एफडीआइ पर बने सर्वसम्मत नीति

Published at :15 Jan 2014 4:33 AM (IST)
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एफडीआइ पर बने सर्वसम्मत नीति

यूपीए सरकार ने पंद्रह महीने पहले भारी विरोध के बीच खुदरा क्षेत्र में 51 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) को मंजूरी दी थी. देसी किराना व्यवसाय और उससे जुड़ी रोजगार संभावनाओं को होनेवाले घाटे के मद्देनजर हुए विरोध के कारण तय हुआ कि जो राज्य मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआइ नहीं चाहते, वे इससे इनकार कर […]

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यूपीए सरकार ने पंद्रह महीने पहले भारी विरोध के बीच खुदरा क्षेत्र में 51 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) को मंजूरी दी थी. देसी किराना व्यवसाय और उससे जुड़ी रोजगार संभावनाओं को होनेवाले घाटे के मद्देनजर हुए विरोध के कारण तय हुआ कि जो राज्य मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआइ नहीं चाहते, वे इससे इनकार कर सकते हैं.

तब दिल्ली सहित ज्यादातर कांग्रेस शासित प्रदेशों ने अपने यहां खुदरा क्षेत्र में एफडीआइ को हरी झंडी दी थी, जबकि आम आदमी पार्टी ने अपने घोषणापत्र में ऐसी मंजूरी को रद्द करने का वादा किया था. अब दिल्ली में सरकार का जिम्मा संभालने के बाद ‘आप’ ने इस वायदे को पूरा करते हुए औद्योगिक नीति एवं प्रोन्नयन विभाग को चिट्ठी लिखी है कि शीला दीक्षित सरकार के समय दिल्ली में खुदरा व्यवसाय में एफडीआइ की मंजूरी के फैसले को वापस लेती है. जाहिर है, आप के इस फैसले से उद्योग जगत को खुशी नहीं होगी. फिक्की, सीआइआइ व एसोचैम ने अलग-अलग स्वर में केजरीवाल सरकार के फैसले को निराशापूर्ण बताते हुए तर्क दिया है कि इससे देश में विदेशी निवेश न्योतने की कोशिशों को धक्का लगेगा.

उद्योग जगत को दिल्ली और आसपास के इलाकों में अगले पांच सालों में खुदरा क्षेत्र में कम-से-कम 50 अरब डॉलर के विदेशी निवेश की उम्मीद थी. लेकिन तथ्य यह भी है कि खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के फैसले की मंजूरी के पंद्रह महीने बाद भी इस दिशा में विदेशी निवेशकों ने खास उत्साह नहीं दिखाया है. सवा साल से ज्यादा समय बीतने के बाद अब ब्रिटेन के बड़े सुपरमार्केट समूह टेस्को ने टाटा समूह से संबद्ध इकाइ ट्रेन्ट के साथ खुदरा क्षेत्र में 10 करोड़ डॉलर निवेश करने की बात कही है. इससे साबित होता है कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश न्योतने के लिए किये गये नीतिगत बदलाव अपेक्षित परिणाम दिलाने में विशेष सफल नहीं हो पाये हैं.

दिल्ली जैसी जगह में किराना व्यवसाय में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए अवसर वैसे भी ज्यादा नहीं हैं, क्योंकि दिल्ली इस मामले में पहले से एक भरा हुआ बाजार है. फिर भी जरूरी है कि रिटेल में एफडीआइ को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर कोई आम सहमति बने, ताकि किसी निवेशक को सरकार बदलने के साथ नीति के बदलने की आशंका न रहे.

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