अपराधियाें के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का वक्त

Updated at : 18 Dec 2016 1:04 AM (IST)
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अपराधियाें के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का वक्त

अनुज कुमार सिन्हा रांची में अपराधियाें का मनाेबल कितना बढ़ा हुआ है, इसका उदाहरण है राजधानी में इंजीनियरिंग की छात्रा के घर में घुस कर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म, फिर उसे जला देना. पूरा राज्य मर्माहत है, लड़कियां आैर उनके माता-पिता चिंतित-भयभीत. पता नहीं किसके साथ इस राज्य में क्या हाे जाये. जाहिर है कानून-व्यवस्था […]

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अनुज कुमार सिन्हा

रांची में अपराधियाें का मनाेबल कितना बढ़ा हुआ है, इसका उदाहरण है राजधानी में इंजीनियरिंग की छात्रा के घर में घुस कर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म, फिर उसे जला देना. पूरा राज्य मर्माहत है, लड़कियां आैर उनके माता-पिता चिंतित-भयभीत. पता नहीं किसके साथ इस राज्य में क्या हाे जाये. जाहिर है कानून-व्यवस्था लचर है. इसे संभालने की जिम्मेवारी पुलिस पर है. ऐसी घटना घटने से यही लगता है कि पुलिस अपना काम या ताे नहीं कर पा रही है या अपराधियाें काे पुलिस आैर कानून का भय नहीं है. अपराधी अपराध करते हैं, हत्या करते हैं, दुष्कर्म करते हैं,अमूमन पकड़े नहीं जाते. अगर कुछ मामलाें में पकड़े भी गये, ताे अदालत से बरी हाे जाते हैं. पुलिस उन्हें सजा नहीं दिला पाती. जब अपराधी जान जायें कि उनका कुछ नहीं बिगड़नेवाला, चार-छह माह जेल की सजा काट लेंगे , फिर मस्ती से बाहर आ जायेंगे, ताे अपराध बढ़ेगा ही. पुलिस का सूचना तंत्र टूट चुका है. अपवाद काे छाेड़ दें, ताे थाना प्रभारियाें काे यह पता नहीं हाेता कि उनके थाना क्षेत्र में क्या हाे रहा है. मुख्य सड़काें पर ही पुलिस दिखती है. पुलिस के पास ताे अब कीमती आैर आरामदायक गाड़ियां भी हैं. इनसे बाहर भी निकलना हाेगा. अपराधियाें में भय हाेगा पुलिस की कार्रवाई देख कर, उन्हें चाैकस देख कर. जाे पुलिस अधिकारी निकम्मे हैं, अगर वे शहर में कानून-व्यवस्था नहीं संभाल पाते, ताे उनकी पाेस्टिंग नक्सल बहुल इलाके में हाेनी चाहिए.

अच्छे अफसराें काे काम करने का माैका मिलना चाहिए. पुलिस का मुख्य काम है कानून-व्यवस्था काे ठीक रखना. ऐसा माहाैल बनाना कि अपराधी कांपे, आम जनता खुश रहे. उसे लगे कि पुलिस उसके सहयाेग के लिए है. सिर्फ गरीबाें पर लाठी चलाने से, पटक-पटक कर हेल्मेट ताेड़ने से पुलिस बहादुर नहीं बन जाती. इसी रांची शहर में 25 साल पहले अरविंद पांडेय जैसे एसपी थे, जिनके नाम से अपराधी कांपते थे. इसी झारखंड में अभय नारायण सिंह, रमाकांत जैसे दिलेर पुलिस इंस्पेक्टर हुए करते थे (ये सब अब बिहार चले गये). इसी झारखंड में अनेक अभय-रमाकांत हाेंगे ही, उन्हें सामने आना हाेगा. ठीक है कई ऐसी घटनाएं हैं, जिन्हें पुलिस राेक नहीं सकती, लेकिन घटना के बाद उसकी जांच इतनी सटीक हाेनी चाहिए, इतने सबूत हाेने चाहिए कि काेर्ट से अपराधी बच नहीं सके. ऐसा नहीं हाेता. 26.9 फीसदी काे ही सजा मिल पाती है. बाकी छूट जाते हैं. यह हकीकत है.

