डिजिटल भुगतान की समस्याएं

Updated at : 14 Dec 2016 8:22 AM (IST)
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डिजिटल भुगतान की समस्याएं

िबभाष कृषि एवं आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ बड़े नोटों के विमुद्रीकरण के पश्चात और नये नोटों की आपूर्ति में आ रही समस्याओं के कारण डिजिटल भुगतान में एकाएक बढ़ोतरी हुई है. डिजिटल भुगतान को कानूनी जामा पहनाने तथा इसे सुगम और सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से संसद द्वारा पेमेंट एंड सेटलमेंट एक्ट-2007 पारित किया गया […]

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िबभाष
कृषि एवं आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ
बड़े नोटों के विमुद्रीकरण के पश्चात और नये नोटों की आपूर्ति में आ रही समस्याओं के कारण डिजिटल भुगतान में एकाएक बढ़ोतरी हुई है. डिजिटल भुगतान को कानूनी जामा पहनाने तथा इसे सुगम और सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से संसद द्वारा पेमेंट एंड सेटलमेंट एक्ट-2007 पारित किया गया है. इस अधिनियम में प्रदत्त अधिकारों के तहत भारतीय रिजर्व बैंक समय-समय पर बैंकों और अन्य रेगुलेटेड एंटिटीज के लिए दिशानिर्देश जारी करता है. हाल की घटनाओं के कारण रिजर्व बैंक ने कई फौरी निर्देश बैंकों और अन्य रेगुलेटेड संस्थाओं के लिए जारी किया है.
रिजर्व बैंक द्वारा जारी हाल के दिशा-निर्देश मुख्यत: इ-वॅलेट द्वारा रिटेल डिजिटल भुगतान के सिलसिले में हैं. इनमें शामिल हैं प्री-पेड इंस्ट्रूमेंट के जारी करने तथा परिचालन, प्री-पेड इंस्ट्रूमेंट जारी करनेवाली संस्थाओं का तकनीकी ऑडिट, मोबाइल बैंकिंग लेनदेन, दो हजार रुपये तक के छोटे लेनदेन के मामलों में एडिशनल फैक्टर ऑथेंटिकेशन में रियायत आदि संबंधी दिशा-निर्देश. ये सारे दिशा-निर्देश आरबीआइ की वेबसाइट पर सर्वसाधारण के लिए उपलब्ध हैं. इन दिशा-निर्देशों के अलावा केवाइसी, एंटीमनी लॉन्डरिंग, आतंकियों के वित्तपोषण पर रोक, फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट के संदेहास्पद लेनदेन के रिपोर्टिंग संबंधी दिशा-निर्देशों का अनुपालन भी करना आवश्यक है. रिटेल और थोक भुगतान के लिए आरटीजीएस, एनइएफटी तथा इंटरनेट बैंकिंग संबंधी दिशा-निर्देश पहले से ही हैं.
हाल के वर्षों में भुगतान के लिए इ-वॅलेट का इस्तेमाल एक महत्वपूर्ण उपाय के रूप में उभरा है. इ-वॅलेट के लिए अलग से दिशा-निर्देश नहीं हैं. विभिन्न कंपनियों द्वारा जारी इ-वॅलेट प्रीपेड इंस्ट्रूमेंट संबंधी दिशा-निर्देशों द्वारा परिचालित होते हैं. बैंकों द्वारा जारी किये गये इ-वॅलेट खातों में जमा राशि को बैंक की देनदारी मानते हुए बैंकों से इस राशि पर आवश्यक सांविधिक रिजर्व प्राप्त किया जाता है. लेकिन, बैंकों के इतर संस्थाओं या व्यक्तियों के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं है. बैंकों द्वारा परिचालित इ-वॅलेट के लिए एक संस्थागत शिकायत व्यवस्था है, किंतु अन्य संस्थाओं के लिए ऐसी कोई संस्थागत शिकायत व्यवस्था नहीं है.
