मोतिहारी में केंद्रीय विवि पर चुप्पी क्यों

Published at :01 Mar 2014 3:34 AM (IST)
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मोतिहारी में केंद्रीय विवि पर चुप्पी क्यों

एकेडेमिक संस्थान भी किसी राज्य के विकास का पैमाना होते हैं. बिहार इस मामले में उपेक्षा ङोलता रहा है. आजादी के बाद दक्षिण भारत और महानगरों में ही ज्यादातर बड़े और श्रेष्ठ संस्थान खुले. झारखंड के अलग होने के बाद तो गिने-चुने संस्थान ही बिहार में बच गये थे. पिछले चार-पांच वर्षो में इस दिशा […]

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एकेडेमिक संस्थान भी किसी राज्य के विकास का पैमाना होते हैं. बिहार इस मामले में उपेक्षा ङोलता रहा है. आजादी के बाद दक्षिण भारत और महानगरों में ही ज्यादातर बड़े और श्रेष्ठ संस्थान खुले. झारखंड के अलग होने के बाद तो गिने-चुने संस्थान ही बिहार में बच गये थे. पिछले चार-पांच वर्षो में इस दिशा में पहल हुई और राज्य में कुछ नये संस्थान खुले हैं, जिनमें सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ बिहार (सीयूबी) भी एक है.

लेकिन, स्थापना के करीब चार साल बाद अब जाकर इसके कैंपस के निर्माण की उम्मीद जगी है. लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने गया के पास पंचानपुर में गुरुवार को कैंपस की आधारशिला रखी. फिलहाल सीयूबी पटना में बीआइटी भवन में चल रहा है. सीयूबी के शिलान्यास के साथ मोतिहारी में प्रस्तावित एक अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालय के निर्माण का सवाल भी उभरा है. पहले सीयूबी का कैंपस मोतिहारी में बनने वाला था. राज्य सरकार की ओर से इसके पक्ष में तर्क दिया गया था कि मोतिहारी से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की यादें जुड़ी हैं.

लेकिन, केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रलय ने भौगोलिक कठिनाइयों का हवाला देकर इसे खारिज कर दिया. पिछले साल जब राज्य और केंद्र के बीच सीयूबी के स्थल को लेकर टकराव बढ़ा, तो तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने घोषणा की कि मोतिहारी में अलग से केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की जायेगी. गया में सीयूबी का शिलान्यास भी हो गया, लेकिन मोतिहारी में प्रस्तावित केंद्रीय विवि को लेकर केंद्र सरकार ने चुप्पी साध ली है. देश में कई ऐसे राज्य हैं, जहां एक से ज्यादा केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं.

यदि मोतिहारी में भी केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना होती, तो निश्चित तौर पर उत्तर बिहार का न केवल शैक्षणिक, बल्कि भौतिक विकास भी होता. इससे आजादी के बाद बिहार की लगातार हकमारी और उपेक्षा की थोड़ी भरपाई भी होती. इस मामले को लंबे समय तक लटकाये रखना इसलिए भी उचित नहीं दिखता कि रघुराम राजन कमेटी की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डालने के खिलाफ और विशेष दर्जा की मांग पर बिहार में गोलबंदी तेज हो रही है. लंबे समय तक केंद्र की चुप्पी जारी रही, तो कहीं लोगों के बीच यह संदेश न चला जाये कि बिहार की उपेक्षा जारी है.

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