सुधार की राजनीति के बढ़ते कदम

Published at :03 Jan 2014 4:09 AM (IST)
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सुधार की राजनीति के बढ़ते कदम

।। आनंद कुमार ।। समाजशास्त्री, जेएनयू अगर हमारे राजनीतिक दलों और विधानमंडल में अच्छे चरित्र की वापसी हो गयी, तो नौकरशाही और न्यायपालिका का सुधरना कुछ ही हफ्तों या महीनों की बात रह जायेगी. इसलिए अब बड़ा सवाल आर्थिक और सामाजिक नवनिर्माण का है. भारतीय राजनीति के आकाश में आशा का सूरज अकसर सिद्धांतहीनता के […]

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।। आनंद कुमार ।।

समाजशास्त्री, जेएनयू

अगर हमारे राजनीतिक दलों और विधानमंडल में अच्छे चरित्र की वापसी हो गयी, तो नौकरशाही और न्यायपालिका का सुधरना कुछ ही हफ्तों या महीनों की बात रह जायेगी. इसलिए अब बड़ा सवाल आर्थिक और सामाजिक नवनिर्माण का है.

भारतीय राजनीति के आकाश में आशा का सूरज अकसर सिद्धांतहीनता के बादलों से ढका आता रहा है. जनता पर भरोसा करके सिद्धांत और सेवा का आदर्श अपनानेवाली जमातों ने जब-जब पहल की है, उम्मीदों की रोशनी चौतरफा फैली है. इस दौरान जनता की समझदारी पर यकीन करते हुए साहसी पहल करनेवालों ने इस प्रसंग में कई रोमांचक अध्याय लिखने में सफलता पायी है.

देश में पिछले दो वर्षो में धीरे-धीरे ही सही, पारंपरिक सत्ता और समझौतों की राजनीति के दौर में परिवर्तन और सुधार की राजनीति एक बार फिर तेजी से आगे बढ़ती दिख रही है.

भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए जन लोकपाल की मांग के साथ शुरू हुआ आंदोलन और अनशन तात्कालिक तौर पर संसदीय चक्रव्यूह का शिकार भले हो गया हो, लेकिन कुछ ही अंतराल के बाद व्यवस्था में सुधार की इस मांग को सर्वसम्मति से स्वीकार किया जाना कोई मामूली घटना नहीं है.

इसी कड़ी में देश की राजधानी दिल्ली के मतदाताओं द्वारा सर्वगुण संपन्न स्थापित राजनीतिक विकल्पों को ठुकराते हुए विधानसभा चुनाव में झाड़ू चुनाव चिह्न् के साथ वैकल्पिक राजनीति का खाका पेश करनेवाली आम आदमी पार्टी को समर्थन देना राजनीति के इस मोड़ पर अद्भुत और अविश्चसनीय सच जैसा लगता है. यह घटनाक्रम दिल्ली तक सीमित नहीं है.

इसके समानांतर समूची राजनीति को अपनी जिम्मेवारी मान कर मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिये नया हस्तक्षेप करने की हिम्मत दिखानेवाली पीढ़ी का देश के हर प्रदेश में उभरना भविष्य के बेहतर होने का संकेत देता है.

एक नये साल में कदम रखते हुए भ्रष्टाचार पर प्रहार की उम्मीदें और गहरी हुई हैं. साल के पहले ही दिन लोकपाल बिल पर राष्ट्रपति की मुहर लग गयी है. पहली जनवरी को ही, भ्रष्टाचार के एक प्रतीक के रूप में बहुचर्चित अगस्तावेस्टलैंड हेलीकॉप्टर डील को भी केंद्र सरकार ने रद कर दिया.

अगले ही दिन, आदर्श घोटाले की जांच रिपोर्ट को खारिज करनेवाली महाराष्ट्र सरकार ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के दखल की आड़ में यू-टर्न मार लिया है. गुरुवार को महाराष्ट्र कैबिनेट ने आदर्श घोटाले की जांच रिपोर्ट आंशिक रूप से स्वीकार कर ली, हालांकि मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा कि जांच रिपोर्ट के आधार पर किसी भी नेता पर कार्रवाई की गुजांइश नहीं है.

गौर कीजिए तो आज हमारी चुनाव व्यवस्था को सुधारने का जुबानी जमा-खर्च बंद हो गया है, क्योंकि राजनीति के मैदान से बाहर की गयी पीढ़ी और जमातों ने अपने तरीके से जनता केंद्रित नया चुनाव पैदा कर दिया है. इसमें साफ घोषणापत्र, साफ चंदा, साफ उम्मीदवार और साफ चुनाव प्रचार के चार स्तंभों पर नया संसदीय तंत्र रचा जा रहा है.