यह उन संस्थानों के ऊपर ही छोड़ दिया गया है, जबकि बैंकों के मामलों में शिकायतकर्ता बैंकिंग ओम्बुड्समैन तक भी जा सकता है. आरबीआइ के दिशा-निर्देशों के अनुसार, वैलेट में जमा राशि का भुगतान संबंधित प्राप्तकर्ता या मर्चेंट को अधिकतम लेनदेन के दिन से तीन दिनों में कर देना चाहिए. लेकिन, इस पर सांस्थानिक नियंत्रण की कोई व्यवस्था नहीं है. हो सकता है कि कुछ इ-वॅलेट कंपनियां जान-बूझ कर भुगतान में देरी करें और जमा राशि पर ब्याज कमायें, क्योंकि रिजर्व बैंक के निर्देशों के अनुसार ये कंपनियां न्यूनतम जमा कोर राशि पर ब्याज कमा सकती हैं. इ-वॅलेट में आगत राशि को रोक कर कोर जमा राशि को बढ़ाया जा सकता है. इ-वॅलेट के परिचालन व उन पर नजर रखने की जिम्मेवारी उन बैंकों पर डाली गयी है, जहां संबंधित एस्क्रो खाते खोले गये हैं, जो उचित नहीं लगता. ये दिशा-निर्देश स्वचालित परिचालन को ध्यान में रख कर भी तैयार नहीं किये गये लगते हैं. दरअसल, इ-वॅलेट के लिए प्री-पेड इंस्ट्रूमेंट से अलग दिशा-निर्देश होने चाहिए.
डिजिटल भुगतान में पूरी दुनिया में हो रही बढ़ोतरी के कारण जोखिम प्रबंध पर विशेष ध्यान रखा जा रहा है.लगातार नये रेगुलेशन अस्तित्व में आ रहे हैं, जिनके लिए तकनीकी उपायों का विकास किया जा रहा है. वित्त-तकनीकी वाली कंपनियां हर नये रेगुलेशन के लिए अपने उपाय पेश कर रही हैं. लेकिन, समय की मांग के अनुसार एक समग्र तकनीकी उपाय की तत्काल आवश्यकता है, जिससे सभी रेगुलेशन के अनुपालन के लिए एक समेकित सॉल्यूशन हो.
डिजिटल भुगतान के एक अन्य, लेकिन महत्वपूर्ण पक्ष पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया है और वह है कॉरपोरेट द्वारा किये जा रहे भुगतानों को लेकर. केपजेमिनी द्वारा जारी वर्ल्ड पेमेंट रिपोर्ट-2016 के अनुसार, रिटेल बैंकिंग ग्राहक मोबाइल द्वारा भुगतान में कॉरपोरेट से बहुत आगे हैं. कॉरपोरेट मोबाइल का इस्तेमाल सिर्फ भुगतान की मंजूरी देने, भुगतान संबंधी एलर्ट प्राप्त करने तथा भुगतान एवं कॉरपोरेट परफॉरमेंस पर नजर रखने के लिए करते हैं.
काॅरपोरेट द्वारा मोबाइल से भुगतान में जो अड़चनें बतायी गयी हैं, वे हैं मोबाइल सॉल्यूशन का कंपनी के कोर सॉफ्टवेयर-इआरपी, ट्रेड फाइनेंस और एकाउंटिंग तंत्र से समन्वित न होना, सुरक्षा संबंधी समस्याएं, कार्यपालकों द्वारा मोबाइल सॉल्यूशन का उपयोग न कर पाना, मोबाइल स्क्रीन का छोटा होना आदि. लेकिन ये समस्याएं तकनीकी हैं, जिन्हें वित्त-टेक्नोलॉजी कंपनियां संबंधित काॅरपोरेट के साथ मिल कर दूर कर सकती हैं, जिससे कॉरपोरेट द्वारा मोबाइल के माध्यम से भुगतान सुगम हो सके. रिटेल भुगतान और तेजी से बढ़ेगा, जब कॉरपोरेट भी अपने भुगतान मोबाइल से करने लगें.
डिजिटल भुगतान टेक्नोलॉजी आधारित भुगतान व्यवस्था है, जिसमें लगातार नये उपायों की खोज होते रहना चाहिए. दुनिया के कई देशों ने नयी कंपनियों को भुगतान व्यवस्था में नये उपाय तलाशने के लिए सुरक्षित संस्थागत व्यवस्था की है, जिससे ग्राहक और स्वयं रिसर्च करनेवाली कंपनी को नुकसान न हो.
भारत में इस तरह की कोई व्यवस्था नहीं है और अगर कोई स्टार्टअप किसी आइडिया का प्रयोगत्मक परीक्षण करना चाहे, तो भी उसे प्री-पेड इंस्ट्रूमेंट जारी करने का लाइसेंस प्राप्त करना ही पड़ेगा, जो कि बहुत कठिन है.
नयी टेक्नोलॉजी को अपनाने में देश की आम जनता कभी पीछे नहीं रही है. उदाहरण के तौर पर साठ के दशक में अधिक उपज देनेवाली फसलों की खेती है, जिसके कारण देश खाद्यान्न उत्पादन में मजबूत हुआ. इसे कम शिक्षित कहे जानेवाले किसानों ने अपनाया. आज के जमाने में भी मोबाइल क्रांति का सर्वाधिक श्रेय देश की अशिक्षित और कम शिक्षित कही जानेवाली जनता को दिया जाना चाहिए, जो अंगरेजी वर्णमाला के की-बोर्ड का इस्तेमाल भी कर सकती है. समस्या सिर्फ जनता को प्रभावी और सुरक्षित उपाय उपलब्ध कराने में है.
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