स्मरण: कवि मुक्तिबोध व त्रिलोचन

Updated at : 19 Dec 2016 7:00 AM (IST)
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स्मरण: कवि मुक्तिबोध व त्रिलोचन

रविभूषण वरिष्ठ साहित्यकार यह महज संयोग है कि मुक्तिबोध (13 दिसंबर, 1917-11 सितंबर, 1964) एवं त्रिलोचन शास्त्री (20 अगस्त, 1917- 9 दिसंबर, 2007) का जन्म रूस के क्रांति वर्ष (1917) में हुआ. 1917 की बोल्शेविक क्रांति ने पूंजीवादी व्यवस्था के विकल्प के रूप में समाजवादी व्यवस्था कायम की. रूसी क्रांति का नारा था- ‘शांति, जमीन […]

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रविभूषण
वरिष्ठ साहित्यकार
यह महज संयोग है कि मुक्तिबोध (13 दिसंबर, 1917-11 सितंबर, 1964) एवं त्रिलोचन शास्त्री (20 अगस्त, 1917- 9 दिसंबर, 2007) का जन्म रूस के क्रांति वर्ष (1917) में हुआ. 1917 की बोल्शेविक क्रांति ने पूंजीवादी व्यवस्था के विकल्प के रूप में समाजवादी व्यवस्था कायम की. रूसी क्रांति का नारा था- ‘शांति, जमीन और रोटी’. हिंदी के प्रगतिशील कवियों, जिन्हें पांच महाभूत भी कहा जाता है, में मुक्तिबोध और त्रिलोचन हैं. पांच वर्ष पहले 2011 में नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और शमशेर के जन्मशती वर्ष में जितने भी आयोजन, सेमिनार हुए, पत्र-पत्रिकाओं के विशेष अंक छपे, उनमें से किसी ने भी इन तीन कवियों को एक साथ रख कर कोई गंभीर विचार-विमर्श नहीं किया. पहली बार हिंदी के दो बड़े प्रगतिशील कवियों (मुक्तिबोध और त्रिलोचन) के जन्म शताब्दी वर्ष में जन संस्कृति मंच ने ‘स्मरण- कवि मुक्तिबोध एवं त्रिलोचन’ शीर्षक से एक शृंखला आरंभ की है, जो पूरे वर्ष चलेगी. बनारस और इलाहाबाद में आयोजन हो चुके हैं.
मुक्तिबोध एवं त्रिलोचन पूंजी और पूंजीवाद के विरुद्ध हैं. ऊपर से इन दो कवियों में अधिक समानताएं भले न दिखें, लेकिन इन दोनों की चिंताएं समान हैं. भारत में अभी जाे शरारती और उन्मादी पूंजी नृत्य कर रही है, वह 40 के दशक में कहीं भी नहीं थी. मुक्तिबोध ने पूंजीवादी समाज के प्रति कविता (1942) में जिस निर्बंध भोग की बात कही है, वह आज की तरह दुनिया के किसी भी हिस्से में नहीं था. भारत के किसी भी समाजशास्त्री, समाजवैज्ञानिक और अर्थशास्त्री ने 1942 में उपभोक्ता, उपभोक्तावाद और उपभोक्ता समाज पर विचार नहीं किया था. 40 के दशक के आरंभ में पूरी दुनिया के किन विचारकों-चिंतकों ने निर्बंध पूंजी पर विचार किया है, यह गंभीर शोध का विषय है. मुक्तिबोध ने लिखा- ‘तू है मरण/ तू है रिक्त/ तू है व्यर्थ/ तू है ध्वंस/ तेरा एक खेल अर्थ’. मुक्तिबोध उस समय पूंजीवाद के रक्तों में, सत्य का अवरोध देख रहे थे- ‘तेरे रक्त से भी घृणा आती तीव्र’. चालीस के दशक में ही त्रिलोचन यह लिख रहे थे कि पूंजीवाद ने जीवन, जन, समाज, कला सबका महत्व नष्ट कर दिया है. मुक्तिबोध और त्रिलोचन दोनों जनमुक्ति के कवि हैं.
