छोटे उद्योगों पर हो टैक्स की छूट

Updated at : 24 Jan 2017 6:42 AM (IST)
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छोटे उद्योगों पर हो टैक्स की छूट

डॉ भरत झुनझुनवाला अर्थशास्त्री देश में रोजगार की स्थिति यूपीए के कार्यकाल से ही बिगड़ती आ रही है. लेबर ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2011 में 9 लाख रोजगार उत्पन्न हुए थे. वर्ष 2013 में यह 4 लाख रह गया. वर्ष 2015 में मात्र 1,35,000 रोजगार उत्पन्न हुए. वर्तमान में रोजगार सृजन की बिगड़ती […]

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डॉ भरत झुनझुनवाला
अर्थशास्त्री
देश में रोजगार की स्थिति यूपीए के कार्यकाल से ही बिगड़ती आ रही है. लेबर ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2011 में 9 लाख रोजगार उत्पन्न हुए थे. वर्ष 2013 में यह 4 लाख रह गया. वर्ष 2015 में मात्र 1,35,000 रोजगार उत्पन्न हुए. वर्तमान में रोजगार सृजन की बिगड़ती स्थिति का संकेत छोटे उद्योगों के हालात से मिलता है. देश में अधिकतम रोजगार छोटे उद्योगों में ही उत्पन्न होते हैं. जनवरी 2016 में इन्हें दिये जानेवाले ऋण में 2.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी. जून 2016 में इसमें 3.8 प्रतिशत की गिरावट आयी. स्पष्ट है कि रोजगार की बिगड़ती स्थिति जारी है.
छोटे उद्योगों द्वारा अधिकतर कार्यों को श्रमिकों से कराया जाता है. जैसे गुड़ बनाने के छोटे कारखाने में गन्ने को मशीन में डालना, खोई को फैलाना एवं भट्ठी में झोंकना इत्यादि कार्य श्रमिकों के द्वारा कराया जाता है. चीनी मिल में ये सब कार्य मशीनों से किया जाता है.
राेजगार सृजन छोटे उद्योगों का प्रथम सकारात्मक पक्ष है. इनका दूसरा गुण यह है कि ये नये उद्यमियों को ट्रेनिंग देने की लेबोरेटरी होते हैं. उद्यमिता के विकास के लिए छोटे उद्योगों का जीवित रहना जरूरी है. इनका तीसरा गुण है कि ये हल्के एवं चपल होते हैं. छोटे कारखानों के लिए संभव होता है कि अलग-अलग साइज के 100-100 डिब्बे बना कर सप्लाइ कर सकें. बड़े उद्योगों में एक साइज के एक लाख डिब्बे बनते हैं. उनके लिए छोटे आॅर्डर की सप्लाइ करना कठिन होता है. किंतु छोटे उद्योग ऐसे आॅर्डर को मूर्त रूप देकर विकास को गति देते हैं.
हालांकि, इनके द्वारा छोटी मशीनों का उपयोग किया जाता है, जिनकी गुणवत्ता कमजोर होती है. जैसे गुड़ के कारखाने में गन्ने से लगभग 7 प्रतिशत गुड़ बनाया जाता है, जबकि चीनी के कारखाने में 10 प्रतिशत चीनी बनायी जाती है. छोटे उद्योगों को कच्चा माल कम मात्रा में खरीदना होता है. थोक खरीद की तुलना में यह महंगा पड़ता है. छोटे उद्योग पुरानी तकनीकों का उपयोग करते हैं, इनमें कार्यरत श्रमिकों की कार्य कुशलता कम होती है, क्वाॅलिटी कंट्रोल के उपकरणों का अभाव रहता है. इन अनेक कारणों से छोटे उद्योगों की लागत ज्यादा आती है. छोटे उद्योगों को बाजार में बड़े उद्योगों की प्रतिस्पर्धा में सीधा छोड़ दिया जाये, तो ये बंदप्राय हो जायेंगे. ऐसे में इनके द्वारा हो रहे रोजगार सृजन तथा उद्यमिता विकास से देश वंचित रह जायेगा.
