राष्ट्र को संवारने में जुटा राजनेता

Updated at : 23 Mar 2017 6:22 AM (IST)
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राष्ट्र को संवारने में जुटा राजनेता

जीएन बाजपेई पूर्व चेयरमैन, सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया अगस्त 1990 में मंडल आयोग की अनुशंसाओं का क्रियान्वयन ‘सामाजिक न्याय’ पर एक नये जोर के नीतिगत परिवर्तन का गवाह बना. नीतियों के ऐसे बदलाव के नतीजे में कोई जीतता है, तो कोई हारता भी है. यहां भी पिछड़े वर्गों के सदस्यों ने जहां खुशियां […]

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जीएन बाजपेई
पूर्व चेयरमैन, सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया
अगस्त 1990 में मंडल आयोग की अनुशंसाओं का क्रियान्वयन ‘सामाजिक न्याय’ पर एक नये जोर के नीतिगत परिवर्तन का गवाह बना. नीतियों के ऐसे बदलाव के नतीजे में कोई जीतता है, तो कोई हारता भी है. यहां भी पिछड़े वर्गों के सदस्यों ने जहां खुशियां मनायीं, अगड़ी जातियों के हिंदुओं ने विरोध की आवाजें भी उठायीं. तत्कालीन प्रधानमंत्री ने अपनी सारी सियासी पूंजी भारत में एक अधिक समतामूलक समाज के अपने संभावित यकीन में लगा दी.
बाद के दशकों के दौरान राजनीतिज्ञों की विचित्र जमात ने इसी आधार पर राजनीतिक कथ्य की नयी व्याख्या कर राजनीति में अपनी जगह सुनिश्चित की.
तथाकथित ‘समावेशी सियासत’ के नये संस्करण के साथ सोशल इंजीनियरिंग के मिश्रण ने जहां एक ओर सपा, बसपा, राजद, इत्यादि, नये सियासी सिलसिले पैदा किये, वहीं मुलायम सिंह, लालू यादव, कांशी राम, मायावती, आदि, क्षेत्रीय क्षत्रपों को भी जन्म दिया. इन सबने इस नये कथ्य का पूर्ण दोहन करते हुए पारिवारिक स्वामित्व के सियासी घराने सृजित किये, शासन किया और खुद को समृद्ध बनाया.
खंडित राष्ट्रीय जनादेश से गंठबंधन की राजनीति का युग आया, निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हुई, भ्रष्टाचार बढ़ा और अंततः नीतिगत पक्षाघात एवं आस्था के संकट का आविर्भाव हुआ. आर्थिक चुनौतियों से जूझता भारत और भी वंचित बन गया. सामाजिक अशांति बड़ी तादाद में हत्याओं, बलात्कारों, आगजनियों और लूटों में प्रकट हुई. इस नीतिगत परिवर्तन के जनक ने एक राजनेता बनने के सपने संजोये थे, मगर मात्र एक चतुर राजनीतिज्ञ बन कर वे इतिहास के हवाले हो गये.
जाति, धर्म, भूगोल तथा भाषा विभाजित भारत ने आगे और भी कई टुकड़ों में बंट कर ‘अनेकता में एकता’ की बुनियादी बुनावट ही कमजोर कर डाली. दूरदर्शी लोगों ने एक व्यवस्थित समाज के छिन्न-भिन्न होते जाने को भांप लिया. सौभाग्य से, वंचितों की उजागर होती निराशा ने एक बार फिर एक नये कथ्य को मौका दिया.
साल 2014 आया और एक सफल मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की छवि ने छलांग लगा उन्हें राष्ट्रीय परिदृश्य पर मुहिम की सदारत सौंप दी. यह फैसला भाजपा के लिए एक वरदान सरीखा सिद्ध हुआ.
मोदी के अंदर बैठे बुद्धिमान राजनीतिज्ञ ने युवा भारत के अधूरे अरमानों में छिपे अवसर को समझा और विकासमूलक अर्थशास्त्र के अधिकांशतः उपेक्षित मार्ग का, और मात्र सोशल इंजीनियरिंग के खेल के विरुद्ध ‘सबका साथ, सबका विकास’ का चयन किया. जनता से जुड़ने की स्पृहणीय क्षमता ने उन्हें सामाजिक विभेदों से ऊपर उठा समर्थन हासिल कराया और राष्ट्र ने तीन दशकों के बाद किसी को स्पष्ट जनादेश से नवाजा. पर, मोदी को विरासत में एक बीमार अर्थव्यवस्था और डगमगाती वृहत आर्थिक स्थिरता मिली, जिसमें मुद्रास्फीति, राजकोषीय तथा चालू खाता घाटा ऊंचा चढ़ा जा रहा था.