इसी कारण जन-संघर्ष के कवि भी. मुक्तिबोध ने प्रेमचंद को कविता में याद किया. प्रेमचंद कथाकार थे. महत्व साहित्य रूप का न होकर उस गहरे कंसर्न (सरोकार) का है, जो सबको एक साथ जोड़ता है. प्रेमचंद, मुक्तिबोध, त्रिलोचन सहयात्री हैं.
मुक्तिबोध और त्रिलोचन दोनों धरती के कवि हैं. धरती से केवल श्रमजीवी जुड़े हैं- किसान, खेतिहर मजदूर और सामान्य जन. आज पूरी पृथ्वी खतरे में है. ‘रंगों के उद्भासों से जो नभ का कोना-कोना/ है बोल रहा धरती से/ जी खोल रहा धरती से/ जो चाह रहा कहना’.
यह है मुक्तिबोध के यहां धरती. नभ और धरती, स्वप्न और यथार्थ, त्रिलोचन के पहले कविता-संग्रह ‘धरती’ (1945) की. जुलाई 1946 के हंस में मुक्तिबोध ने समीक्षा लिखी. त्रिलोचन की कविता में हिंदी की जातीय काल-परंपरा बोलती है. वे अवध जनपद के कवि हैं. मुक्तिबोध जनपद के कवि नहीं है. दोनों जन के कवि हैैं. 40 के दशक से इन दोनों कवियों ने जो मार्ग चुना, उस पर वे सदैव चलते रहे. परिवर्तन और बदलाव की आकांक्षा दोनों कवियों में है. त्रिलोचन का मन कविता में अधिक रमा. मुक्तिबोध ने आलोचना, कहानी, निबंध आदि लिखे. पत्रकारिता से इन दोनों कवियों का विशेष जुड़ाव रहा है. मुक्तिबोध जटिल समय के जटिल कवि हैं. दोनों कवि आग और ताप के कवि हैं. मुक्तिबोध के जीवन काल में एक भी काव्य संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ. हिंदी संसार नागार्जुन के बेटे शोभाकांत और मुक्तिबोध के बेटे रमेश मुक्तिबोध का सदैव ऋणी रहेगा, जिन्होंने अपने पिता की रचनाओं को चुन-चुन कर सामने लाने और प्रकाशित करने का बड़ा कार्य संपन्न किया.
त्रिलोचन ने हिंदी कविता को उनकी कविता कहा है जिनकी सांसों को आराम नहीं था. मुक्तिबोध और त्रिलोचन की कविताओं में क्रांति के स्वर हैं. दोनों आंदोलन के कवि भी हैं. साहित्यिक आंदोलन का इन दोनों कवियों के यहां महत्व नहीं है. महत्व है जनांदोलन का. मुक्तिबोध के यहां जैसा आत्मसंशय, आत्मसंघर्ष और आत्ममंथन है, वैसा त्रिलोचन के यहां नहीं. दोनों ने अपनी कविताओं से केवल भारतीय कविता को ही समृद्ध नहीं किया है, एक दिशा-दृष्टि भी दी है. अंधेरा दोनों के यहां है. मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ कविता महकाव्यात्मक है और त्रिलोचन के यहां भी अंधेरा है- ‘अगर कोठरी अंधेरी है, तो उसे कोठरी समझने, कहने का है मुझको अधिकार’. दोनों कवियों ने कविता का व्याकरण और उसकी संरचना बदली. दोनों समाज का व्याकरण और उसकी संरचना भी बदलना चाहते थे.
त्रिलोचन और मुक्तिबोध पर कार्य कर डॉक्टर बननेवाले भारत में अनेक हैं. इनमें से अधिकतर उनके जन्मशती वर्ष में नींद में हैं. जीवन की रक्षा करने काे जो सक्रिय है, वे इन कवियों के जन्मशती वर्ष को गंभीरता से लेंगे. कविता का जीवन से अटूट रिश्ता है और आज जीवन संकटग्रस्त है.
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