संघ की बिसात पर सोशल इंजीनियरिंग

।। पुण्य प्रसून बाजपेयी ।। (वरिष्ठ पत्रकार) नरेंद्र मोदी, रामविलास पासवान और उदित राज. राजनीतिक मजबूरी ने तीनों को एक साथ ला खड़ा किया है या एकदूसरे का हाथ थामने के हालात पैदा किये हैं. 2014 के आम चुनाव को लेकर बिछते राजनीतिक बिसात पर बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग का यह नायाब चेहरा है. या […]
।। पुण्य प्रसून बाजपेयी ।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
नरेंद्र मोदी, रामविलास पासवान और उदित राज. राजनीतिक मजबूरी ने तीनों को एक साथ ला खड़ा किया है या एकदूसरे का हाथ थामने के हालात पैदा किये हैं. 2014 के आम चुनाव को लेकर बिछते राजनीतिक बिसात पर बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग का यह नायाब चेहरा है. या फिर पहली बार संघ परिवार के ओबीसी नायक नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की हवा में अपनी राजनीतिक जमीन बनाने का प्रयास उदित राज और रामविलास कर रहे हैं. हो जो भी, लेकिन राजनीतिक गंठबंधन इस तरह करवट लेंगे यह बीजेपी ने तो नहीं ही सोचा होगा, बल्कि संघ परिवार को तो इसका अहसास नहीं रहा होगा कि जिस जातीय राजनीति का पाठ उसने कभी अपने राजनीतिक स्वयंसेवकों को पढ़ाया ही नहीं, वह कैसे संघ परिवार के सबसे मुखर स्वयंसेवक के साथ आ खड़ा हुआ है.
इतिहास के पन्नों को पलटें तो उदित राज हों या रामविलास, दोनों ने जातीय राजनीति के आसरे पहला निशाना हमेशा बीजेपी पर ही साधा है. 1990 में जब बीजेपी मंडल कमीशन का विरोध कर रही थी, वीपी सिंह ने आडवाणी की राम रथयात्र को थामने के लिए सबसे पहले रामविलास पासवान को ही सड़क पर उतारा था. पासवान बकायदा दलित सेना लेकर सड़क पर उतरे थे और बीजेपी को जातीय जरूरत को समझने का पाठ सड़क से पढ़ाना शुरू किया था. उस वक्त पासवान सबसे मुखर होकर बीजेपी की राजनीति पर निशाना साध रहे थे और बीजेपी को मनुवादी करार दिया था. इसी तर्ज पर 2001 में बौद्ध धर्म अपना कर उदितराज ने संघ परिवार पर सीधा निशाना साधा था और सिर मुंडा कर आरएसएस के ब्राrाणवादी सोच व बीजेपी की हिंदुत्व थ्योरी पर सीधी चोट की थी.
6 दिसंबर, 2002 को चेन्नई में धर्म परिवर्तन की सभा में संघ पर हमला करने के बाद विहिप के गिरिराज किशोर ने उदित राज की राजनीति को नौटंकी बताते हुए समाज में विष फैलानेवाला करार दिया था. 1990 हो या 2001, संघ परिवार ने ही नहीं, बीजेपी ने भी कभी इस तरह की सोशल इंजीनियरिंग को तरजीह नहीं दी. 1990 में कमंडल तले मंडल के नीचे से समर्थन खींच लिया तो वीपी सिंह की सरकार गिर गयी और 2001 में गोविंदाचार्य यूपी-बिहार में घूम-घूम कर आरएसएस को सोशल इंजीनियरिंग पाठ पढ़ा रहे थे. लेकिन मुखौटे के मुद्दे पर गोविंदाचार्य को बीजेपी ने झटका तो संघ ने भी आसरा इसलिए नहीं दिया, क्योंकि तब तक कल्याण सिंह के जरिये अयोध्याकांड का सोशल इंजीनियरिंग का बुखार संघ से उतर चुका था. लेकिन अब जब नया इतिहास ही 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए लिखा जा रहा है, तो मोदी की चुनावी बिसात पर उदित राज और पासवान को प्यादा या वजीर के तौर पर मानना-देखना होगा. क्योंकि लोकसभा की कुल 543 में से 120 सीटें सिर्फ यूपी और बिहार में हैं, जहां बीजेपी दलित वोट में इन्हीं दोनों के आसरे सेंध लगाना चाहती है. यहां दलित वोट बैंक 22 से 24 फीसदी है. यूपी में मायावती को 2009 में दलितों के 55 फीसदी वोट मिले थे. पर बिहार में दलित वोट बैंक के कई खिलाड़ी हैं और दलितों में महादलित का खेल नीतीश कुमार ने जैसे ही किया, वैसे ही लालू-पासवान का सिक्का भी कमजोर पड़ गया.
