क्या योग का कोई धर्म है?
Updated at : 23 Jun 2016 6:19 AM (IST)
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अनुपम त्रिवेदी राजनीतिक-आर्थिक विश्लेषक दो दिन पूर्व 21 जून को दुनियाभर में अंतरराष्ट्रीय योग-दिवस धूमधाम से मनाया गया. मोदी सरकार के मंत्री देश भर में योग करते नजर आये और हर कोई योग के फायदों की चर्चा करता दिखा. योग को मजहब का जामा पहनाने के प्रयास भी हुए. नमाजी टोपी पहन इफ्तार करनेवाले कई […]
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अनुपम त्रिवेदी
राजनीतिक-आर्थिक विश्लेषक
दो दिन पूर्व 21 जून को दुनियाभर में अंतरराष्ट्रीय योग-दिवस धूमधाम से मनाया गया. मोदी सरकार के मंत्री देश भर में योग करते नजर आये और हर कोई योग के फायदों की चर्चा करता दिखा. योग को मजहब का जामा पहनाने के प्रयास भी हुए. नमाजी टोपी पहन इफ्तार करनेवाले कई सेक्युलर नेता योग के जलसों से दूर रहे कि कहीं उन पर सांप्रदायिक होने का आरोप न लग जाये. पर क्या योग वाकई सांप्रदायिक है? क्या योग को धर्म से जोड़ कर देखना सही है?
यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि योग का उद्भव प्राचीन भारत में वैदिक-काल में हुआ और अनगिनत हिंदू ऋषियों और मनीषियों ने इसे परिष्कृत किया. पर इसको कभी भी धर्म या कर्मकांड से नहीं जोड़ा गया. महर्षि पतंजलि, जिन्होंने बृहद योग-सूक्त की रचना की, ने योग को परिभाषित करते हुए कहा कि योग मन को वश में करने का साधन है (सूत्र 1.2), अपने ‘स्व’ को परिष्कृत करने का माध्यम है (सूत्र 1.3) और योग ध्यान-क्रिया और मनन के माध्यम से आपसी प्रेम, समदर्शिता, सद्भाव, अहिंसा, सत्यवादिता और संयम आदि गुणों के उन्नयन का प्रयास करता है (सूत्र 1.33, 2.20, 2.32). सार यह है कि योग एक क्रिया है, कोई धार्मिक कर्मकांड नहीं.
योग का अर्थ होता है समागम- अब हर व्यक्ति इसका अर्थ अपनी सुविधा से ले सकता है. यह मन का बुद्धि से, शरीर का मस्तिष्क से और आत्मा अर्थात् ‘स्व’ का परमात्मा अर्थात् भगवान, अल्लाह या ईसा से समागम भी हो सकता है. कहीं कोई बंधन नहीं है. हर कोई स्वतंत्र है इसे अपने अनुसार ढालने के लिए. योग को अनुशासन से भी जोड़ा जाता है, जिसमें सारी प्रक्रिया यम व नियम पर आधारित है. और शरीर के लिए यम-नियम, डूज-डोंट्स या क्या सही-क्या गलत है, यह तो हर मजहब में होता है.
अपने शरीर और मन का ध्यान करना तो सभी धर्म सिखाते हैं और उसमें कुछ गलत नहीं है. आखिर प्रकृति के नियम तो सबके लिए एक जैसे ही होते हैं. प्रकृति तो धर्म के आधार पर सांसें नहीं बांटती. और ऐसा भी नहीं है कि अलग-अलग धर्म में शरीर की बनावट अलग-अलग होती है या की जा सकती है. सब प्रकृति और उसके नियमों से बंधे हैं. ऐसे में जीवन को परिष्कृत करने का उपाय कहीं से भी आये, हर्ज क्या है. आखिर फायदा भी तो अपने शरीर को ही हो रहा है न?
अभी 2-3 दिन पूर्व प्रसिद्ध संत जग्गी वासुदेव ने अमेरिका में बयान दिया कि योग हिंदू नहीं है. और अगर योग ‘हिंदू’ है, तो गुरुत्वाकर्षण-शक्ति ‘क्रिश्चियन’ है. बयान काफी बेतुका है, पर बात पते की है. अगर गुरुत्वाकर्षण शक्ति की खोज ईसाई न्यूटन ने की, तो क्या इस पर पोप को पेटेंट मिल जाना चाहिए? यदि ईसाई बेंजामिन फ्रेंक्लिन और ग्राहम बेल ने बिजली और दूर-संचार की खोज की, तो क्या और मजहबों को उन्हें इस्तेमाल करने से परहेज करना चाहिए?
