दलित प्रतिरोध के मायने
Updated at : 02 Aug 2016 5:39 AM (IST)
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गौरक्षा के नाम पर चल रहे स्वयंभू गिरोहों द्वारा दलितों को प्रताड़ित करने की तसवीरें किसी भी सभ्य समाज को विचलित करने के लिए पर्याप्त हैं. इससे उपजे क्षोभ और रोष की स्वाभाविक अभिव्यक्ति गुजरात में पिछले कई दिनों से चल रहे दलित आंदोलन में हो रही है. मुंबई में बाबासाहेब आंबेडकर से जुड़े एक […]
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गौरक्षा के नाम पर चल रहे स्वयंभू गिरोहों द्वारा दलितों को प्रताड़ित करने की तसवीरें किसी भी सभ्य समाज को विचलित करने के लिए पर्याप्त हैं. इससे उपजे क्षोभ और रोष की स्वाभाविक अभिव्यक्ति गुजरात में पिछले कई दिनों से चल रहे दलित आंदोलन में हो रही है. मुंबई में बाबासाहेब आंबेडकर से जुड़े एक ऐतिहासिक भवन को गिराने के बाद भी आक्रोश फूट पड़ा था.
देश के अन्य हिस्सों से भी दलित समुदाय पर अत्याचार की खबरें आती रहती हैं. इन अत्याचारों के कई बहाने हैं, जिनकी ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि है, लेकिन बीते महीनों में इनके विरुद्ध जो व्यापक प्रतिरोध उठ खड़ा हुआ है, वह कई अर्थों में अभूतपूर्व है. इन प्रतिरोधों का एक मुख्य कारण संवैधानिक तथा कानूनी उत्तरदायित्व निभाने में हमारे राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व की असफलता और लापरवाही है.
सामाजिक स्तर पर भी दलितों को प्रताड़ित करनेवाले तत्वों को रोकने की ठोस कोशिशें नहीं हुई हैं. यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि कई राज्यों में शासन न केवल पीड़ितों को संरक्षण देने में विफल रहा है, बल्कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपराधियों का साथ देता भी दिखायी देता है. ऐसे में दलित समुदाय के आक्रोश का फूट पड़ना कोई आश्चर्यजनक प्रतिक्रिया नहीं है. आज यह समुदाय अपने अधिकारों के प्रति अधिक सचेत है, उसका सशक्तीकरण हुआ है और वह मुख्यधारा में अपना स्थान पाने के लिए निरंतर प्रयत्नशील है.
ऐसा ही सकारात्मक परिवर्तन कमोबेश अन्य वंचित वर्गों में भी हुआ है. समाजशास्त्रियों की मानें, तो समाज और सत्ता का एक हिस्सा इन परिवर्तनों के प्रति या तो सजग नहीं है, या फिर अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिए प्रताड़ना के कुंद पड़ चुके हथियारों का प्रयोग कर रहा है. अगर प्रभुत्वशाली तबकों के रवैये नहीं बदले, तो वंचितों का यह आक्रोश ऐसा स्वरूप भी ले सकता है, जो सामाजिक और राजनीतिक शांति के लिए बड़ा नुकसानदेह साबित हो सकता है.
अहमदाबाद और मुंबई के प्रदर्शनों में युवाओं की बड़ी भागीदारी और उनके गुस्से को गंभीरता से समझा जाना चाहिए तथा सरकार को उनकी शिकायतों पर ठोस पहल करनी चाहिए. न तो खोखले आश्वासनों और प्रतीकात्मक कार्रवाईयों से इस प्रतिरोध के स्वर को तुष्ट किया जा सकता है, और न ही राजनीतिक सत्ता और सामाजिक जोर की ताकत से इसे दबाया जा सकता है.
आबादी के एक बड़े हिस्से के प्रति शासन और समाज का नकारात्मक अमानवीय रुख दुनिया की दृष्टि में एक लोकतांत्रिक और सभ्य देश के रूप में भारत की छवि को भी खराब करता है. संविधान और शासन की व्यवस्थाओं के अनुरूप दलित एवं वंचित समुदायों के अधिकारों की सुरक्षा न केवल सरकारों का दायित्व है, बल्कि देश के सर्वांगीण विकास और सकारात्मक स्थिरता की आवश्यक शर्त भी है.
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