समावेशी विकास में बाधा है शराब भी

Published at :01 Jan 2014 5:03 AM (IST)
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समावेशी विकास में बाधा है शराब भी

शराब तो है ही खराब. शरीर के साथ ही समाज के लिए भी. ऊपर से अगर शराब का उत्पादन व मार्केटिंग बेलगाम हो, तो फिर स्थिति और भी विकट हो जाती है. हमारे देश में राज्यों की अपनी-अपनी शराब नीतियां हैं. बिहार भी अपवाद नहीं है. निश्चित तौर पर सूबे की जो शराब नीति है, […]

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शराब तो है ही खराब. शरीर के साथ ही समाज के लिए भी. ऊपर से अगर शराब का उत्पादन व मार्केटिंग बेलगाम हो, तो फिर स्थिति और भी विकट हो जाती है. हमारे देश में राज्यों की अपनी-अपनी शराब नीतियां हैं. बिहार भी अपवाद नहीं है. निश्चित तौर पर सूबे की जो शराब नीति है, उसे सोच-समझ कर ही बनाया गया होगा. सरकार शराब से होनेवाले नफा-नुकसान में संतुलन की कोशिश भी कर रही होगी.

पर, शराब के बारे में कोई भी बात हो, कोई भी नीति बन रही हो या लागू की जा रही हो, इस बात का ध्यान तो जरूर रखा जाना चाहिए कि राज्य की प्राथमिकताएं क्या हैं? किसी भी विकासशील समाज में शिक्षा और स्वास्थ्य के अतिरिक्त सड़क, पानी व बिजली आदि जैसी मूलभूत सुविधाएं प्राथमिकता में होती हैं. देश-समाज के विकास को ध्यान में रखते हुए इनकी कीमत पर कोई समझौता नहीं हो सकता. बिहार में बीते कुछ वर्षो में इस दिशा में काफी काम हुआ है. पर, अभी बहुत कुछ बाकी भी है. जो बाकी है, उसमें बाधाएं भी कम नहीं.

शराब से मिलनेवाला राजस्व भले ही विकास कार्यो में भी लगता हो, पर इसका बढ़ता कारोबार समावेशी विकास की धारा के सामने एक बड़ी चुनौती है, इसमें दो राय नहीं. सबको पता है कि सूबे में अवैध शराब का धंधा कैसे चल रहा है. कितनी गहरी हैं इसकी जड़ें. यह भी कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है कि ऐसी शराब किन लोगों के लिए बनती और बिकती है. बेशक, गांवों व शहरों की उस आबादी को ध्यान में रख कर, जिसकी शिक्षा, स्वास्थ्य व अन्य सार्वजनिक सुविधाओं में हिस्सेदारी काफी कम है. जो पहले से ही पिछड़ी है. आर्थिक व सामाजिक रूप से.

बिहार वर्किग वीमेंस नेटवर्क की रिपोर्ट के मुताबिक, महीने में महज 2700 कमानेवाले अगर 700 रुपये शराब पर ही खर्च कर रहे हों, तो सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इनके परिवारों की स्थिति क्या होगी? और इनकी संख्या कोई दो-चार-दस भी तो नहीं है. लाखों की तादाद में हैं ऐसे लोग व इनके परिवार. सूबे के विकास की अपेक्षित गति पर इनके बोझ को महसूस करना ही तो काफी है. सरकार को ध्यान रखना होगा कि कहीं राजस्व कमाई के चक्कर में राज्य मानव संसाधन के रूप में अपनी सबसे अहम पूंजी को बर्बाद तो नहीं कर रहा.

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