बजट से रेलवे रहा नाउम्मीद

Updated at : 02 Feb 2017 6:35 AM (IST)
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बजट से रेलवे रहा नाउम्मीद

अरविंद कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व सलाहकार, भारतीय रेल इस आम बजट में रेलवे के भविष्य के लिहाज से कोई ठोस दिशा नहीं दिखती है. सबसे बड़ी योजना रेलवे के लिए एक लाख करोड़ रुपये का सेफ्टी फंड बनाना तो सरकार की मजबूरी थी. जिस तरह से बड़ी रेल दुर्घटनाएं घट रही थीं, उसे […]

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अरविंद कुमार सिंह
वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व सलाहकार, भारतीय रेल
इस आम बजट में रेलवे के भविष्य के लिहाज से कोई ठोस दिशा नहीं दिखती है. सबसे बड़ी योजना रेलवे के लिए एक लाख करोड़ रुपये का सेफ्टी फंड बनाना तो सरकार की मजबूरी थी. जिस तरह से बड़ी रेल दुर्घटनाएं घट रही थीं, उसे देखते हुए रेलवे को सुरक्षा और संरक्षा पर तत्काल ध्यान देना अपरिहार्य हो गया था. और इसके लिए काफी संसाधनों की जरूरत थी.
खास तौर पर रेल पथ नवीनीकरण और मानव रहित समपारों को हटाना बेहद जरूरी हो गया था. वित्त मंत्री ने 2017-18 के लिए रेलवे का बजट आकार 1.21 लाख करोड़ रुपये से बढ़ा कर 1.31 लाख करोड़ रुपये रखा है. साल 2016-17 में 2,800 किमी नयी रेल लाइनों के निर्माण के लक्ष्य की तुलना में इस बार 3,500 किमी लंबी नयी रेलवे लाइनों के निर्माण का प्रावधान किया गया है. हालांकि, सेफ्टी फंड बनाने के लिए रेलवे पहले से ही 1.71 लाख करोड़ रुपये की मांग कर रहा था. सेफ्टी फंड को पांच सालों के दौरान जमीन पर उतारना है. बजट में 7 हजार रेलवे स्टेशन सौर उर्जा से लैस करने का इंतजाम भी होगा.
रेल बजट की सबसे अहम घोषणा राष्ट्रीय रेल सुरक्षा कोष बनाने की है. 2014 से ही रेलवे इस नये कोष के लिए लगातार कोशिश कर रहा थी. लेकिन, भारत सरकार ने इस पर तब तक ध्यान नहीं दिया, जब तक कि लगातार हो रही रेल दुर्घटनाओं ने सबको हिला कर नहीं रख दिया.
अब रेलवे ने 2020 तक सारी मानव रहित समपारों की समाप्ति का फैसला लिया है. कुछ और पहलों में साफ-सफाई से लेकर इ-टिकटिंग में सेवा प्रभार की समाप्ति आदि को शामिल है. प्रधानमंत्री ने भी बजट को सराहा है और कहा है कि इसमें रेलवे के आधुनिकीकरण की ठोस पहल साफ दिखती है.
इस बजट में यह साफ दिख रहा है कि भविष्य में सरकार रेलवे को एक समग परिवहन नीति के तहत विकसित करने का इरादा रखती है. वित्त मंत्री ने रेलवे के विकास में चार खास प्राथमिकताएं दी हैं, जिसमें यात्री सुरक्षा सर्वोच्च है. भविष्य में रेलवे सड़क परिवहन के साथ मिल कर कुछ नये रास्ते खोलेगी. साथ ही रेलवे को सड़क, अंतर्देशीय जलमार्ग एवं समुद्री परिवहन के साथ जोड़ कर एक नया ढांचा तैयार किया जायेगा. इसी तरह मेट्रो रेलवे के लिए सरकार नयी नीति की घोषणा भी करेगी और इसके लिए विधायी इंतजाम किये जायेंगे. इससे निजी भागीदारी में भी मदद मिलेगी.
