ये फेमिनिज्म क्या बला है!

Updated at : 01 Feb 2017 1:15 AM (IST)
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ये फेमिनिज्म क्या बला है!

सुजाता युवा कवि एवं लेखिका जैसे उत्तर आधुनिकता ने हर विचार का, इतिहास का, कविता का अंत घोषित किया, वैसे ही फेमिनिज्म के अंत की भी घोषणाएं हो चुकी हैं. ऐसे में जब अमेरिका में एक ऐसा जुलूस निकाला जाता है, जो द्वितीय चरण में हुए स्त्री मुक्ति आंदोलन को करप्ट मान कर गर्भपात के […]

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सुजाता
युवा कवि एवं लेखिका
जैसे उत्तर आधुनिकता ने हर विचार का, इतिहास का, कविता का अंत घोषित किया, वैसे ही फेमिनिज्म के अंत की भी घोषणाएं हो चुकी हैं. ऐसे में जब अमेरिका में एक ऐसा जुलूस निकाला जाता है, जो द्वितीय चरण में हुए स्त्री मुक्ति आंदोलन को करप्ट मान कर गर्भपात के विरुद्ध और परिवार के हक में एक नये तरीके से स्त्रीवाद को व्याख्यायित कर रहा हो और जबकि दलित स्त्रीवाद भी विवाह और परिवार को स्त्री के लिए जरूरी मान कर चल रहा हो, तब चीजें बहुत आसान नहीं रह जातीं.
तब और भी, जब कुछ नये स्त्रीवादी यह कहें कि स्त्रीवाद एक लड़ा और जीता जा चुका युद्ध है और अब हमें सिर्फ इसके हासिल का भरपूर फायदा लेना सीखना है. कोई स्त्रीवाद को गाली देकर हिट होना चाहता है, तो इसमें स्वीकृति की भयानक तलब छिपी हुई दिखाई देती है. सर्वस्वीकृत होना तो फेमिनिज्म का लक्ष्य कभी नहीं रहा. स्त्रीवादियों ने अपने हक के लिए लड़ाई की है, त्याग किये हैं, प्राणोत्सर्ग किया है. सर्वप्रिया होने की प्रेरणा स्त्रीवाद का लक्षण नहीं है. पुरुष या पुरुषवाद की सहमति, स्वीकृति और प्रशंसा के लिए व्याकुल स्त्रीवाद अपने मूल के विरुद्ध है.
इसमें कोई शक नहीं है कि स्त्री आंदोलन के कुछ मोर्चे फतह कर लिये गये हैं और इसका नतीजा है कि लड़कियां स्कूल जा रही हैं, कैरियर बना रही हैं, सफल हो रही हैं, लिख रही हैं, कलाकार हैं, वैज्ञानिक हैं. चलते मुहावरे में यह कि लड़कियां क्या नहीं कर सकतीं! भले ही पॉपुलर मीडिया स्त्री को एक लैंगिक वस्तु के रूप में पेश करता हो, लेकिन स्त्री के विरुद्ध हिंसा और स्त्री अधिकारों का हनन हल्के ढंग से नहीं लिया जाता.
बलात्कार की एक खबर पर हंगामा सड़क तक उतर सकता है. लेकिन, न समस्या यहां खत्म हुई है, न उसके रास्ते ही आसान हुए हैं. गैर-बराबरी और स्त्री के प्रति घृणा का भाव हमारे भीतर इस कदर भरा है कि हम अपनी ही देह से अपने ही स्त्री होने से भी कतराना चाहते हैं.
स्त्रीवाद कोई इकहरी विचारधारा नहीं है. अलग-अलग समय पर अपने भिन्न उद्देश्यों के साथ यह अलग-अलग शत्रुओं के खिलाफ उभरती रही है.
अपने आरंभिक चरण में स्त्री मताधिकार की लड़ाई इतनी बड़ी लड़ाई थी कि इसके लिए बाकायदा स्त्रियों ने जान तक गंवायी. एक लंबे संघर्ष के बाद यह हासिल हुआ. अफ्रीका जैसे देश में यह फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (स्त्री जननांगों को विकृत किया जाना) के खिलाफ जंग हो सकती है. भारत के शुरुआती समाज सुधार आंदोलनों की तरह यह बाल-विवाह, सती-प्रथा, विधवा पुनर्विवाह और दहेज के खिलाफ जंग हो सकती है. स्त्री आंदोलन के अपने द्वितीय चरण में यह गर्भपात का कानूनी हक हासिल किये जाने की जंग हो सकती है. दुनिया के किसी कोने में स्त्रीवाद तलाक और गुजारा भत्ता पाने की जंग हो सकती है. शहर में वक्त-बेवक्त स्त्री के घर से बाहर निकलने और सुरक्षित रहने का अधिकार हासिल करना और दूर-दराज के किसी गांव में पीने का पानी दूर से भर कर लाने से मुक्ति ही स्त्री मुक्ति का अहम मुद्दा हो सकता है.
