भड़काऊ बोल के खतरे

सार्वजनिक जीवन जीने और लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास करनेवाले लोग जानते हैं कि संवाद से ही समुदाय बनता है, चाहे वह कोई छोटा सा क्लब हो या फिर पूरा राष्ट्र! इसके लिए उसके सदस्यों के बीच किन्हीं बातों पर न्यूनतम सहमति जरूरी होती है. ठीक इसी कारण अभिव्यक्ति की आजादी देनेवाले हमारे देश के संविधान […]
सार्वजनिक जीवन जीने और लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास करनेवाले लोग जानते हैं कि संवाद से ही समुदाय बनता है, चाहे वह कोई छोटा सा क्लब हो या फिर पूरा राष्ट्र! इसके लिए उसके सदस्यों के बीच किन्हीं बातों पर न्यूनतम सहमति जरूरी होती है.
ठीक इसी कारण अभिव्यक्ति की आजादी देनेवाले हमारे देश के संविधान में गुंजाइश रखी गयी है कि किसी व्यक्ति या संस्था की कोई बात राष्ट्र रूप में बने रहने के लिए जरूरी न्यूनतम सहमतियों पर चोट करनेवाली हो, तो उस पर समय रहते पाबंदी लगायी जा सके. लेकिन वह व्यक्ति क्या करे, जिसका सार्वजनिक जीवन इस बात पर ही टिका हो कि वह कितने ज्यादा भड़काऊ बयान देता है?
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