जनतंत्र का विलोम है वंशवाद

Updated at : 28 Apr 2016 11:55 PM (IST)
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जनतंत्र का विलोम है वंशवाद

विश्वनाथ सचदेव वरिष्ठ पत्रकार अखबार के पहले पन्ने पर छपा है यह चित्र- तीन महिला सांसद एक ‘साझी कार’ से उतर कर संसद-भवन जा रही हैं. चित्र का कैप्शन है- तीन पार्टियां, एक कार. अलग-अलग दलों की इन महिला सांसदों को दिल्ली में ‘सम-विषम’ नियम के चलते एक कार साझा करनी पड़ी है. सदन के […]

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विश्वनाथ सचदेव
वरिष्ठ पत्रकार
अखबार के पहले पन्ने पर छपा है यह चित्र- तीन महिला सांसद एक ‘साझी कार’ से उतर कर संसद-भवन जा रही हैं. चित्र का कैप्शन है- तीन पार्टियां, एक कार. अलग-अलग दलों की इन महिला सांसदों को दिल्ली में ‘सम-विषम’ नियम के चलते एक कार साझा करनी पड़ी है.
सदन के भीतर एक-दूसरे पर तीखे शब्द-वार करनेवाले सांसदों का यह ‘बहनापा’ अच्छा लगा. चित्र में दिखाई देनेवाली ये सांसद थीं- राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की सुप्रिया सुले, भाजपा की पूनम महाजन और कांग्रेस की सुष्मिता देव. तीनों राजनीतिक परिवार से हैं. ये अपनी क्षमता प्रमाणित करने में लगी हैं, लेकिन उन्हें ऐसा करने का अवसर मिलने के पीछे यह तथ्य मजबूती से खड़ा है कि पारिवारिक संबंधों ने तीनों को बेहतर स्थिति में ला दिया था.
विरासत की राजनीति के चलते जनतांत्रिक भारत में एक नयी राजशाही पनप रही है- आप इसे परिवारशाही कह सकते हैं. इसमें कोई संशय नहीं कि इसकी शुरुआत कांग्रेस पार्टी से हुई थी.
जवाहरलाल नेहरू ने जब इंदिरा गांधी को कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनवाया था, तभी यह कहा जाने लगा था कि उनके मन में बेटी को विरासत सौंपने की बात है. आज हमारी राजनीति में, लगभग सभी राजनीतिक दलों में यह बीमारी फैलती दिख रही है. वंशवाद की इस राजनीति का लाभ उठा कर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत बनानेवालों की योग्यता पर निसंदेह यह कहा जा सकता है कि इस विरासती राजनीति ने बहुत सारी गलत परंपराओं को हमारे जनतंत्र की चादर पर पैबंद की तरह ‘सजा’ दिया है.
आज बड़े नेता ही नहीं, छुटभैये नेता भी, अपने रिश्तेदारों को, खासकर बेटों-बेटियों को राजनीतिक कद-काठी विरासत में देकर जाना चाहते हैं, और यह सब जनता की सेवा के नाम पर होता है.
अब नेता-संतानें यह मान कर चलने लगी हैं कि माता-पिता के चुनाव-क्षेत्र की जनता उनकी रियाया है, जिसकी ‘सेवा’ करना उनका अधिकार है. क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की सारी राजनीति का तो जैसे आधार ही यह परिवारवाद हो. बिहार में अपने दो बेटों को मंत्रिमंडल में शामिल करवा कर लालू प्रसाद यादव ने फिर से वह कर दिखाया है, जो कभी अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनवा कर उन्होंने किया था. देश के बाकी राज्यों में भी राजनीति का दारोमदार नेताओं के परिवार पर ही निर्भर है.
पारिवारिक आधारों पर राजनीति की विरासत का दावा करनेवालों पर उंगली उठाना आसान है. माता-पिता, भाई-पति की राजनीतिक विरासत पर अधिकार जमाने की प्रवृत्ति को आसानी से गैरजनतांत्रिक कहा जा सकता है. लेकिन, सवाल है कि राजनीतिक दलों के कर्ता-धर्ताओं को यह क्यों लगता है कि चुनाव-क्षेत्र परिवारों की जायदाद होते हैं? मतदाता विरासत के इन दावेदारों का समर्थन क्यों करते हैं?
यदि यह समर्थन योग्यता के आधार पर है, तब तो ठीक है, लेकिन क्या मतदाता सचमुच योग्यता को अपने निर्णय का आधार बनाते हैं? आखिर क्यों मतदाता यह मान लेते हैं कि किसी योग्य राजनेता का बेटा, बेटी, भाई या कोई संबंधी भी उतना ही योग्य सिद्ध होगा?
यह बात मतदाता कब समझेगा कि पारिवारिक आधारों पर चलनेवाली इस राजनीति के मूल में वही राजशाही मानसिकता है, जिसे स्वतंत्र भारत में हमने एक इतिहास बना देना चाहा था. सवाल लोकतांत्रिक संस्थाओं को ताकतवर बनाने का है. जनतंत्र में राजनीतिक ताकत विरासत में नहीं मिलती. विरासत की राजनीति जनतांत्रिक मूल्यों और आदर्शों का नकार है.
दुर्भाग्य से, हम चुनाव-दर-चुनाव जनतांत्रिक मूल्यों को नकार रहे हैं. नेताओं के घर में नेता पैदा हो सकते हैं, लेकिन नेताओं के घर में जन्म लेना ही नेता होने का कारण नहीं हो सकता. यह हमारी राजनीति का दुर्भाग्य ही है कि हम ‘जन्मजात शासक’ की मान्यता से उबर नहीं पा रहे. एक जनतंत्र में नेता जनमते नहीं हैं, नेता बनते हैं. और नेता बनने की यह प्रक्रिया सोने का तप कर कुंदन बनने जैसी होनी चाहिए. परिवारवादी राजनीति में ऐसी किसी तपस्या के लिए कोई स्थान नहीं है, इसलिए यह राजनीति स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए.
अपने वंश की सत्ता में नेताओं की आसक्ति समझ में आती है, अपनी ताकत बढ़ाने के लिए राजनीतिक दलों द्वारा वंशवाद की राजनीति को बढ़ावा देना भी कुछ हद तक समझ आता है, पर मतदाता क्यों शिकार बन जाता है?
मतदाता का विवेकपूर्ण निर्णय ही जनतांत्रिक परंपराओं को स्थापित कर सकता है, मजबूत बना सकता है. इन परंपराओं का मजबूत होना ही जनतंत्र की सार्थकता की शर्त है. यह शर्त पूरी होनी ही चाहिए. इसके लिए यह समझ बननी जरूरी है कि परिवारवादी राजनीति और राजनीतिक परिवार, जनतंत्र का विलोम हैं.
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