यूजीसी का जरूरी निर्देश

Updated at : 10 Feb 2017 6:28 AM (IST)
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यूजीसी का जरूरी निर्देश

छात्रों में रोजगार के लिए समुचित कौशल सुनिश्चित करने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने विश्वविद्यालयों को कम-से-कम तीन साल में एक बार पाठ्यक्रम की समीक्षा करने को कहा है. रोजगार के अवसरों का पर्याप्त संख्या में नहीं बढ़ने के साथ यह भी बड़ी समस्या है कि भारी संख्या में शिक्षित युवा डिग्री के […]

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छात्रों में रोजगार के लिए समुचित कौशल सुनिश्चित करने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने विश्वविद्यालयों को कम-से-कम तीन साल में एक बार पाठ्यक्रम की समीक्षा करने को कहा है. रोजगार के अवसरों का पर्याप्त संख्या में नहीं बढ़ने के साथ यह भी बड़ी समस्या है कि भारी संख्या में शिक्षित युवा डिग्री के बावजूद सक्षम नहीं होते हैं.

वर्ष 2015 में एस्पायरिंग माइंड्स नेशनल इंप्लॉयबिलिटी रिपोर्ट में कहा गया था कि 650 से अधिक कॉलेजों से निकलनेवाले डेढ़ लाख से ज्यादा इंजीनियरों में से 80 फीसदी रोजगार के लायक ही नहीं थे. इसी तरह उद्योग और वाणिज्य से संबंधित संस्था एसोचैम ने पिछले साल बताया था कि देश के तकरीबन साढ़े पांच हजार बिजनेस मैनेजमेंट संस्थानों से पास होनेवाले 93 फीसदी लोग अक्षम हैं. जिन्हें नौकरी मिल जाती है, उनमें से अधिकतर 10 हजार के आस-पास मासिक वेतन पाते हैं. एक अन्य आकलन के अनुसार, हर साल स्नातक होनेवाले 50 लाख युवाओं में से 50 फीसदी के पास बुनियादी कौशल और गुणवत्ता नहीं होती है. शिक्षित युवाओं की ऐसी चिंताजनक स्थिति को इस तथ्य के साथ रख कर देखें कि बिना किसी प्रशिक्षण के हर महीने 10 लाख लोग आगामी दो दशकों तक श्रम बाजार में प्रवेश करते हैं. अर्थव्यवस्था में विकास के बावजूद इस संख्या को सही रोजगार दे पाना बड़ी चुनौती है.

यदि शिक्षित लोगों में अपने क्षेत्र से संबंधित कौशल होगा तथा शैक्षणिक गुणवत्ता होगी, तभी वे बाजार में टिक सकेंगे. इस पृष्ठभूमि में यूजीसी का निर्देश सराहनीय हस्तक्षेप है और उम्मीद की जानी चाहिए कि सभी विश्वविद्यालय इस दिशा में त्वरित कदम उठायेंगे. लेकिन, इस प्रयास के साथ यह भी जरूरी है कि शैक्षणिक संस्थाओं को जरूरी संसाधन उपलब्ध कराने की दिशा में भी ठोस पहल हो.

निजी कॉलेजों-विश्वविद्यालयों के आने से यह आशा बंधी थी कि वे न सिर्फ सरकारी संस्थाओं के बोझ को कम करेंगे, बल्कि नयी ऊर्जा और दृष्टि के साथ शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करेंगे. लेकिन, इसमें निराशा ही हाथ लगी है. राष्ट्र-निर्माण में आवश्यक योगदान देने की जगह सरकारी और निजी संस्थाएं डिग्री बांटने का कारखाना बन गयी हैं.

निजी संस्थानों के मुनाफा कमाने और सतही शिक्षा देने की प्रवृत्ति पर भी निरंकुश गति से जारी है. यूजीसी को निगरानी और नियमन की अपनी जिम्मेवारी को लेकर गंभीर होने की जरूरत है. शिक्षा की बेहतरी से ही हम समृद्धि और विकास की आकांक्षाओं को अमली जामा पहना सकते हैं.

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