संस्कृति की नुमाइश

Updated at : 06 May 2016 6:09 AM (IST)
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संस्कृति की नुमाइश

डॉ सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार अतुल्य भारत से आमिर खान का पत्ता साफ होने के बाद लग रहा था कि अब पता नहीं, भारत उतना अतुल्य रह पायेगा या नहीं? दस साल से अच्छा-भला, अतिथि को देवता समझने के लिए मॉटिवेटिया रहा था भारत को, पर भारत था कि मानता ही नहीं था. कहीं-न-कहीं किसी […]

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डॉ सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
अतुल्य भारत से आमिर खान का पत्ता साफ होने के बाद लग रहा था कि अब पता नहीं, भारत उतना अतुल्य रह पायेगा या नहीं? दस साल से अच्छा-भला, अतिथि को देवता समझने के लिए मॉटिवेटिया रहा था भारत को, पर भारत था कि मानता ही नहीं था. कहीं-न-कहीं किसी न किसी विदेशी को देवता के बजाय दैत्य समझ ही बैठता था और फिर उसके साथ खुद भी दैत्यवत पेश आकर दैत्योचित व्यवहार कर डालता था.
आमिर को उसे टोक कर बताना पड़ता था कि यह जो विदेशी है, दैत्य नहीं, बल्कि देवता है, क्योंकि अतिथि है और अतिथि होने मात्र से दैत्य भी हो, तो वह दैत्य नहीं रह जाता, बल्कि देवता हो जाता है और वह इसलिए, क्योंकि हमारे यहां अतिथि को देवता माना गया है. दैत्यों को भी यह बात पता है, इसलिए कितने ही दैत्य हमारे यहां अतिथि बन कर आ जाते हैं और हमें ही अंगूठा दिखा कर चले जाते हैं. फिर भी आमिर को समझाना पड़ता था भारत को, कि कुछ तो इन विदेशियों का लिहाज कर और बराय मेहरबानी
अतिथिदेवो भव!
भारत तात्कालिक रूप से उसकी बात मान भी लेता था और अपने व्यवहार पर पछताता भी दिखता था, लेकिन अगले ही विज्ञापन में वह फिर वही हरकत करता नजर आता था और आमिर को उसे फिर से समझाना पड़ता था. दूसरे चैनलों पर भी कमोबेश यही हाल रहता था और बेचारा आमिर सारा दिन कभी इस चैनल पर, तो कभी उस चैनल पर भागता-दौड़ता रहता था. यह देख मैं सोच में पड़ जाता कि यह अपनी फिल्मों की शूटिंग कब करता होगा? उसकी इतनी कम फिल्में आने के पीछे शायद यह भी एक कारण रहा हो.
लेकिन फिर एक दिन देश में असहिष्णुता बढ़ने की बात कह कर उसने सरकार की निगाह में अपना पत्ता मैला कर लिया. शायद उसे पता नहीं रहा होगा कि यह सरकार असहिष्णुता बढ़ने की बात से इतनी ज्यादा बिदकती है, जितनी महंगाई और काले धन से भी नहीं बिदकती और फौरन असहिष्णुता द्वारा ही उसका प्रतिकार कर डालती है. तो एक तो असहिष्णुता से चिढ़ने और दूसरे स्वच्छता-अभियान का बीड़ा उठा लेने के कारण सरकार ने आमिर का मैला पत्ता साफ कर उसकी जगह अमिताभ बच्चन और प्रियंका चोपड़ा को भारत को अतुल्य बनाने का ठेका देने की घोषणा कर दी.
इनमें से अमिताभ तो अपना पत्ता खुद ही इतना साफ रखते आये हैं कि ‘चंदन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग’ वाला दृश्य याद आ जाता है.
पहले कांग्रेस में रह कर परिवार का साथ देते हुए उनका पत्ता गंदा नहीं हुआ, फिर सपा के राज में उत्तर प्रदेश में जुर्म की इंतिहा हो जाने पर भी ‘यूपी में है दम क्योंकि जुर्म यहां है कम’ कहने से भी उनके पत्ते पर गंदगी के छींटे नहीं पड़े, और फिर गुजरात-दंगों के बावजूद ‘कुछ दिन तो गुजारो गुजरात में’ कहने में भी उनके पत्ते की स्वच्छता में कोई कमी नहीं आयी. लिहाजा किसी भी विचारधारा की सरकार को उनका पत्ता साफ करने की जरूरत नहीं पड़ी.
अलबत्ता पनामा में नामा लगानेवालों में नाम आने के कारण फिलहाल उनका पत्ता गंदला जरूर दिख रहा है और इस कारण भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार की पूरी जिम्मेवारी अकेले प्रियंका चोपड़ा पर आ पड़ी है, जिसे वे पूरे दम-खम से निभाने में लगी हुई हैं.
अभी हाल ही में अमेरिका में वहां के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी के साथ आयोजित भोज में ऊपर से काफी खुली पोशाक में पहुंच कर उन्होंने न केवल यह दिखा दिया कि किसी जमाने में बंद समझी जानेवाली भारत की संस्कृति अब कितनी खुल गयी है, बल्कि यह भी कि उस संस्कृति में क्या-कुछ दिखता है और कैसा दिखता है.
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