अब बदले-बदले से सरकार नजर आते हैं

छोटी सी गौरैया! दाल का दाना खूंटे में फंस गया और बेचारी के सामने सवाल आन पड़ा कि क्या खाऊं, क्या पिऊं, क्या लेके परदेस जाऊं. चिड़िया बढ़ई से लेकर राजा, रानी, सांप, आग, पानी और हाथी, यानी वे सभी महामना जो दाना निकालने के लिए कुछ कर सकते थे, के पास फरियाद लेकर गयी. […]
छोटी सी गौरैया! दाल का दाना खूंटे में फंस गया और बेचारी के सामने सवाल आन पड़ा कि क्या खाऊं, क्या पिऊं, क्या लेके परदेस जाऊं. चिड़िया बढ़ई से लेकर राजा, रानी, सांप, आग, पानी और हाथी, यानी वे सभी महामना जो दाना निकालने के लिए कुछ कर सकते थे, के पास फरियाद लेकर गयी.
किसी ने नहीं सुनी, लेकिन एक चींटी का हृदय उसकी पीड़ा से पिघला और वह हाथी के सूंड़ में चिकोटी काटने को तैयार हुई! सब जानते हैं यह कथा, कि इसके बाद पासा कैसे गौरेया के पक्ष में पलट गया था. अधिकार और दंड के भेद से एक-दूसरे से एक कड़ी में जुड़ा पूरा तंत्र दाना निकालने को तैयार होता नजर आया. देश की संसदीय राजनीति में हाल के कुछ घटनाक्रम इस कहानी की याद दिलाता है.
जैसे ही आम आदमी के दर्द की दवा लाने की बात कह कर ‘आप’ ने दिल्ली का किला फतह किया, राजनीति के सुर और स्वर बदल गये हैं. शुरुआत लोकपाल बिल से हुई. सत्तापक्ष और विपक्ष ने इसे पास कराने में एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया और देश ने हैरत के साथ देखा कि चार दशक से लटका बिल अचानक पास हो गया.
पहली जनवरी को इसे राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल गयी है. इतना ही नहीं, सत्तापक्ष खुद को भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का अगुआ साबित करने पर तुल गया है. पहले कांग्रेस ने महाराष्ट्र में अपनी ही हुकूमत के खिलाफ जाकर आदर्श घोटाले को दोबारा जांच की कसौटी पर रखने की मंशा जतायी, और अब विदेशी कंपनी अगस्तावेस्टलैंड से 12 वीवीआइपी हेलीकॉप्टरों की खरीद का 3600 करोड़ रुपये का करार रद्द कर दिया गया है.
करार 2010 में हुआ था, जिसमें 360 करोड़ रुपये के कमीशन की बात साल भर पहले सामने आयी तो जांच सीबीआइ को सौंपी गयी थी. अच्छा होता, लोकपाल बिल पहले बन जाता. अच्छा होता, घोटाले की खबर आते ही डील रद्द हो जाती और आदर्श घोटाला सामने आते ही महाराष्ट्र के मंत्रियों पर गाज गिरती.
लेकिन कोई बात नहीं, कहावत है, समूल नाश को सामने देख ज्ञानीजन फिक्र आधा बचा लेने की करते हैं. सत्तापक्ष फिलहाल वही कोशिश करता दिख रहा है. अच्छा है कि साल की शुरुआत में बदले-बदले से सरकार नजर आते हैं. इससे यकीन जमता है कि इस साल जनता के पक्ष में कुछ अच्छा होगा!
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