शांति की राहें
Updated at : 27 Jul 2016 7:15 AM (IST)
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कारणों की पहचान हो, तो समस्या का निदान भी संभव है. राजव्यवस्था में यह बात जैसे शेष समस्याओं पर लागू होती है, वैसे ही हिंसा की समस्या पर भी. भारत जैसे बड़े देश में हर जगह हिंसा की समस्या से एक तरह से नहीं निबटा जा सकता है, क्योंकि इसकी अलग-अलग वजहें हैं. मिसाल के […]
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कारणों की पहचान हो, तो समस्या का निदान भी संभव है. राजव्यवस्था में यह बात जैसे शेष समस्याओं पर लागू होती है, वैसे ही हिंसा की समस्या पर भी. भारत जैसे बड़े देश में हर जगह हिंसा की समस्या से एक तरह से नहीं निबटा जा सकता है, क्योंकि इसकी अलग-अलग वजहें हैं.
मिसाल के लिए, कश्मीर में हिंसा की वजह स्थानीय लोगों में पनपे असंतोष में कम और पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद में ज्यादा है. ऐसे में कश्मीर की अशांति से निबटने के लिए जैसी तैयारी चाहिए, वैसी तैयारी माओवादी अतिवाद से ग्रस्त इलाकों या पूर्वोत्तर के कुछ इलाकों में जारी सशस्त्र अलगाववाद की हिंसा से निबटने में कारगर नहीं हो सकती.
कश्मीर की हिंसा की समस्या से निबटने के लिए सुरक्षाबलों की चौकसी और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान को घेरना तात्कालिक तौर पर ज्यादा कारगर साबित हो सकता है, जबकि मध्य भारत अथवा पूर्वोत्तर में सुरक्षाबलों की चौकसी के साथ-साथ राह भटके लोगों की जायज शिकायतों को सुनना और देश की मुख्यधारा में उनकी वापसी के लिए स्थान बनाना कहीं ज्यादा प्रभावकारी समाधान साबित हो सकता है.
अच्छी और आश्वस्त करने वाली खबर यह है कि सरकार देश के अलग-अलग इलाकों में होनेवाली हिंसा की प्रवृत्ति को पहचान कर समाधान के कदम उठा रही है और उसके सकारात्मक परिणाम आने लगे हैं. कश्मीर में सुरक्षाबलों ने एक विदेशी आतंकी को पकड़ने में सफलता पायी है.
इससे कश्मीर में जारी पाकिस्तान षड्यंत्र का पर्दाफाश करने में मदद मिलेगी. सुरक्षाबलों को असम में सक्रिय यूनाइटेड पीपल्स लिबरेशन आर्मी के सरगना को भी पकड़ने में सफलता मिली है. यह हमारी सुरक्षा-तंत्र में बढ़ रहे बेहतर तालमेल, निगरानी और चौकसी का परिणाम है. इससे आश्वस्त हुआ जा सकता है कि समय रहते हिंसा की गतिविधियों पर हमारा सुरक्षा-तंत्र लगाम लगा सकता है.
ऐसी ही अच्छी खबर माओवादी हिंसा में हुई कमी की भी है. 2010 में माओवादी अतिवाद के कारण 1005 लोग मारे गये थे, जबकि 2015 में यह संख्या घट कर 167 पर पहुंची, जो इस बात की सूचना है कि अलग-अलग तरह के अन्याय के शिकार होकर गुस्से में आये लोगों की समाज की मुख्यधारा में पुनर्वापसी की सरकारी कोशिशें कामयाब हो रही हैं.
सरकार इसी कारण माओवादी अतिवाद वाले जिलों की संख्या 106 से घटा कर 86 करने पर विचार कर रही है. उम्मीद की जानी चाहिए कि हिंसा से निबटने के मामले में सरकार और सुरक्षा एजेंसियां सिर्फ बल प्रयोग पर निर्भर न रह कर बहुमुखी उपायों पर अमल करती रहेगी.
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