दरअसल, नरेंद्र मोदी पीएम की रेस में जिस तरह दौड़ रहे हैं, उसमें पहली बार आरएसएस ने भी विचारधारा की लक्ष्मण रेखा तक को मिटा दिया है और जातीय राजनीति का गणित अगर मोदी को पीएम की कुरसी तक पहुंचाने के अनुकूल है, तो फिर संघ ने भी अपनी बांहें समेट रखी हैं. असर इसी का है कि यूपी-बिहार में लोकसभा की कुल 120 सीटों के लिए बीजेपी के सोशल इंजीनियरिंग का बड़ा सियासी दांव खेला जा रहा है. उदित राज यूपी के रामनगर के हैं. खटिक हैं तो यूपी में मायावती के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए बीजेपी के पास अभी तक कोई चेहरा नहीं था. वहीं बिहार में भी बीजेपी के पास दलित वोट के लिए कोई चेहरा नहीं है. ऐसे में रामविलास यदि बीजेपी के साथ आ जाते हैं, तो फिर बिहार में पार्टी को बड़ा लाभ हो सकता है. बीजेपी के साथ यदि पासवान मिलते हैं, तो जातीय गणित का फायदा दोनों को मिलेगा.
आंकड़ों के लिहाज से देखें तो बिहार में 23 फीसदी दलित हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव में दलित वोट बैंक में से रामविलास पासवान को सबसे ज्यादा 29 फीसदी वोट मिले थे और बीजेपी को सबसे कम 8.5 फीसदी वोट मिले थे. ऐसे में यदि दोनों दल मिल जाते हैं, तो 37.5 फीसदी वोट बीजेपी-एलजेपी गंठबंधन के पास होगा, जो नीतीश के 23 फीसदी व लालू यादव के 16.5 फीसदी से आगे होगा. यानी बिहार की उन 12 सीटों पर बीजेपी-एलजेपी का गंठबंधन मुसलिम वोट बैंक की धार को बेअसर कर सकता है, जिसके आसरे लालू, नीतीश या कांग्रेस अब तक बीजेपी को मात देते आये हैं. हालांकि, उदित राज के जरिये बीजेपी यूपी में चुनावी गणित बदल देगी या मायावती के वोट बैंक में सेंध लगा देगी, यह कहना जल्दबाजी होगी. लेकिन उदितराज की पहचान के साथ बीजेपी को तीन लाभ तो मिल ही सकते हैं. पहला यूपी में मायावती की काट के तौर पर इस्तेमाल, दूसरा बंगारू लक्ष्मण से हुए नुकसान की भरपाई का मौका और तीसरा उदित राज के जरिये दलितों की बनायी हुई मायावती की छवि को तोड़ा जा सकता है, क्योंकि वे अधिकारी रह चुके हैं और अंबेडकर की लीक पकड़ कर बौद्ध धर्म अपनाया. उदितराज ने अपनी राजनीतिक पारी 2001 में इंडियन जस्टिस पार्टी बनाकर शुरू की तो बीजेपी अंबेडकर की विरासत को उदित राज के साथ जोड़कर मायावती की दलित सियासत में सेंध लगाने की चाल भी चलेगी.
आखिरी सवाल संघ परिवार का है, जिसकी पीठ पर मोदी सवारी कर भी रहे हैं और 2014 का डर दिखा संघ को झटकने से भी नहीं कतरा रहे हैं. ऐसे मोड़ पर आरएसएस चाहे उम्मीदवारों के नाम तय करे, चाहे संघ के स्वयंसेवक गली-गली घूम कर हिंदुत्व का राग अलापें और देश के लिए पहली बार हर किसी को वोट डालने के लिए घर से निकालने में भिड़ें. लेकिन जब संसदीय चुनाव का रास्ता ही मोदी के नाम पर बन रहा होगा, तो हर जीत के पीछे मोदी ही होंगे. संघ का चेक एंड बैलेंस काम कैसे करेगा, यह सवाल संघ को बेचैन तो जरूर कर रहा होगा, पर पहली बार संघ भी सत्ता देख रहा है और उम्मीद पाले हुए है कि सत्ता पाने के बाद किसी हिंदी फिल्म की तर्ज पर पोयटिक जस्टिस होगी और मोदी भी संघ की विचारधारा तले लौट आयेंगे. (ब्लॉग से साभार)
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