपरीत, बाहरी व्यापारी और बिचौलिये सीधे खलिहान से धान उठाकर नकद भुगतान कर रहे हैं. हालांकि व्यापारियों द्वारा एमएसपी से कम कीमत दी जाती है, लेकिन तत्काल पैसे की उपलब्धता किसानों को अगली फसल की तैयारी के लिए अधिक सुविधाजनक लगती है. यदि सरकार को लक्ष्य पूरा करना है, तो उसे भुगतान प्रणाली को और अधिक सरल बनाने की आवश्यकता है.
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By Sameer Oraon
इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.
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