इससे हमारे राजनीतिक दलों पर अपना पारंपरिक चरित्र और चेहरा बदलने का एक नया दबाव बन गया है. आज ज्यादातर दलों में आम कार्यकर्ताओं की सुनवाई और अच्छे जनसेवकों को उम्मीदवार बनाने की होड़ शुरू हो गयी है.

जाहिर है, अगर राजनीतिक दलों द्वारा चरित्रवान लोग ही उम्मीदवार बनाये जायेंगे, तो राजनीति का अपराधीकरण और समूची विधायिका का अवमूल्यन स्वत: रुक जायेगा. इन संकेतों से ऐसा लगता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव और इसी साल कई राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनावों में एक नवोदित पार्टी के दबाव के कारण पिछले कई दशकों का सबसे अच्छा, सस्ता और खूबसूरत चुनाव होनेवाला है.

अगर हमारे राजनीतिक दलों और विधानमंडल में अच्छे चरित्र की वापसी हो गयी, तो नौकरशाही और न्यायपालिका का सुधरना कुछ ही हफ्तों या महीनों की बात रह जायेगी. इसलिए अब बड़ा सवाल देश में आर्थिक और सामाजिक नवनिर्माण का है. दलाल पूंजीवाद को नकारे बिना हम जनता को चाहे जितना अधिकार या नकद दे दें, अर्थव्यवस्था में ईमानदार उद्यमियों, मेहनती किसानों और स्वरोजगारियों की बेहतरी की आशा करना बेमानी साबित होती रहेगी.

आज हमारी अर्थव्यवस्था में सर्वोच्च स्तर पर भ्रष्टाचार की पकड़ का सबूत जिलाधिकारी कार्यालय से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक फैला हुआ है. केवल कल-कारखानों के लाइसेंस ही नहीं, बिजली और पानी जैसी बुनियादी सहूलियतों की व्यवस्था में भी घोटालों पर घोटाले सामने आ रहे हैं.

अगर देश की राजधानी दिल्ली तक में पानी माफिया, बिजली माफिया और जमीन माफिया को बचाने की जिम्मेवारी बड़े राजनीतिक दलों ने उठा रखी है, तो कुछ राज्यों में सरकारों, स्थानीय नगर पालिका और गांवपंचायतों की कितनी दुर्दशा हो चुकी है, इसे विस्तर में जानने की किसे जरूरत है?

आज से करीब एक चौथाई शताब्दी पहले अफसरशाही यानी सरकारीकरण, उसके बाद कालेधन के सौदागरों यानी वैश्वीकरण और निजीकरण से बारी-बारी से जूझने के बाद एक तीसरी राह की तलाश देश के आम जन की जरूरत बन गयी है. इसमें पंचायत सरकार, मोहल्ला सरकार और जिला सरकार, तीनों को आर्थिक नवनिर्माण का मूलाधार बनाने का समय आ गया है, जिससे हम आर्थिकीय और पारिस्थितिकीय (इकोनॉमी और इकॉलोजी) के सहअस्तित्व के आधार पर अपने मानवीय संसाधान और प्राकृतिक संसाधन का श्रेष्ठतम सदुपयोग करके एक तरफ अति जरूरत की चीजों को ठीक से उपलब्ध करायें और दूसरी तरफ करोड़ों हाथों के लिए टिकाऊ और उत्पादक आजीविका का इंतजाम करें.

बेरोजगारी विकास (जॉबलेस ग्रोथ) के एक दशक के बाद अब बाजारवादी ताकतें अनैतिक मुनाफाखोरी के आगे लाचार हो चुकी हैं, लेकिन इस लाचारी के लिए देश का जनसाधारण अब उन्हें क्षमा नहीं कर सकता.

भारतीय सामाजिक जीवन में पिछले दिनों लिंगभेद, जातिभेद और धार्मिक आधारों पर जारी पारंपरिक वैमनस्य का सिलसिला देश को पीड़ा और पराजय का समर क्षेत्र बना चुका है. स्त्रियों के खिलाफ हिंसा के खिलाफ दिल्ली में हुए जनविद्रोह के बाद बनी वर्मा कमिटी की रिपोर्ट को लागू करना आज का धर्म है.

मुजफरनगर दंगों के बाद सांप्रदायिक हिंसा के कुसूरवारों को बेमुरव्वत सजा देना आज के समाज की पुकार है. दूसरे शब्दों में कहें तो राष्ट्रनिर्माण का सामाजिक चेहरा इस वक्त इतना दागदार है राजनीति में सुधार को प्राथमिकता बनाये बिना हमारा कोई भी शासन स्वराज का दावा नहीं कर सकता.

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