न पितृसत्ता का ही एक सार्वभौमिक रूप है, न ही स्त्री अधिकारों की लड़ाई सब जगह एक ही जैसी जंग है. इसलिए यह कहना कि स्त्रीवाद एक लड़ी जा चुकी और जीती जा चुकी लड़ाई है, खुद उस देश की भी सच्चाई नहीं है, जो मनुष्य की वैयक्तिक स्वतंत्रता का सबसे बड़ा हिमायती है.
पितृसत्ता के एक सार्वभौमिक स्वरूप को विद्वानों से चुनौती मिलती रही है. ध्रुवीकरण करने की मंशाओं को लेकर स्त्रीवाद की भी आलोचना की जाती रही है. विभिन्न सांस्कृतिक और ऐतिहासिक कारक स्त्री की लैंगिक पहचान को व्याख्यायित करते हैं, उसे प्रभावित करते हैं, फिर भी स्त्री पराधीनता और दमन की एक साझी अवधारणा स्त्री-विमर्श और विभिन्न स्त्री आंदोलनों के आधार पर विकसित होती है. मुख्यत: यह विश्वास कि मनुष्यों के बीच लैंगिक आधार पर भेदभाव किया जाता रहा है और लैंगिक-द्वैत की सामाजिक संरचना में स्त्री को व्यवस्थाबद्ध तरीके से निर्णय और बराबर की भागीदारी से वंचित किया गया. एक लिंग (स्त्री) को दोयम दर्जा देनेवाली समस्त परिस्थितियों को बदलने की मंशा स्त्रीवाद का मूल है. स्त्रीवाद यह समझने में मदद करता है कि चीजें ऐसी क्यों हैं, जैसी वे आज हैं? यह स्त्रीवादी दृष्टिकोण स्त्री को हीन मानने और पुरुष को ही मुख्य और प्रथम लिंग मानने के खिलाफ है.
रेबेका वेस्ट लिखती हैं कि मैं नहीं जानती कि मुझे स्त्रीवादी क्यों कहा जाता है, जब भी मैं अपने दमन को अस्वीकार करती हूं, तो समझा जा सकता है कि स्त्रीवाद अपने जिन अर्थों में सत्तर-अस्सी के दशक से पूर्व इस्तेमाल हुआ, वैसा ही आज नहीं रह गया है.
एक बड़ी ताकत की तरह स्त्री-मुक्ति आंदोलन ने अपने लिए एक मजबूत जमीन बनायी थी. लेकिन, जितना बल स्त्री-मुक्ति आंदोलन का है, उससे कहीं ताकतवर उसके खिलाफ खड़ी ताकतों का है. स्त्रीवाद के भी अपने विरोधाभास हैं, फेमिनिज्म के नये लक्ष्य हैं और नयी लड़ाइयां, नयी चुनौतियां हैं. यह व्यक्तिवादी स्त्रीवाद है, जो अपने जीवन में अपनी हासिल आजादियों की कीमत भी चुकाता है और आनंदित होता है. एक स्त्रीवाद जो परिवार के भीतर स्त्री की आजादी का पक्षधर है, फैमिली फेमिनिज्म. कहीं स्त्री मुक्ति दरअसल पत्नी मुक्ति है. एक स्त्रीवाद, जिसमें स्त्री नायक है, वही सुपर वुमन है, आत्मनिर्भर है!
अराजक स्त्रीवाद भी आया. अपनी वजहों से उभरा एक रेडिकल फेमिनिज्म भी है, जो उग्र स्वरूप धारण करता है. इरॉटिक फेमिनिज्म भी है. नया उभरा इको-फेमिनिज्म भी, जो मानता है कि विकास की प्रक्रिया में पुरुष ने स्त्री और प्रकृति दोनों का दोहन किया है और स्त्री प्रकृति की संगिनी रही, उसकी संरक्षणकर्ता रही.
एक जरूरी अश्वेत स्त्रीवाद है और दलित स्त्रीवाद भी है, जो नस्ल और जाति के आधार पर अपने दमन को स्त्रीवाद के मुख्य एजेंडे से अलग करता है. एक मार्क्सिस्ट- समाजवादी स्त्रीवाद भी है, जो लैंगिक-वर्ग को मान कर चलता है. भौतिकतावादी स्त्रीवाद. लिबरल स्त्रीवाद. समलिंगी स्त्रीवाद. संसारभर की स्त्रियों में एक बहनापा माननेवाला स्त्रीवाद. पुरुष को शत्रु माननेवाला, प्रताड़ित माननेवाला, उसे साथ लेकर चलनेवाला स्त्रीवाद, आदि.
कुल मिला कर एक नया स्त्रीवाद क्या है, इसकी कोई एक व्याख्या की जल्दबाजी हमें किसी एकांगी नजरिये तक ही ले जाती है. इसलिए जरूरी है कि स्त्रीवाद को एक फौरी लेबल की तरह चिपकाने या ‘स्त्री जन्म लिया तो स्त्रीवादी हुए’ के सरलीकरण के बजाय, एक पठनीय विषय की तरह पढ़ा और समझा भी जाये.
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