डोनाल्ड ट्रंप से चिंताएं

Updated at : 16 Dec 2016 6:20 AM (IST)
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डोनाल्ड ट्रंप से चिंताएं

अमेरिका के राष्ट्रपति पद के निर्वाचित डोनाल्ड ट्रंप इन दिनों मतदाताओं को धन्यवाद देने के लिए विभिन्न राज्यों के दौरे पर हैं. जीत के बाद कुछ मुद्दों पर उनके रवैये में नरमी से उम्मीद बनी थी कि विदेशी कामगारों और विदेशी व्यापार पर कठोर रुख अपनाने के उनके चुनावी वादे उसी कठोरता से नीतियों में […]

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अमेरिका के राष्ट्रपति पद के निर्वाचित डोनाल्ड ट्रंप इन दिनों मतदाताओं को धन्यवाद देने के लिए विभिन्न राज्यों के दौरे पर हैं. जीत के बाद कुछ मुद्दों पर उनके रवैये में नरमी से उम्मीद बनी थी कि विदेशी कामगारों और विदेशी व्यापार पर कठोर रुख अपनाने के उनके चुनावी वादे उसी कठोरता से नीतियों में परिलक्षित नहीं होंगे. पर, एक बार फिर उन्होंने स्पष्ट किया है कि उनका प्रशासन दो नियमों से संचालित होगा- अमेरिकी वस्तुएं खरीदो और अमेरिकी लोगों को नौकरी दो. निश्चित रूप से यह तेवर भारत के लिए चिंताजनक है. वर्ष 2015 में अमेरिका ने रोजगार के लिए जरूरी एच1बी वीजा के सालाने कोटे का 86 फीसदी हिस्सा भारतीयों को जारी किया था. ट्रंप और उनके करीबी सलाहकार वीजा नियमों में कड़ाई की बात बार-बार कह चुके हैं. पहले जारी वीजा की जांच करने का बयान भी आ चुका है. अगर ऐसा होता है, तो वहां कार्यरत भारतीयों की मुश्किलें बढ़ चुकी है.
अमेरिका के अंदर दूसरे देशों के लोगों को काम देने तथा अमेरिकी कंपनियों के अन्य देशों में उत्पादन करने का हवाला देते हुए ट्रंप ने चुनाव प्रचार में कहा था कि चीन और भारत अमेरिकी रोजगार अवसरों को नुकसान पहुंचा रहे हैं. अमेरिका उन कुछ देशों में है, जिसके साथ व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में है. इस वर्ष अक्तूबर तक भारत ने 17,524.7 मिलियन डॉलर मूल्य का आयात किया है, जबकि निर्यात की गयी वस्तुओं का मूल्य 39,014.8 मिलियन डॉलर रहा है. यदि ट्रंप प्रशासन अमेरिकी वस्तुओं के उत्पादन और उपभोग पर जोर देता है, तो भारतीय निर्यात बड़े पैमाने पर प्रभावित होगा. दोनों देशों में संबंधों की घनिष्ठता के आधार पर अगस्त में इंडो-अमेरिकन चैंबर ऑफ कॉमर्स ने उम्मीद जतायी थी कि 100 बिलियन डॉलर से अधिक का मौजूदा सालाना कारोबार जल्दी ही 500 बिलियन डॉलर हो सकता है. लेकिन, ट्रंप के पैंतरों से अब यह आशा धुंधली पड़ रही है.
पिछले दिनों निवेशकों के पलायन से रुपये की कीमत और शेयर बाजार पर भी बुरा असर पड़ा है. उधर ब्रिटेन ने भी भारतीय छात्रों और कामगारों के वीजा नियमों को कठोर बना दिया है. ऐसे में भारत सरकार और उसकी कूटनीतिक क्षमता के सामने बड़ी चुनौती पैदा हो गयी है. अमेरिकी नीतियों से डॉलर की कमाई तो प्रभावित होगी ही, साथ ही मेक इन इंडिया और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में निवेश में भी कमी आयेगी. उम्मीद है कि सरकार विदेश नीति के मोर्चे पर गंभीरता से आसन्न समस्याओं के समाधान के प्रयासरत होगी.
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