सुरक्षा और संरक्षा के लिए कोष नीतीश कुमार की तर्ज पर बनाया जा रहा है. अटलजी के प्रधानमंत्री काल में 17 हजार करोड़ रुपये की संरक्षा निधि से काफी काम हुआ था. हाल के सालों में टक्कर रोधी उपकरणों की स्थापना, ट्रेन प्रोटेक्शन वार्निंग सिस्टम, ट्रेन मैनेजमेंट सिस्टम, सिग्नलिंग प्रणाली का आधुनिकीकरण, संचार प्रणाली में सुधार किया गया, पर यह सब छोटे-छोटे खंडों तक सीमित रहा. बाद में डाॅ अनिल काकोदकर की अध्यक्षता में बनी संरक्षा समीक्षा कमेटी ने सुरक्षा-संरक्षा को चाक चौबंद करने को एक लाख करोड़ रुपये के निवेश की वकालत की. पर इस पर खास काम नहीं हुआ.
हकीकत यह है कि भारतीय रेल गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है. रेल मंत्री के रूप में सुरेश प्रभु दावों पर खरे नहीं उतरे हैं. हाल में हुई कुछ भयानक रेल दुर्घटनाओं ने रेलवे को जमीनी हकीकत दिखा दी है.
वहीं रेलवे का परिचालन अनुपात पिछले साल के 92 फीसदी की तुलना में अब 94 फीसदी तक आ गया है. आज रेलवे के समक्ष कई तरह की दुश्वारियां और चिंताएं हैं. रेलवे का वेतन बिल बढ़ता जा रहा है, रेलगाड़ियां भी बढ़ रही हैं, पर कर्मचारियों की संख्या लगातार घट रही है. 1991 में 18.7 लाख रेल कर्मचारी थे, जो अब 13 लाख से कम हैं. संरक्षा श्रेणी में ही बड़ी संख्या में पद खाली पड़े हैं. सातवें वेतन आयोग ने रेलवे पर 40,000 करोड़ रुपये का दबाव डाला है, जबकि यात्री सेवाओं का घाटा बढ़ कर सालाना 33,000 करोड़ रुपये से अधिक हो चला है. वहीं कुछ चालू परियोजनाओं के लिए रेलवे को पांच लाख करोड़ रुपये चाहिए.
आज भारतीय रेल के सबसे व्यस्त गलियारों की दशा तक ठीक नहीं है, तो बाकियों का अंदाजा लगाया जा सकता है. रेलवे के सात उच्च घनत्व वाले मार्गों दिल्ली-हावड़ा, दिल्ली-मुंबई, मुंबई-हावड़ा, हावड़ा-चेन्नई, मुंबई-चेन्नई, दिल्ली-गुवाहाटी और दिल्ली-चेन्नई के 212 रेल खंडों में से 141 खंड भारी संतृप्त हो गये हैं. इन खंडों पर क्षमता से काफी अधिक रेलगाड़ियां दौड़ रही हैं. इसी तरह तमाम प्रयासों के बाद भी परिवहन में रेलवे की हिस्सेदारी गिर कर 36 फीसदी तक रह गयी है. लेकिन, रेलवे प्रणाली को और अधिक सुरक्षित, आधुनिक और प्रभावी बनाने के लिए अधिक संसाधनों की जरूरत तो है ही. उसे कुशल मानव संसाधन भी चाहिए.
इन चिंताओं के साथ आम बजट में रेलवे को समाहित किये जाने से रेलवे के भविष्य के लिहाज से कोई बहुत बेहतर तस्वीर नहीं नजर आती है. रेलवे को भावी चुनौतियों के लिहाज से सक्षम बनाने के लिए भारी-भरकम निवेश के साथ कई मोरचों पर बहुत कुछ करने की जरूरत है. उम्मीद है कि शायद आनेवाले बजटों में सरकार इन पहलुओं पर ध्यान दे.
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