मुआवजे का हक मिले

ऐसा लगता है कि राजधानी की पहचान हादसों के शहर के तौर पर बन रही है़ छोटी-मोटी सेंधमारी से बैंक लूट व नक्सली तांडव से आइएस और आइएम की उग्र गतिविधियों की खबरों ने शहर को सुर्खियों में ला खड़ा किया है. आंतरिक व बाहरी सुरक्षा के नाम पर नित्य नये आयोगों का सिलसिला लगातार […]
ऐसा लगता है कि राजधानी की पहचान हादसों के शहर के तौर पर बन रही है़ छोटी-मोटी सेंधमारी से बैंक लूट व नक्सली तांडव से आइएस और आइएम की उग्र गतिविधियों की खबरों ने शहर को सुर्खियों में ला खड़ा किया है. आंतरिक व बाहरी सुरक्षा के नाम पर नित्य नये आयोगों का सिलसिला लगातार चलने के बावजूद नतीजा- ढाक के तीन पात.
वारदातें हैं कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहीं. सरकार अपनी विफलताओं को ढंकने के लिए या सियासी मजबूरियों के मारे कभी-कभार मुआवजे भी देती है. मगर कुछ ऐसे वारदात हैं, जो बस कागजों में सिमट कर रह जाते हैं. मसलन घरों में सोये निरीह लोगों के साथ मार-पीट, लूट-पाट या छीना-झपटी जैसे हादसे तो महज खबरें बन कर रह जाती हैं. सरकार को स्थानीय सुरक्षा एजेंसियों की विफलताओं से होनेवाले ऐसे नुकसानों की भरपाई की जिम्मेवारी लेनी चाहिए. पुलिस की निष्क्रियता के पीड़ितों को भी उचित मुआवजे का हक मिले.
एमके मिश्रा, रांची
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