छोटा-सा घर है मगर...

Updated at : 09 Nov 2016 6:19 AM (IST)
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छोटा-सा घर है मगर...

मुकुल श्रीवास्तव स्वतंत्र टिप्पणीकार कभी-कभी जिंदगी के बड़े सवालों का जवाब बहुत छोटी सी चीज में मिल जाता है. वह चीज हमारे आस-पास होती है, पर हमारा ध्यान उस पर जाता ही नहीं. लिखने बैठा तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या लिखूं, तभी कुछ पंक्तियां कानों में पड़ीं- ‘हर घर चुपचाप […]

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मुकुल श्रीवास्तव

स्वतंत्र टिप्पणीकार

कभी-कभी जिंदगी के बड़े सवालों का जवाब बहुत छोटी सी चीज में मिल जाता है. वह चीज हमारे आस-पास होती है, पर हमारा ध्यान उस पर जाता ही नहीं. लिखने बैठा तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या लिखूं, तभी कुछ पंक्तियां कानों में पड़ीं- ‘हर घर चुपचाप ये कहता है, इस घर में कौन रहता है, छत बताती है ये किसका आसमान है, रंग कहते हैं किसका ये जहान है, कौन चुन-चुन कर प्यार से इसे सजाता है, कौन इस मकान में अपना घर बसाता है…’ हां यह घर ही तो है, जिससे सब कुछ है.

जरा सोचिए कि घर के बगैर हमारा जीवन कैसा होता. घर से परिवार और परिवार से रिश्ते-नातों का सफर सब कैसे आपस में जुड़े हैं. इंसान की सामाजिकता का आधार घर है. विकास के क्रम में हमारी सारी तरक्की का केंद्र घर ही है. दिनभर की भाग-दौड़ के बाद हम सब अपने घर जाने को उतावले होते हैं. घर ही वह एक ऐसी जगह होती है, जहां हम पहुंच कर बहुत ही सुकून पाते हैं.

सुकून और घर के इस सफर में अगर हम संगीत को अपना हमसफर बना लें और यह गाना सुनें, तो सुकून दोगुना हो जायेगा- ‘लोग जहां पर रहते हैं, उस जगह को वो घर कहते हैं.

हम जिस घर में रहते हैं, उसे प्यार का मंदिर कहते हैं.’ सही ही तो है, घर अगर मंदिर है, तो वहां शांति होगी, बड़े-बुजुर्गों का साथ होगा. अगर कभी आपको अपने घर से दूर जाना पड़े, तो आप ही नहीं, आपका घर भी आपको याद करता है, क्योंकि घर तो रिश्तों से बनता है, ईंट-पत्थरों से तो मकान बनता है. बॉर्डर फिल्म का गीत है- ‘घर कब आओगे, तुम बिन ये घर सूना सूना है’. लेकिन, आगे बढ़ने के लिए घर छोड़ना ही पड़ता है और हम इस दुनिया में अपना आशियाना बनाने और अपने सपनों को सच करने निकल पड़ते हैं. माता-पिता के प्यार से दूर, अपने अपनों का साथ छोड़ कर एक घर से दूसरे घर तक का यह सफर आसान नहीं होता. लेकिन, हम इंसान बहुत जल्दी कुछ नये रिश्ते बना लेते हैं और तब दिल अचानक गा उठता है- ‘ये तेरा घर ये मेरा घर, किसी को देखना हो गर, तो पहले आके मांग ले, तेरी नजर मेरी नजर…’

घर यूं ही नहीं बन जाता, इसमें इंसानी रिश्तों के सारे रंग होते हैं. कहीं प्यार तो कहीं तकरार से रिश्तों की खूबसूरती का एहसास घर ही कराता है. रक्षाबंधन में बहन अपने भाई के घर आने का इंतजार करती है. वहीं त्योहारों में मां-बाप को अपने बेटे-बेटियों के घर आने का इंतजार रहता है. पत्नी रोज शाम को अपने पति के घर लौटने का इंतजार करती है.

दुनिया बदल रही है. अगर पति-पत्नी दोनों वर्किंग हैं, तो छोटे बेटे-बेटियों को अपने माता-पिता के घर लौटने का इंतजार रहता है. दरअसल रिश्ते तो बहाने हैं, इंतजार तो घर करता है, जिनके होने से कोई मकान घर बन जाता है. असल में घर ही रिश्तों की खूबसूरती को महसूस कराता है, जहां कोई अनजाना आकर रिश्तों की डोर में बंध जाता. घर, घर होता है, वह छोटा हो या बड़ा. इससे फर्क नहीं पड़ता, अगर उसमें रहनेवाले लोग आपस में रिश्तों की मीठी डोर से बंधे हैं. डर का गीत है- ‘छोटा-सा घर है ये मगर, तुम इसको पसंद कर लो’.

घर के बहाने ही सही, घर के उन रिश्तों पर भी ध्यान दीजिए, जो बिना शर्त आपको प्यार दिये जा रहे हैं. अपने अपनों का ख्याल कीजिए, वह कोई भी हो सकता है, आपके माता-पिता, आपका बेटा या बेटी, या फिर पति या पत्नी, जिन्हें जीवन की भाग-दौड़ में आप शायद उतना वक्त नहीं दे पा रहे हैं. आज आप उन लोगों को शुक्रिया कहिए, जिनके कारण आपका घर एक घर बना है.

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