अगर अपराध बढ़ता है, ताे पुलिस पर समाज की गाज ताे गिरती है ही. पर समाज खुद भी दाेषी है. हमारा समाज कहां चला गया है, कितना नैतिक पतन हाे गया है. युवाआें का एक वर्ग बेहतर पढ़ाई कर अपना जीवन बनाने में लगा है आैर इन्हीं युवाआें का दूसरा वर्ग उद्दंड हाे चुका है. माता-पिता की नहीं सुनता. शिक्षकाें की परवाह नहीं करता. माता-पिता समय नहीं दे पाते, नजर नहीं रख पाते. कभी-कभी बेबस नजर आते हैं. इन उद्दंड लड़काें काे हाइवे पर अपनी बाइक पर लड़कियाें काे बैठा कर तेज ड्राइव करते देखा जा सकता है. ये हुड़दंग भी करते हैं. कई बार इनकी जान भी जाती है. इस पर अंकुश लगाना हाेगा. बच्चाें में चरित्र निर्माण पर जाेर देना हाेगा. यह काम ताे परिवार-विद्यालय ही कर सकता है. परिवार काे भी अपनी जिम्मेवारी समझनी हाेगी. ऐसा न हाे कि अभी अंकुश न लगायें, बाद में मामला हाथ से निकल जाये आैर सिर्फ पछताते रहें.

बूटी की घटना काे ही लीजिए. मामला कितना गंभीर है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास काे जमशेदपुर दाैरा छाेड़ कर आना पड़ा. सीनियर अफसर घटनास्थल पर गये, लेकिन इन सभी प्रयासाें का फायदा तभी मिलेगा, जब असली अपराधी पकड़े जायेंगे. पुलिस अपनी ताकत अपने काम में लगाये, वसूली में नहीं. बूटी में जिस लड़की के साथ हादसा हुआ, वह रांची आयी थी पढ़ने के लिए, एक सपना लेकर, अपना जीवन बनाने के लिए. इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही थी. साेचा था-बेहतर जीवन हाेगा. मिली क्या-माैत. उस लड़की का क्या दाेष था? रांची एजुकेशन हब बन गया है, यहां पूरे राज्य से पढ़ने के लिए लड़के-लड़कियां आ रहे हैं. एक से डेढ़ लाख बच्चे बाहर से आ कर रहते हैं. इनमें आधी संख्या लड़कियाें की हैं. वे छात्रावास में रहती हैं, किराये के मकान में रहती हैं, जाे रांची की भी हैं, सभी चिंतित है. पुलिस पर से भराेसा टूटा है. इसे लाैटाना हाेगा. बाेलने से नहीं, अपराधियाें काे पकड़ कर. शहर में शाम के बार शराबियाें के अड्डे लगते हैं. शराब की दुकानाें के आसपास का माहाैल देख लीजिए. पुलिस एक काे भी पकड़ नहीं पाती. समय आ गया है, जब शहर में पुलिस सड़काें पर दिखे. सिर्फ वीआइपी के मूवमेंट के समय नहीं, 24 घंटे दिखे आैर सिर्फ मुंह नहीं ताके, अपराधियाें काे पकड़े भी. इस बात का ख्याल रखे कि अाम जनता काे इसका खामियाजा नहीं भुगतना पड़े. यह प्रशासन के साथ-साथ सरकार के लिए भी बड़ी चुनाैती है. अगर कानून-व्यवस्था ही ठीक नहीं रहेगी, ताे विकास के प्रयास करते रहिए, कुछ नहीं हाेनेवाला.

अब एक से एक तकनीक आ गयी है. बार-बार कहा जाता है कि पूरे शहर में सीसीटीवी कैमरा लग रहे हैं या लग गये हैं. अगर ये सभी ठीक से लगे हैं, ताे अपराधियाें काे पकड़ने में मदद मिलनी चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं हाे रहा. हां, पूरे मामले में समाज काे भी लपेटना हाेगा. जिन क्षेत्राें में ये लड़कियां रहती हैं, वहां अगर ऐसी घटनाएं घटती हैं, ताे कुछ न कुछ लाेगाें काे पता हाेता है. उन्हें सामने आना हाेगा. अगर पुलिस की परेशानी से डरते हैं, ताे किसी न किसी माध्यम से अपराधी के बारे में जिम्मेवार पुलिस अफसराें तक बात पहुंचानी हाेगी. साेचिए, यह घटना किसी के साथ या किसी के परिवार के साथ घट सकती है. इसलिए चुप्पी ताेड़नी चाहिए. बूटी हादसे में पुलिस काे अपराधियाें ने चुनाैती दी है. एसआइटी का गठन हाे चुका है. उम्मीद की जानी चाहिए कि अपराधी पकड़े जायेंगे. न सिर्फ पकड़े जायेंगे, बल्कि उन्हें सजा भी मिलेगी. अगर यह सब कुछ हाेता है, तभी उस लड़की के साथ न्याय हाे पायेगा.

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