दरअसल, हर मजहब इंसान की बेहतरी, उसके भले के लिए काम करता है. ऐसे में अगर इंसान का कहीं से भी कुछ भला होता है, तो उसको मजहबी जामा पहनाने को कोई मतलब ही नहीं है. ये सब कार-गुजारी सियासतदानों की होती है, जो धर्म या मजहब का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं.
आज दुनियाभर में योग को स्वीकार्यता मिल रही है. संयुक्त राष्ट्र में जिन 177 देशों ने योग-दिवस का समर्थन किया, उनमें से 40 मुसलिम राष्ट्र हैं. जब सारी दुनिया भारत की इस प्राचीन और महान परंपरा को अपना रही है, तो भारत के लोगों को इससे क्यों वंचित किया जाये. कुछ राजनेता अपने स्वार्थ के लिए इसे वोट-बैंक से जोड़ रहे हैं और योग को सांप्रदायिक बता रहे हैं. ऐसे नेता देश के लोगों का भला नहीं, बल्कि उनका नुकसान कर रहे हैं.
योग स्वस्थ-जीवन जीने का एक तरीका है. अपने मन को, शरीर को साधने का एक विज्ञान है. यह हमारे अस्तित्व के विभिन्न आयामों को संतुलित करने और हमें शारीरिक एवं गहरी मानसिक शांति या सुकून की ओर ले जाने की विधा है. चाहे तो इसी दिमागी सुकून को अपने-अपने विश्वासों और मजहब के संदर्भ में देखा जा सकता है. प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु दीपक चोपड़ा के अनुसार, योग ‘स्व’ का विज्ञान है.
उनके अनुसार योग हमें विभिन्न तकनीकों- जैसे कि ध्यान, आसन, सांस लेने की पद्धति और व्यवहार व आचरण के कुछ नियमों आदि के माध्यम से हमारे भीतर की दुनिया को समझने में हमारी मदद करता है. यह कोई विचारधारा, विश्वास-प्रणाली, हठधर्मिता या अनुपालन के रूप में धर्म नहीं है, बल्कि विचारों के जाल से परे एक ऐसा व्यापक आध्यात्मिक अनुभव है, जो हमें वास्तविकता के सार्वभौमिक धरातल पर पहुंचा देता है.
आसान शब्दों में समझें तो योग तो धर्म- किसी भी धर्म- का हिस्सा हो सकता है, पर कोई धर्म योग में निहित नहीं है. यह सभी मानव-मात्र के कल्याण के लिए है. आज अमेरिका में लगभग चार करोड़ लोग प्रतिदिन योग करते हैं. क्या वे हिंदू धर्म के अनुयायी बन गये हैं? नहीं. इसी तरह आज दुनियाभर में कराटे और मार्शल आर्ट, जिसकी उत्पत्ति बौद्ध मठों में हुई, को सीखने और व्यवहार करनेवाले लोग करोड़ों में हैं, तो क्या यह सभी बौद्ध बन गये हैं? नहीं. तो हिंदुस्तान में योग करने से धर्म भ्रष्ट कैसे हो जायेगा?
आज दुनियाभर के लोग इसलिए योग करते हैं, क्योंकि इससे उन्हें स्वास्थ्य-लाभ और मानसिक-शांति मिलती है.
यही हमारा भी उद्देश्य होना चाहिए न कि मौका-परस्त राजनीतिज्ञों के झांसे में आकर इसे धर्म से जोड़ना चाहिए. दरअसल, आज बीमारियों से घिरी हमारी जिंदगी में योग एक मुफ्त के बीमा की तरह है, जो हमें जिस्म और दिमाग की अनेक बीमारियों के जोखिम से दूर रखता है. हर इंसान को इसे अपनाना चाहिए. प्रधानमंत्री मोदी ने भी योग दिवस पर सबसे यही अपील की.
समय आ गया है कि हम यह स्वीकारें कि योग किसी एक धर्म का नहीं, बल्कि हम सभी का है और हम भारतीयों की संस्कृति का अटूट हिस्सा है. यह हमारी ऐसी साझी धरोहर है, जिस पर हर भारतीय को गर्व होना चाहिए.
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