साक्षात शिव से संवाद की यात्रा

Updated at : 24 Jun 2016 5:58 AM (IST)
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साक्षात शिव से संवाद की यात्रा

तरुण विजय राज्यसभा सांसद, भाजपा अनादिकाल से शिवधाम अर्थात कैलास मानसरोवर की यात्रा होती आ रही है. यहां का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है, जिसमें मानसरोवर के लिए अनवतप्त नाम का उल्लेख किया गया है अर्थात जो कभी भी तप्त नहीं होता ऐसा सरोवर. अभी पिछले सप्ताह विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कैलास मानसरोवर […]

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तरुण विजय
राज्यसभा सांसद, भाजपा
अनादिकाल से शिवधाम अर्थात कैलास मानसरोवर की यात्रा होती आ रही है. यहां का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है, जिसमें मानसरोवर के लिए अनवतप्त नाम का उल्लेख किया गया है अर्थात जो कभी भी तप्त नहीं होता ऐसा सरोवर. अभी पिछले सप्ताह विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कैलास मानसरोवर यात्रियों के पहले जत्थे को विदा किया. पिछले वर्ष प्रधानमंत्री मोदी के प्रयास से मानसरोवर जाने का एक दूसरा मार्ग भी खोला गया, जो सिक्किम में नाथुला होकर जाता है.
पिछले वर्ष इस मार्ग से यात्रा पर जानेवाले प्रथम यात्री होने का मुझे सौभाग्य मिला. इससे पहले मैं उत्तराखंड में धारचुला और गुंजी जो सबसे सुंदर मार्ग है, वहां से भी पैदल यात्रा कर आया था. यह यात्रा कठिन परंतु जीवनभर स्मृति मात्र से आनंद देनेवाली होती है. यही एकमात्र ऐसी यात्रा है, जहां शिव से साक्षात संवाद का अवसर मिल सकता है.
भारत, नेपाल और ल्हासा (तिब्बत-चीन) के मार्ग से यह यात्रा होती है, जिसमें सबसे कठिन लेकिन सर्वाधिक आनंददायी और सुंदर यात्रा मार्ग भारत से हाेकर जाता है. यात्रा में 27 दिन लगते हैं और कुछ प्रदेश सरकारें यात्रियों को अनुदान भी देती हैं. इस यात्रा को भारत के विदेश मंत्रालय और चीन सरकार के माध्यम से संपन्न किया जाता है. इसमें सामान्यत: एक लाख रुपये प्रति यात्री खर्च हो जाते हैं.
हम सब शिव की पूजा भी करते हैं, शिव परिवार को बहुत धूमधाम से मनाते भी हैं, जिनमें माता पार्वती, गणेश जी और कार्तिकेय तो हैं ही, साथ ही उनके वाहन भी पूजे जाते हैं. यह भारतीय परंपरा मंे सभी जीवों के प्रति आदर का भाव भी दर्शाता है, जिसके अंतर्गत शिवजी के वाहन नंदी यानी बैल, गणेज जी के वाहन मूषक और कार्तिकेय जी के वाहन मोर शामिल हैं.
पर कोई बता सकता है कि समूचा शिव परिवार कहां रहता है? बाकी सारे देवी-देवता स्वर्ग में या अपने-अपने लोकों में रहते हैं. अकेले शिवजी का ही परिवार ऐसा है, जो हमारी पृथ्वी पर दिल्ली से सिर्फ 865 किमी दूर तिब्बत के पश्चिमी भाग में कैलास पर्वत पर साक्षात विराजमान है. दुनिया में शायद कोई दूसरा पर्वत है ही नहीं, जिसे हजारों वर्षों से इतनी पवित्रता से पूजा जाता है, जैसे कैलास पर्वत को. एक और रोचक बात यह है कि दुनिया में हर देश में लगभग हर पर्वत पर पर्वतारोही चढ़े हैं और वहां उन्होंने अपने-अपने देश का झंडा फहराया है. एकमात्र कैलास पर्वत ही ऐसा है, जिसकी पावनता के सामने सिर झुकाते हुए आज तक किसी पर्वतारोही को कैलास पर्वत पर जाने की अनुमति नहीं दी गयी है. ईश्वर में विश्वास न रखनेवाले चीन के कम्युनिस्ट शासन ने भी कैलास पर्वत की पावनता का सम्मान किया है.
कैलास पर्वत की महिमा अपरंपार है. यहां आदि शंकर आये, गुरु नानक देव जी आये, भगवान स्वामीनारायण अपने बाल्यकाल में नीलकंठ के रूप में यहां पधारे, प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव की यह निर्वाण स्थली है और तिब्बत के बौद्ध कैलास पर्वत पर शिव और भगवान अवलोकितेश्वर के दर्शन करते हैं तथा असंभव समझी जानेवाली कैलास पर्वत की दंडवत परिक्रमा करते हैं. 89 किमी की यह परिक्रमा 21 दिन में पूरी होती है. कैलास पर्वत की यात्रा के लिए भारत सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा हर साल जनवरी-फरवरी में विज्ञापन देकर इच्छुक यात्रियों से आवेदन मंगवाये जाते हैं.
मानसरोवर का वर्णन आदि ग्रंथों में मिलता है. रामायण, महाभारत, पुराणों- विशेषकर स्कंदपुराण में इसका वर्णन है. बाणभट्ट की कादम्बरी, कालिदास के रघुवंश और कुमार संभवम्, संस्कृत और पाली के बौद्ध ग्रंथों में भी इसका सुंदर वर्णन है. महाभारत में इसे बिंदुसर तथा जैन ग्रंथों में इसे पद्म हृद कहा गया है. इसके चारों ओर सतलज, करनाली (सरयू की सहयोगी नदी), ब्रह्मपुत्र तथा सिंधु के उद्गम हैं. इसके उत्तर में कैलास, दक्षिण में गुरला मांधाता, पश्चिम मंे राक्षस ताल है. सागरतट से 14,950 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मानसरोवर का व्यास 54 मील तथा गहराई 300 फीट है.
मानसरोवर तट पर आकर मानो होशाेहवास गुम हो गये. सब एक-दूसरे ही लाेक में विचरने लगे. शिव पुराण में लिखा है कि मानसरोवर में एक बार स्नान से सात पीढ़ियां तर जाती हैं. ऐसा पावन मौका कहां मिलेगा? श्री कैलास दर्शन के बाद मन में अनोखी खुशी और शांति व्याप गयी थी. चित्त तृप्त हो गया और थकान गायब हो गयी. विश्व की संपदा पाने जैसा रोमांच शरीर को शक्ति दे रहा था. वापस हुए तो मन में यह भाव था कि चलो प्रभु यात्रा सफल हो गयी.
(लेखक ने ‘कैलास मानसरोवर- साक्षात शिव से संवाद’ पुस्तक भी लिखी है)
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