न्यायिक अनावश्यक सक्रियता

Updated at : 10 May 2017 5:43 AM (IST)
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न्यायिक अनावश्यक सक्रियता

सुभाष कश्यप संविधानविद् सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने कलकत्ता हाइकोर्ट के जस्टिस सीएस कर्णन को अवमानना का दोषी पाते हुए छह महीने की कारावास की सजा सुनायी है. हालांकि, इसके पहले खुद जस्टिस कर्णन ने भारत के मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर के साथ सुप्रीम कोर्ट के अन्य सात जजों को एससी-एसटी […]

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सुभाष कश्यप

संविधानविद्

सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने कलकत्ता हाइकोर्ट के जस्टिस सीएस कर्णन को अवमानना का दोषी पाते हुए छह महीने की कारावास की सजा सुनायी है. हालांकि, इसके पहले खुद जस्टिस कर्णन ने भारत के मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर के साथ सुप्रीम कोर्ट के अन्य सात जजों को एससी-एसटी एक्ट के तहत पांच साल के कारावास की सजा सुनायी थी.

दरअसल, बीते कुछ समय से सुप्रीम कोर्ट के जजों और जस्टिस कर्णन के बीच विवाद चल रहा है. लेकिन, इस विवाद की परिणति इस स्तर पर आ जायेगी कि एक हाइकोर्ट का जज सुप्रीम कोर्ट के जजों को कारावास की सजा सुना दे और वह दिन भारतीय न्यायपालिका के लिए एक ऐतिहासिक दिन बन जाये, ऐसा किसी ने सोचा नहीं होगा.

बहरहाल, कानूनी मामले में सुप्रीम कोर्ट से ऊपर कुछ भी नहीं है और वह फैसला सुनाने के लिए सुप्रीम है. इसलिए इस पूरे प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जस्टिस कर्णन को छह महीने की कारावास की सजा सुनाने को ही सर्वोच्च माना जाना चाहिए. यह तो हुई सुप्रीम कोर्ट की बात. जहां तक न्यायपालिका का सवाल है, तो जस्टिस कर्णन और सुप्रीम के जजों के बीच जारी इस विवाद और फैसलों के प्रकरण के मद्देनजर, मैं समझता हूं कि आज पूरी भारतीय न्यायिक व्यवस्था में पुनर्विचार की आवश्यकता है. क्योंकि, न्यायपालिका ने ऐसी शक्तियों का इस्तेमाल किया है, जो संविधान के अनुसार नहीं मालूम पड़ता है.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि किसी मामले के फैसले को लेकर हाइकोर्ट के जजों और सुप्रीम कोर्ट के जजों के पास बहुत शक्तियां होती हैं. लेकिन, उनके फैसलों से ऐसा कतई नहीं होना चाहिए कि उनकी शक्तियों का इस्तेमाल ही अनुचित लगने लगे. सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ जस्टिस कर्णन अपना फैसला सुनाते हुए यह सोचते हैं कि वे अपने अधिकार क्षेत्र में काम कर रहे हैं.

लेकिन, वहीं सुप्रीम कोर्ट भी यही सोचता है कि वह अपने अधिकार क्षेत्र में ही काम कर रहा है. निचली अदालतें भी ऐसा ही सोचती होंगी. इसके बावजूद मैं समझता हूं कि पूरी न्यायिक व्यवस्था पर पुनर्विचार करने की जरूरत है, क्योंकि एक अरसे से अदालतों के जजों पर आरोप लगते रहे हैं कि कहीं वे अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं या फिर न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार के अंकुर फूटने लगे हैं.

इस प्रकरण से उपजी ऐसी परिस्थितियों की वजह से ही न्यायपालिका पर से लोगों का भरोसा कमजाेर होता है और लोग न्याय की उम्मीद करना छोड़ देते हैं. यह एक लोकतांत्रिक देश के लिए कहीं से भी ठीक नहीं है कि वहां की जनता का न्यायपालिका पर भराेसा कमजोर हो जाये.

जस्टिस कर्णन के फैसले के बाद आये सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आलोक में देखें, तो आज के भारत में न्यायिक अनावश्यक सक्रियता पर विचार करने की बहुत ज्यादा जरूरत है. चाहे सुप्रीम कोर्ट हो या हाइकोर्ट हो, या फिर निचली अदालतें हों, सबको यह विचार करना चाहिए कि अगर न्यायिक अनावश्यक सक्रियता एक सीमा से बाहर जाती है, तो इसका गलत इस्तेमाल हो सकता है और फिर न्यायिक स्तर पर कई समस्याएं पैदा हो सकती हैं. सुप्रीम कोर्ट और हाइकोर्ट के बीच टकराव का यह मसला भी नहीं है, क्योंकि भारतीय न्यायपालिका का यह अंदरूनी मामला है.

यहां दूसरी और बेहद महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जाति-बिरादरी को केंद्र में रख कर जस्टिस कर्णन द्वारा एससी-एसटी एक्ट के तहत सुप्रीम कोर्ट के जजों को पांच साल कारावास की सजा सुनाना न्यायिक ऐतबार से उचित नहीं लगता है. ऐसे में, न्यायालय पर लोगों का भरोसा बना रहे, इसके लिए इस पूरे प्रकरण के तहत न्यायिक व्यवस्था पर पुनर्विचार की आवश्यकता है.

जाहिर है, न्यायिक सक्रियता की भी अपनी एक सीमा होनी चाहिए और यह बात जजों को समझनी चाहिए. यह सीमा खुद न्यायालयों को ही तय करनी चाहिए कि वे किस हद तक अपनी न्यायिक सक्रियता बनाये रखें, ताकि संविधान सम्मत निर्णयों को लिया जा सके.

अक्सर न्यायपालिका के अधिकारों की बात की जाती है. सुप्रीम कोर्ट को तो कुछ विशेषाधिकार मिलते ही हैं, लेकिन राज्यों के हाइकोर्ट और देशभर की सारी निचली अदालतें भी कभी-कभी यही समझने लगती हैं कि वे ही सुप्रीम हैं या उन्हें भी विशेषाधिकार प्राप्त है.

हालांकि, एक लोकतांत्रिक देश में विशेषाधिकार किसी संस्था के पास नहीं होने चाहिए, न तो संसद के पास और न ही न्यायपालिका के पास. लोकतंत्र में अगर किसी को विशेषाधिकार प्राप्त है, तो वह संविधान को है और संविधान ही सर्वोच्च होना चाहिए. लोकतंत्र में संविधान और देश की जनता दो ही सर्वोच्च होते हैं, बाकी कोई नहीं, न न्यायपालिका और न विधायिका.

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