एक नेतृत्वकर्ता के रूप में मोदी ने निर्णायक कार्रवाइयों का मार्ग चुना और अर्थव्यवस्था के समस्त क्षेत्रों को एक साथ ही संबोधित किया. उन्होंने स्वयं कठिन परिश्रम तो प्रारंभ किया ही, मंत्रियों तथा नौकरशाही द्वारा भी अपना अनुकरण किये जाने पर जोर दिया. भ्रष्टाचार के निवारणार्थ उन्होंने चतुर्दिक चौकस निगाहें स्थापित कीं.
वैश्विक आर्थिक मंदी की चपेट का सामना करते हुए उन्होंने अर्थव्यवस्था की स्थापित धारणाओं को नवोन्मेषी प्रयासों से विस्थापित करना चाहा, जिसका जीडीपी पर कुछ विपरीत असर भी पड़ा. बिहार के चुनावों के वक्त विपक्ष ने उनके इन प्रयासों के नतीजों की कमियां भुनाने की कोशिश करते हुए एकजुट होकर उन्हें शिकस्त भी दी, पर अपने भीतर सीखने की तीव्र प्रवृत्ति के बूते उन्होंने वे संकेत समझे, अपने तरीके में नयी जान डाली और सामाजिक वर्ग-विभेदों को एक सूत्र में संगठित कर उन्हें विकासात्मक अर्थव्यवस्था के आवरण तले ला खड़ा किया.
उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड चुनावों के नतीजों ने जहां राजनीतिज्ञों के भ्रम दूर किये, वहीं राजनीतिक पंडितों को स्तब्ध कर दिया. चुनावी विशेषज्ञ एवं टीवी के रणबांकुरे अपना मुंह छिपाने को मजबूर हो गये. अब आगे जहां इन चुनावों के गहन विश्लेषण किये जायेंगे, अनुमानों के औचित्य तलाशे जायेंगे और सबक भी सीखे जायेंगे, वहीं इस पटकथा के नौसिखुए लेखक, नरेंद्र मोदी, अब एक आत्मविश्वास से भरे राजनेता की भूमिका में प्रवेश करते दिखते हैं. एक बैठक में एक दफे उन्होंने मुझसे कहा था, ‘मेरे चिंतन में एक समृद्ध एवं एकजुट भारत के सिवाय और कुछ नहीं रहता है.’
कइयों ने उन्हें एक क्षेत्रीय राजनीतिज्ञ, एक नवोदित नेता तथा एक शेखीबाज व्यक्ति समझ रखा था, मगर मैं तो यह समझता हूं कि उनके राजनीतिक कार्यों ने उनमें राष्ट्रकल्याण की गहरी और अमिट भावना भर दी है. वे भारत की भेदग्रस्त सामाजिक संरचना को एक विविधतापूर्ण एकता के धागे में पिरोने के उपक्रम में लगे हैं. उन्होंने अपनी अहम राजनीतिक जमापूंजी दांव पर लगा कर भी विमुद्रीकरण जैसे बदलावमूलक अस्त्र के इस्तेमाल से ‘सामाजिक न्याय’ और ‘आर्थिक समृद्धि’ के उन्हीं नारों को ‘विकासात्मक अर्थव्यवस्था’ से युक्त करने की कोशिश की है.
भ्रष्ट तथा प्रभावित तत्व उन पर समाज को धनी और गरीब वर्गों में बांटने का आरोप मढ़ रहे हैं, पर वह विभेद तो वैश्विक रूप से पहले से ही मौजूद है, जो अनेक राष्ट्रों में दक्षिणपंथी एवं संरक्षणवादी शक्तियों के उदय की वजह भी बना है. मोदी उसी के साफ संकेतों का उपयोग कर विभेदों के तानेबाने से एकत्व का चंदोबा बुनने में लगे हैं. वे कोई समाजवादी नहीं हैं. वे लक्षित नतीजों में यकीन रखते हैं- भौतिक परिसंपत्तियों के सृजन के लिए मनरेगा, सड़कों तथा जल स्रोतों का विकास, स्वास्थ्य सुधार हेतु गैस कनेक्शन, सामाजिक सुरक्षा छतरी के लिए बीमा, स्वास्थ्यचर्या एवं पेंशन तथा आर्थिक दमन के उन्मूलन हेतु जनधन योजना.
राजनीति विज्ञानी जेम्स फ्रीमैन क्लार्क ने कहा, ‘एक राजनीतिज्ञ एवं एक राजनेता में फर्क यह है कि राजनीतिज्ञ को जहां अगले चुनाव की पड़ी होती है, वहीं राजनेता को अगली पीढ़ी की.’
भारत का इतिहास नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का मूल्यांकन करेगा. पर इस बीच, इतना तो स्पष्ट है कि वे एक बंटे समाज को एकजुट करने और एक समृद्ध भारत के निर्माण के लिए राजनीतिक कथ्य को पुनर्भाषित करने में लगे हैं. वे एक वैसे राजनेता के रूप में निखर रहे हैं, जो एक राजनेता के विपरीत, जनता के लिए एक नयी व्यवस्था रचने में अपनी सियासी पूंजी की जोखिम उठाने को भी उद्यत है.
(अनुवाद: विजय नंदन)
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