छोटे उद्यागों के इस योगदान को देखते हुए आज तक की सरकारें इन्हें नरम दृष्टि से देखती रही हैं.वर्तमान नियमों के अनुसार 1.5 करोड़ रुपये तक का कारोबार करनेवाली छोटी इकाइयों को एक्साइज ड्यूटी अदा नहीं करना होता है. सेलटैक्स में भी अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग स्तर की छूट इन्हें उपलब्ध है. ये बड़ी मात्रा में लेन-देन नकद में करते हैं और टैक्स अदा नहीं करते हैं. टैक्स की इस बचत के कारण बड़े उद्योगों के सामने ये टिक पाते हैं. छोटे उद्योगों के जीवित रहने में नकद कारोबार की अहम भूमिका है.
सरकार का उद्देश्य है कि देश में सभी लेन-देन बैंक के माध्यम से हों, जिससे टैक्स की चोरी बंद हो. सरकार का यह उद्देश्य स्वागत योग्य है, परंतु इसका परिणाम होगा कि छोटे उद्योगों को केवल टैक्स की दर में छूट का लाभ मिलेगा. नकद कारोबार के कारण हो रही टैक्स की बचत से ये वंचित हो जायेंगे.
पूर्व में जो कारोबार नगद में किया जा रहा था, वह आगे टैक्स के दायरे में आ जायेंगे. वे बड़े उद्योगों के सामने खड़े नहीं हो पायेंगे. इस प्रकार नोटबंदी ने छोटे उद्योगों के अस्तित्व को कठिन बना दिया है. छोटे उद्योगों को जीवित रखने लिए सरकार को जीएसटी में इन्हें भारी छूट देनी होगी.
छोटे उद्योगों के मंत्री कलराज मिश्र ने सरकार द्वारा उठाये गये चार कदम गिनाये हैं. पहला, सार्वजनिक इकाइयों के लिए अनिवार्य बनाया गया है कि खरीद के एक हिस्से को छोटी इकाइयों से ही खरीदें. यह कदम सही दिशा में है, परंतु सार्वजनिक इकाइयों द्वारा इस नियम का पालन कम ही किया जाता है. दूसरा कदम छोटे उद्योगों के क्लस्टर बनाने का है. एक ही प्रकार के छोटे उद्योगों के लिए किसी स्थान पर सामूहिक व्यवस्थाएं सरकार द्वारा बनायी जा रही हैं. यह कदम भी सही दिशा में है. परंतु, टैक्स के बोझ की तुलना में क्लस्टर सुविधाओं का लाभ न्यून है. तीसरा कदम सरकार का रोजगार सृजन कार्यक्रम है. इसके अंतर्गत उद्योगों द्वारा नये श्रमिकों को देय प्राविडेंट फंड में कुछ सब्सिडी दी जाती है. यह कदम भी सही दिशा में है, परंतु इस कदम की सार्थकता तभी है, जब नये रोजगार बनाये जायें.
वर्तमान में इनके लिए पुराने स्तर पर जीवित रहना ही कठिन हो रहा है. चौथा कदम स्किल डेवलपमेंट का है. देश में जहां आइटीआइ से उर्त्तीण युवक भी नौकरी को तरस रहे हैं, वहां 4-6 सप्ताह के स्किल डेवलपमेंट के कोर्स की क्या सार्थकता है? सरकार द्वारा उठाये गये कदम सही, परंतु अपर्याप्त हैं.
छोटे उद्योगों की मुख्य समस्या टैक्स दरों की है इसे सुलझाने के बाद ही अन्य कदमों की सार्थकता है.सरकार को समझना चाहिए कि छोटे उद्योग देश की अर्थव्यवस्था में सार्थक भूमिका निभाते हैं. इन्हें जीवित रखने के लिए टैक्स की दरों में छूट को बढ़ाना अनिवार्य होगा. वित्त मंत्री अरुण जेटली से यह अपेक्षा है कि वे छोटे उद्योगों को टैक्स में रियायत देंगे.
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